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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

३५० ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् आठ वज्रों से आवेष्ठित पृथिवी मण्डल बनावे । फिर अङ्ग, वासुदेव, रुक्मिणी, इन्द्र, वसुदेव, पार्थ और निधि आदि अष्टावरणों से घेर कर उसका पूजन करना चाहिये । तीनों संध्याओं के समय षोडश उपचारों द्वारा उक्त आवरणों वाले श्रीकृष्ण की पूजा करे । ऐसा करने से साधक चारों पदार्थों को प्राप्त करता है । भगवान् श्रीकृष्ण सर्वव्यापी, सब पर शासन करने वाले हैं, वे सदा स्तुति के योग्य हैं । एक होकर भी वे अनेक रूपों में दिखाई देते हैं । जो ज्ञानी भक्त ऊपर कही हुई पीठ पर प्रतिष्ठित भगवान् श्रीकृष्ण की नित्य प्रति पूजा करते हैं, उन्हें स्थाई सुख की प्राप्ति होती है । जो श्रीकृष्ण सब साधकों का अभीष्ट पूर्ण करते हैं, जो नित्य में भी नित्य और चैतन्यों में भी चैतन्य हैं, उन्हें पहले कही हुई पीठ में प्रतिष्ठित करे । जो इस प्रकार उनका अर्चन करते हैं वे परम सिद्धि के अधिकारी होते हैं । जो भगवान् विष्णु के परमपद रूप इस मन्त्र को नित्य प्रति उत्साह सहित विधिपूर्वक पूजते हैं और भगवत्-प्राप्ति के सिवाय अन्य किसी वस्तु को नहीं चाहते, उनके लिये गोपस्वरूप श्रीकृष्ण अपने परमपद को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं ॥ १-५ ॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यां तस्मै गोपयति स्म कृष्णः । तं ह वेवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुः शरणं व्रजेत् ॥ ६ ॥ ओङ्कारेणान्तरितं ये जपन्ति गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुम् । तेषा- मसौ दर्शयेदात्मरूपं तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्त्यै ॥ ७ ॥ एतस्मा एव पञ्चपदादभूवन्गोविन्दस्य मनवो मानवानाम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

गोपालपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३५१ दशार्णाद्यास्तेऽपि संक्रन्दाद्यै रभ्यस्यन्ते भूतिकामैर्यथावात् ॥८ जो सृष्टि के पूर्व काल में ब्रह्माजी उत्पन्न कर उन्हें वेद ज्ञान देते और उनसे साम-गान कराते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों को बुद्धि रूप प्रकाश प्रदान करते हैं, मुमुक्षु व्यक्ति उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण की शरण प्राप्त करे । भगवान गोविन्द के पञ्चपदी मन्त्र की ओंकार सम्पुट कर जप करने वाले साधक शीघ्र ही उनके दर्शन करते हैं । इसलिये भव-बन्धन से मुक्त होने की कामना करने वाले साधक को नित्य शांति की प्राप्ति के लिये उक्त मन्त्र का ही जप करना चाहिये । इस पञ्चपदी मन्त्र से ही दशाक्षर आदि अन्य मन्त्र भी प्रकट हुए हैं । वे सभी मन्त्र मानव का कल्याण करने वाले हैं । उन मन्त्रों का भी ऐश्वर्य-कामना वाले इन्द्रादि देव विधिपूर्वक सदा जप करते रहते हैं ॥६—८॥ ते पप्रच्छु स्तुदुहोवाच ब्रह्मसदनं चरतो मे ध्यातः स्तुतः परमेश्वरः परार्द्धान्ते सोऽबुध्यत । कोपदेष्टा मे पुहुषः पुरस्तादा- विर्बभूव । ततः प्रणतो मायानुकूलेन हृदा मह्यमष्टादशार्णस्वरूपं सृष्टये दत्त्वान्तर्हितः । पुनस्ते सिसृक्षतो मे प्रादुरभूवन् । तेष्व- क्षरेषु विभज्य भविष्यज्जगद्रूपं प्रकाशयम् । तदिह कादाका- लात्पृथिवीतोऽग्निर्बिन्दोरिन्दुस्तत्संपातात्तदर्क इति । क्लींकाराद- जस्रं कृष्णादाकाशं खाद्वायुरुत्तरात्सुरभिर्विद्याः प्रादुरकार्षमका- र्षमिति । तदुत्तरात्स्वापुंसादिभेदं सकलमिदं सकलमिदमिति ॥ ३ ॥ एतस्यव यजनेन चन्द्रध्वजो गतमोहमात्मानं वेदयति । ओंकारालिकं मनुमावर्तयेत् । सङ्गरहितोऽध्यानयेत् । तद्विष्णोः

:गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३५२ परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तस्मा- देतन्नित्यमावर्तयेन्नित्यमावर्तयेदिति ॥४॥ तदाहुरेके यस्य प्रथ- मपदाद्भूमिर्द्वितीयपदाज्जलं तृतीयपदाद्यं जश्चतुर्थपदाद्वायुश्चर- मपादाद्व्योमेति । वैष्णवं पञ्चव्याहृतिमयं मन्त्रं कृष्णावभासकं कैवल्यस्य सृप्त्यै सततमावर्तयेत्सततमावर्तयेदिति ॥ ५ ॥ तदत्र गाथाः ॥ यस्य चाद्यपदाद्भूमिर्द्वितीयात्सलिलोद्भवः । तृतीयाः तेज उद्भूतं चतुर्थाद्गन्धवाहनः ॥ १ ॥ पञ्चमादम्बरोत्पत्तिस्त- मेवैकं समभ्यसेत् । चन्द्रध्वजोगमद्विष्णोः परमं पदमव्ययम् ॥ २॥ ततो विशुद्धं विमलं विशोकमशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् । यत्तत्पदं पञ्चपदं तदेव स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ३ ॥ तमेकं गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं पञ्चपदं वृन्दावनसुरभूरूह- तलासीनं । सततं मरुद्गणोऽहं परमया स्तुत्या स्तोष्यामि ॥ ब्रह्माजी ने कहा—जब मेरी परार्ध आयु भगवान की स्तुति करते बीत गई तो मुझे गोप वेषधारी भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ । उन्होंने मुझे अष्टादशाक्षर मन्त्र का उपदेश देकर सृष्टि रचना की प्रेरणा की। मैंने इस मन्त्र के 'क' अक्षर से जल की, 'ल' से पृथ्वी की, 'ई' से अग्नि की, अनुस्वार से चन्द्रमा की और समग्र 'क्लीं' से सूर्य की रचना की । मन्त्र के द्वितीय पद 'कृष्णाय' से आकाश और वायु की, 'गोविन्दाय' से कामधेनु और वेदों की तथा 'गोपीजन वल्लभाय' से पुरुष-स्त्री की रचना की । अन्त के स्वाहा' पद से चराचर जगत को उत्पन्न किया । इस अष्टाक्षर मन्त्र से ही प्राचीन समय में चन्द्रध्वज राजा मोहरहित होकर पूर्ण आत्मज्ञान के अधिकारी बने थे । भगवान कृष्ण के गोलो- कधाम की प्राप्ति इसी मन्त्र से होती है । वह जो परम विशुद्ध, विमल, शोक रहित, आसक्ति और

गोपालपूर्वतपिनीयुपनिषत् [ ३५३ वासना से पृथक गोलोक धाम है वह इस मन्त्र से अभिन्न है । यह मन्त्र साक्षात वासुदेव स्वरूप ही है । उनकी स्तुति निम्न श्लोकों से करनी चाहिये । ॐ नमो विश्वस्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे । विश्वेश्वराय विश्वाय गोविंदाय नमोनमः ॥ १ ॥ नमो विज्ञानरूपाय परमा- नन्दरूपिणे । कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमोनमः ॥ २ ॥ नमः कमलनेत्राय नमः कमलमालिने । नमः कमलनाभाय कम- लापतये नमः ॥ ३ ॥ बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे । रमामानसहंसाय गोविंदाय नमोनमः ॥ ४ ॥ कंसवंशविनाशाय केशिचाणूरघातिने । वृषभध्वजवन्द्याय पार्थसारथये नमः ॥५॥ वेणुनादविनोदाय, गोपालाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललोलाय, लोलकुण्डलधारिणे ॥ ६ ॥ बल्लवीवदनाम्भोजमालिने नृत्तशा- लिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमोनमः ॥७॥ नमः पापप्रणाशाय गोवर्धनधराय च । पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्त्ता- सुहारिणे ॥ ८ ॥ निष्कलाय विमोहाय शुद्धायाशुद्धवैरिणे । अद्वि- तीयाय महते श्रीकृष्णाय नमोनमः ॥ ९ ॥ प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर । आधिव्याधिभुजङ्गेन दष्टं मामुद्धर प्रभो ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणीकांत गोपीजनमनोहर। संसार- सागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥११॥ केशव क्लेशहरण नारा यण जनार्दन । गोविंद परमानन्द मां समुद्धर माधव ॥ १२॥ अथैवं स्तुतिभिराधयामि । तथा यूयं पञ्चपदं जपन्तः श्रीकृष्णं ध्यायन्तः संसृतिं तरिष्यथेति होवाच हैरण्यगर्भः । अमुं पञ्चपदं मनुमावर्त्तयेद्यः स यात्यनायासतः केवलं तत्पदं तत् । अनेजदेकं मनसो जवीयो नैन द्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षदिति । तस्मात्कृष्ण एव परमो देवस्तं ध्यायेत् । तं रसयेत् । तं यजेत् । तं यजेत् । तं भजेत् । ओं तत्सदित्युपनिषत् ॥ तत्सत् ॥

