१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३३४ ] [रामपूर्वतापिन्युपनिषत् विजयश्च सुराष्ट्रश्च राष्ट्रवर्धन एव च । अशोको धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चैभिरावृतः ॥३७ ततः सहस्रहग्वह्निर्धर्मज्ञो वरुणोऽनिलः । इन्द्रीशधालनन्ताश्च दशभिश्चैभिरावृतः ॥३८ बहिस्तदायुधैः पूज्यो नीलादिभिरलंकृतः । वसिष्ठवामदेवादिमुनिभिः समुपासितः ॥३९ इसके पश्चात् सुग्रीव ने अपने वानरों को बुलाकर कहा— वीरो ! तुम से कोई दिशा छिपी हुई नहीं है । अतः तुम शीघ्र ही यहाँ से जाकर श्री सीता जी की खोज करो । आज ही लौट कर इसकी सूचना भगवान् श्रीराम को सुनाओ । फिर हनुमान जी समुद्र को लांघकर लङ्का में जा पहुंचे । वहाँ उन्होंने सीताजी को देखा और अनेक राक्षसों को मारकर लंका को जला डाला । फिर वे लौट- कर श्रीराम के समक्ष उपस्थित हुए और उनको सब समाचार सुनाया । उस समय श्रीराम को अत्यन्त क्रोधावेश हुआ और वानरों को साथ लेकर लङ्का की ओर चल पड़े । लंका पर आक्रमण करने के लिए उसका निरीक्षण किया गया और फिर युद्ध छिड़ गया । लङ्कापति रावण का भाई कुम्भकर्ण मारा गया । फिर इन्द्रजीत और रावण भी युद्ध में मारे गये । तब विभीषण को लङ्का का राज्य देकर श्रीराम ने सीता जी को अपने वामाङ्ग में प्रतिष्ठित किया और सब वानरों को साथ लेकर अयोध्या की ओर चल पड़े । भगवान् श्रीराम अयोध्या के राज-सिंहासन पर प्रतिष्ठित हो गये । उन धनुर्धर राम का स्वभाव ही प्रसन्न रहने का है । वे सब प्रकार के अलंकारों से अलंकृत हैं । उनके दक्षिण हाथ में ज्ञानमयी मुद्रा और वाम हाथ में तेज को प्रकाशित करने वाली धनुर्मयी मुद्रा स्थित है । इस प्रकार द्विभुज रूपधारी श्रीराम स्वयं