१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंरामपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३३५ व्याख्यान मुद्रा में स्थित हो रहे हैं। अब श्रीराम के उत्तर भाग में शत्रुघ्न और दक्षिण भाग में भरत हैं। हनुमान जी श्रीराम के सम्मुख करबद्ध खड़े हैं। यह भी त्रिकोण में स्थित हैं। भरत के नीचे की ओर सुग्रीव तथा शत्रुघ्न के नीचे की ओर विभीषण खड़े हुये हैं। श्रीराम के पीछे लक्ष्मण अपने हाथों में छत्र-चँवर लिए हुये बैठे हैं। भरत-शत्रुघ्न के हाथों में ताड़ के पंखे हैं। इस प्रकार लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एक त्रिकोण का स्थिति में हैं। भगवान श्रीराम अपने बीजमन्त्र वाले दीर्घ अक्षरों के आवरण में घिरे बैठे हैं । भगवान राम के आग्नेय आदि दिशाओं की ओर वासुदेव, संकर्षण, शान्ति, श्री, सरस्वती, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और रति हैं । श्रीराम इनसे युक्त रहते हुये द्वितीय आवरण में घिरे हैं। भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण, हनुमान, सुग्रीव, अङ्गद, जाम्बवान् और विभीषण जब श्रीराम के साथ होते हैं तब तृतीय आवरण होता है। राष्ट्रवर्द्धन, अकोप, सुराष्ट्र, धृष्टि, जयन्त, विजय, सुमन्त और धर्मपाल के सहित भी तीसरा आवरण ही सिद्ध होता है । तब ब्रह्मा, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, निऋं'ति, अनन्त और ईशान इन दस दिक्पालों से श्रीराम के आवृत होने पर चतुर्थ आवरण बन जाता है। इन दिक्पालों के बाहरी भाग में इनके आयुध रहते हैं। इसी आवरण में नल आदि बानर भगवान् को सुशोभित करते हैं। उनके साथ ही वसिष्ठ और वामदेव आदि महर्षि भी श्रीराम की उपासना में लीन दिखाई देते हैं ॥२५-३६॥ एवमुद्दे शतः प्रोक्तं निर्देशस्तस्य चाधुना । त्रिरेखापुटमालिख्य मध्ये तारद्वयं लिखेत् ॥ ४० तन्मध्ये बीजमालिख्य तदधः साध्यमालिखेत् । द्वितीयान्तं च तस्योर्ध्वं षष्ठ्यन्तं साधकं तथा ॥ ४१