१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३५० ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् आठ वज्रों से आवेष्ठित पृथिवी मण्डल बनावे । फिर अङ्ग, वासुदेव, रुक्मिणी, इन्द्र, वसुदेव, पार्थ और निधि आदि अष्टावरणों से घेर कर उसका पूजन करना चाहिये । तीनों संध्याओं के समय षोडश उपचारों द्वारा उक्त आवरणों वाले श्रीकृष्ण की पूजा करे । ऐसा करने से साधक चारों पदार्थों को प्राप्त करता है । भगवान् श्रीकृष्ण सर्वव्यापी, सब पर शासन करने वाले हैं, वे सदा स्तुति के योग्य हैं । एक होकर भी वे अनेक रूपों में दिखाई देते हैं । जो ज्ञानी भक्त ऊपर कही हुई पीठ पर प्रतिष्ठित भगवान् श्रीकृष्ण की नित्य प्रति पूजा करते हैं, उन्हें स्थाई सुख की प्राप्ति होती है । जो श्रीकृष्ण सब साधकों का अभीष्ट पूर्ण करते हैं, जो नित्य में भी नित्य और चैतन्यों में भी चैतन्य हैं, उन्हें पहले कही हुई पीठ में प्रतिष्ठित करे । जो इस प्रकार उनका अर्चन करते हैं वे परम सिद्धि के अधिकारी होते हैं । जो भगवान् विष्णु के परमपद रूप इस मन्त्र को नित्य प्रति उत्साह सहित विधिपूर्वक पूजते हैं और भगवत्-प्राप्ति के सिवाय अन्य किसी वस्तु को नहीं चाहते, उनके लिये गोपस्वरूप श्रीकृष्ण अपने परमपद को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं ॥ १-५ ॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यां तस्मै गोपयति स्म कृष्णः । तं ह वेवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुः शरणं व्रजेत् ॥ ६ ॥ ओङ्कारेणान्तरितं ये जपन्ति गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुम् । तेषा- मसौ दर्शयेदात्मरूपं तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्त्यै ॥ ७ ॥ एतस्मा एव पञ्चपदादभूवन्गोविन्दस्य मनवो मानवानाम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi