भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् ] [ ३४६ गोविन्दाय, गोपीजन वल्लभाय इन तीनों पदों का स्वाहा सहित उच्चारण करेगा, वह शीघ्र ही श्रीकृष्ण से मिलकर मुक्ति को प्राप्त होगा। इसके लिए इससे भिन्न कोई गति नहीं समझनी चाहिये। इनकी भक्ति करना ही भजन माना गया है। भजन करना उसे कहते हैं, जिसमें साधक अपने भोगों की इच्छा को पूर्ण रूप से त्याग कर अपने मन और इन्द्रियों को उन्हीं में समर्पित कर देता है। इसी को वास्तविक संन्यास कहा गया है। वेद के ज्ञाता ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण का अनेक प्रकार से यजन करते तथा भक्तजन गोविन्द नाम से उनकी उपासना करते हैं। सम्पूर्ण संसार का पालन करने वाले वे ही गोपीजन-वल्लभ हैं, जिन्होंने अपनी स्वाहा नाम वाली माया शक्ति के द्वारा इस विश्व की रचना की। जैसे सम्पूर्ण संसार में एक ही वायु-तत्त्व है, परन्तु वह प्रत्येक शरीर में प्राण आदि पाँच रूपों में रमा हुआ है, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण भी एक ही हैं, परन्तु इस मन्त्र में ये पाँच नामों वाले जान पड़ते हैं। इस मन्त्र में कहे हुए पाँचों नाम एक ही श्रीकृष्ण का प्रति- पादन करने वाले हैं। फिर उन मुनियों ने पूछा—"विश्व के आधारभूत भगवान् श्रीकृष्ण की उपासना किस प्रकार होती है, कृपा पूर्वक इसका वर्णन कीजिये।" तब श्री ब्रह्माजी ने भगवान् श्रीकृष्ण की पीठ का वर्णन किया और बोले—"पीठ पर सुवर्णयुक्त एक कमल बनावे, उसमें आठ पंखु- डियाँ हों, उसके बीच में दो त्रिकोण अंकित करे, वे परस्पर सम्पुटित हों। ऐस छः कोण बनावे। कोणों में स्थित कर्णिका में सभी अभीष्टों को पूर्ण करने वाले काम-बीज का अंकन करे। फिर हरेक कोण में क्लीं बीज युक्त 'कृष्णायनमः' को क्रमशः एक-एक अक्षर करके लिखे। फिर ब्रह्म-मन्त्र और काम-गायत्री विधिपूर्वक लिख कर