३५४ ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् हे मुनिश्रेष्ठो ! जिस प्रकार मैं इन स्तुतियों को करता हूँ, उसी प्रकार तुम भी इस मन्त्र द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना करके संसार समुद्र से तर जाओगे। इस जप को करने वाला भगवान के परमपद को प्राप्त हो जाता है। देवता (वाणी आदि) वहाँ तक कभी नहीं पहुँच सकते। इसलिये सदैव भगवान कृष्ण का ही ध्यान करे, मन्त्र-जप द्वारा उनके नामामृत का रसास्वादन करे तथा नित्य उन्हीं का भजन करे—उन्हीं का भजन करे। ॥ गोपालपूर्वतापनी उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—

कृष्णोपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।। स्थिरैरङ्गै स्तुष्टुः वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।। स्वस्ति नस्ता- र्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।। ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः । 'हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥

हरिः ॐ श्रीमहाविष्णुं सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः । तं होचुर्नोऽवद्यमवतारान्वै गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति । भवा- न्तरे कृष्णावतारे यूयं गोपिका भूत्वा मामालिङ्गथ अन्ये येऽव- तारास्ते हि गोपा न स्त्रीश्च नो कुरु ।

अन्योन्यविग्रहं धार्यं तवाङ्गस्पर्शनादिह । शश्वत्स्पर्शयितास्माकं गृह्लीमोऽवतानवयम् ॥१॥ रुद्रादीनां वचः श्रुत्वा प्रोवाच भगवान्स्वयम् ।

३५६ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ कृष्णोपनिषत् अङ्गसङ्गं करिष्यामि भवद्वाक्यं करोम्यहम् ॥२ श्रीकृष्ण के अवतार ग्रहण करने से पहिले की बात है। जब भगवान् ने देवताओं को पृथिवी पर अवतीर्ण होने की आज्ञा दी, तब सम्पूर्ण देवताओं ने भगवान् से कहा—'प्रभो ! हम देवता होकर पृथिवी पर जन्म ग्रहण करें, यह हमारे लिए शोभा की बात कदापि नहीं होगी। हम स्वेच्छा से तो पृथिवी पर जन्म नहीं ले सकते, परन्तु आपकी आज्ञा के कारण हमें वहाँ जन्म लेना ही होगा। फिर भी प्रभो ! हमें गोपों और स्त्रियों के रूप में वहाँ जन्म देना। आपके अङ्ग-स्पर्श से वञ्चित रह कर हम कहीं नहीं रहना चाहते। यदि आपकी समीपता से दूर करने के लिये हमें मनुष्य बनना पड़े तो हम ऐसे मनुष्य-जन्म को कभी स्वीकार न करेंगे। यदि वहाँ आपके सान्निध्य का और अङ्ग-स्पर्श का अवसर मिलता रहे तो हम पृथिवी पर जन्म लेने के लिये प्रस्तुत हैं।' देवताओं के ऐसे प्रेम-पूर्ण वचनों को सुनकर भगवान् बोले—'देवगण ! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी और मनुष्य जन्म में तुम्हें मेरे अङ्ग-स्पर्श का अवसर मिलता रहेगा' ॥ १-२ ॥ मोदितास्ते सुराः सर्वे कृतकृत्याधुना वयम् । यो नन्दः परमानन्दो यशोदा मुक्तिगेहिनी ॥३ माया सा त्रिविधा प्रोक्ता सत्त्वराजसतामसी । प्रोक्ता च सात्विकी रुद्रे भक्ते ब्रह्मणि राजसी ॥४ तामसी दैत्यपक्षेषु माया त्रेधा ह्य दाहृता । अजेया वैष्णवी माया जप्येन च सुता पुरा ॥५ देवकी ब्रह्मपुत्रा सा या वेदै रुपगीयते । निगमो वसुदेवो यो वेदार्थः कृष्णरामयोः ॥६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

कृष्णोपनिषत् ] [ ३५७ स्तुवते सततं यस्तु सोऽवतीर्णो महीतले । वने वृन्दावने क्रोडन्गोपगोपीसुरैः सह ॥७ गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः । वंशस्तु भगवान्रुद्रः शृंगमिन्द्रः सगोसुरः ॥८ गोकुलं वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमाः । लोभक्रोधादयो दैत्याः कलिकालस्तिरस्कृतः ॥६ भगवान् द्वारा प्राप्त इस आश्वासन से सब देवता अत्यन्त प्रसन्न हुये और परस्पर कहने लगे—'अब हम धन्य हो गये' । फिर सब देवता भगवान् की सेवा के लिये अवतीर्ण हुए । नन्द के रूप में भगवान् का परम आनन्दमय अंश उत्पन्न हुआ । यशोदा के रूप में मुक्ति देवी प्रकट हुईं । तीन प्रकार की माया कही गई है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी । रुद्र भगवान में सात्त्विकी माया है, ब्रह्माजी में राजसी और दैत्यों में तामसी माया समाविष्ट हुई है। इस त्रिविध माया से भिन्न जो वैष्णवी माया है, उस पर विजय प्राप्त करना नितान्त असम्भव है। जिस ब्रह्ममयी वैष्णवी माया को प्राचीन काल में ब्रह्माजी भी नहीं जीत सके, उसकी देवगण स्तुति करते हैं। वही वैष्णवी माया देवकी के रूप में अवतीर्ण हुई । जो वेद नारायण के स्वरूप की सदैव स्तुति करते हैं, वे ही वसुदेव हुए । वेदों के अर्थभूत ब्रह्म ही इस पृथिवी पर बलराम और कृष्ण के रूप में प्रकट हुये । वही वेदार्थ साक्षात् रूप में, वृन्दावन में गोप-गोपिकाओं के साथ क्रीड़ा करता है । उन श्रीकृष्ण की गौएं और गोपिकाएं वेदों की ऋचाएं हैं । लकड़ी का रूप ब्रह्मा ने और वंशी का रूप रुद्र ने धारण किया है । इन्द्र सींगा बन गये । इस प्रकार गोकुल के रूप में साक्षात् वैकुण्ठ ही उपस्थित हो गया । वहां तपस्वी महात्माओं ने वृक्षों का रूप धारण किया है और लोभ-क्रोधादि

[३५८] [कृष्णोपनिषत्

विकार ही दैत्य हो गए हैं। वे कलिकाल में भगवान् का नाम लेने मात्र से नाश को प्राप्त होते हैं ॥३-६॥ गोपरूपो हरिः साक्षान्मायाविग्रहधारणः । दुर्बोधं कुहकं तस्य मायया मोहित जगत् ॥१० दुर्जेया सा सुरैः सर्वैर्धृष्टिरूपो भवेद्द्विजः । रुद्रो येन कृतो वंशस्तस्य माया जगत्कथम् ॥११ बलं ज्ञानं सुराणां वै तेषां ज्ञानं हृतं क्षणात् । शेषनागो भवेद्रामः कृष्णोब्रह्मव शाश्वतम् ॥१२ अष्टावष्टसहस्रे द्वे शताधिक्यः स्त्रियस्तथा । ऋचोपनिषदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋचः स्त्रियः ॥१३ द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयंत्सरो मुष्टिको जयः । दर्पः कुवलयापीडो गर्वो रक्षः खगो बकः ॥१४ दया सा रोहिणी माता सत्यभामा घरेति वै । अघासुरो महाव्याधिः कलिः कंसः स भूपतिः ॥१५ शमो मित्रः सुदामा च सत्याक्रू रोद्धवो दमः । यः शङ्खः स स्वयं विष्णुर्लक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥१६ दुग्धसिन्धौ समुत्पन्नो मेघघोषस्तु संस्मृतः । दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे ॥१७ क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ । संहारार्थं च शत्रूणां रक्षणाय च संस्थितः ॥१८ कृपार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् । यत्तत्सृष्ट मेश्वरेणासीत्तच्चक्रं ब्रह्मरूपधृक् ॥१६ भगवान् श्रीहरि ने ही गोपरूप में लीला-विग्रह रूप धारण किया है । यह संसार माया से मोहित है, इसलिए ईश्वरीय माया का रहस्य जानना अत्यन्त दुष्कर है। क्योंकि प्रभु-माया तो

कृष्णोपनिषत् ] [ ३५६ देवताओं द्वारा भी नहीं जीती जा सकती । जिनकी माया के वश में पड़कर ही ब्रह्माजी को लकुटी और भगवान् शिव को बांसुरी बनना पड़ा है, उन श्रीहरि की माया का ज्ञान साधारण प्राणियों को किस प्रकार हो सकता है ? देवताओं के पास जो ज्ञान रूप बल है उसका भी श्रीहरि की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया । सनातन ब्रह्म श्रीकृष्ण हुए और शेषनाग ने बलराम का रूप ग्रहण किया । भगवान की सोलह हजार एक सौ रानियां वेद की ऋतुएँ और उपनिषद् ही हैं । इनके अतिरिक्त ब्रह्म स्वरूपिणी वेद-ऋचाएँ गोपियों के रूप में प्रकट हुईं । चाणूर मल्ल द्वेष है, अत्यन्त कठिनाई से जीता जाने के योग्य मुष्टिक मत्सर है और कुबलियापीड दर्प है । आकाश में विचरण करने वाला राक्षस बकासुर गर्व है । साक्षात् दया ही माता रोहिणी हुई है । पृथिवी माता ने सत्यभामा का रूप धारण किया है । महाव्याधि अघासुर और साक्षात् कलि ने राजा कंस का रूप बनाया । शम ने सुदामा का, सत्य ने अक्रूर का और दम ने उद्धव का रूप ग्रहण किया । शंख विष्णु है और लक्ष्मी का भ्राता होने से उसी के समान है । वह मेघ के समान गम्भीर घोष करने वाला क्षीर सागर से उत्पन्न हुआ है । भगवान् श्रीकृष्ण ने जो दूध-दही के मटके फोड़ कर घर-घर में दूध-दही की नदी-सी बहा दी वह प्रवाह साक्षात् क्षीर सागर ही हुआ । दूध-दही के प्रवाह रूप क्षीर सागर में बालक रूप में भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं । सन्तजनों की रक्षा में तथा दुष्टों के विनाश में वे समान रूप से लगे हुए हैं । सब प्राणियों पर अनुग्रह करने और धर्म की रक्षा करने के लिये ही भगवान् श्रीकृष्ण ने भूतल पर अवतार लिया है । जो चक्र भगवान शंकर ने श्रीहरि भगवान् के निमित्त प्रकट किया था, वही चक्र भगवान् श्रीकृष्ण के कर-कमलों में सुशोभित हो रहा है । वह चक्र भी ब्रह्म के समान है ॥ १०–१६ ॥

३६० ] [ कृष्णोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri जयन्तीसंभवौ वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः । यस्यासौ ज्वलनाभासः खङ्गरूपो महेश्वरः ॥२० कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्माताऽदितिस्तथा । चक्रं शंखं च संसिद्धि बिन्दुं च सर्वमूर्धनि ॥२१ यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जनाः । नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशयः ॥२२ गदा च कालिका ताक्षात्सर्वशत्रु निबर्हिणी । धनुः शार्ङ्गं स्वमाया च शरत्कालः सुभोजनः ॥२३ अब्जकाण्डं जगद्बीजं धृतं पाणौ स्वलीलया । गरुडो वटभाण्डीरः सुदामा नारदो मुनिः ॥२४ वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धिः सर्वजन्तुप्रकाशिनी । तस्मान्न भिन्नं नाभिन्नमाभिर्भिन्नो न वै विभुः ॥ भूमावुत्तारितं सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् ॥२५ सर्वतीर्थफलं लभते य एवं वेद । देहबन्धाद्विमुच्यते इत्युपनिषत् ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ धर्म ने चँवर का रूप धारण किया और वायु देवता वैजयन्ती- माला के रूप में हुए । महेश्वर ने चमकते हुए खंग का रूप बनाया और कश्यप नन्दगृह में ऊखल बन गए । माता अदिति ने रस्सी का रूप बनाया । सब वर्णों पर जैसे अनुस्वार अलंकृत होता है, वैसे ही सब से ऊपर सुशोभित आकाश भगवान का . छत्र है । वाल्मीकि और व्यास आदि महर्षियों ने देवताओं के जितने रूपों का वर्णन किया है और जिन- जिन रूपों में देवताओं को सब प्राणी नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रम में ही रहते हैं । भगवान् की गदा साक्षात् काली स्वरूपा है, जो समस्त शत्रुओं का नाश करने में समर्थ है । वैष्णवी माया ने शार्ङ्ग धनुष का रूप बनाया और प्राण नाशक काल ही उस पर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

कृष्णोपनिषत् ] [ ३६१ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri संधान किये जाने के लिये बाण बना । संसार का बीज रूप कमल भगवान् के हाथों में लीलापूर्वक सुशोभित है । भाण्डीर वट का रूप गरुड़ ने धारण किया और नारद कृष्ण के सखा श्री सुदामा हुए । साक्षात् भक्ति ही वृन्दा हुई । सब प्राणियों को कर्म का ज्ञान कराने वाली, प्रकाश दायिनी बुद्धि ही भगवान् की क्रिया शक्ति हुई । इस प्रकार यह गोप-गोपी आदि सभी भगवान श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने स्वर्ग के और बैकुण्ठ के सब देवताओं को पृथिवी पर उतारा है ॥२०—२५॥ इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी सब तीर्थों का फल प्राप्त करता और शरीर-बन्धन से मुक्त होता है—यह उपनिषद् है । ॥ कृष्णोपनिषद् समाप्त ॥ —:— Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गणपत्युपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा ॥ स्थिरैरङ्गै स्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति न पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ता- क्ष्र्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो वृहस्पतिर्द धातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांति ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । अंगों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ ॐ लं नमस्ते गणपतये ॥१॥ त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि । त्वमेव केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्माऽसि ॥२॥ नित्यमृतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥३॥ अथ त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पुरस्ता- त्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव पश्चात्तात् । अवोत्तरात्तात् अव Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

गणपत्युपनिषत् ] [ ३६३ च्चोर्ध्वात्तात् । अवाधरात्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥४॥ त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः । त्वमानन्दमयस्त्व ब्रह्ममयः । त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ५ सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदं त्वत्तस्ति- ष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति । त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः । त्वं चत्वारि वाक्प- रिमिता पदानि । त्वं गुणत्रयातीतः । त्वं देहत्रयातीतः । त्वं कालत्रयातीतः । त्वं मूलाधारे स्थितोऽसि नित्यम् । त्वं शक्ति- त्रयात्मकः । त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् । त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णु- स्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरोम् ॥ ६ भगवान् गणपति को नमस्कार ॥१॥ तुम्हीं कर्ता, धर्ता हो एवं प्रत्यक्ष तत्व हो । तुम्हीं इन रूपों में विराजमान साक्षात् ब्रह्म हो । तुम ही नित्य एवं आत्म स्वरूप हो ॥२॥ मैं सत्यपूर्वक एवं न्यायपूर्वक कहता हूँ ॥३॥ तुम मुझ शिष्य की एवं उपदेष्टा गुरु की रक्षा करो। श्रोता, दाता और घाता की रक्षा करो। व्याख्या आचार्य और शिष्य की रक्षा करने वाले होओ । पश्चिम की ओर से मेरी रक्षा करो, पूर्व की ओर से रक्षा करो, उत्तर की ओर से तथा दक्षिण ओर से भी मेरी रक्षा करो। ऊपर, नीचे तथा सब ओर से मेरी रक्षा करो । चारों ओर से मेरे रक्षक बनो ॥४॥ तुम वाङ्मय, चिन्मय एवं आनन्दमय हो । तुम ब्रह्ममय, सत्-चित्-आनन्द रूप तथा एक अद्वितीय हो । ज्ञान-विज्ञान-

३६४ ] [ गणपत्युपनिषत् मय भी हो, तुम्हीं साक्षात् ब्रह्म हो ॥५॥ यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हारे द्वारा ही प्रकट होता है । यह विश्व तुम्हारे द्वारा ही स्थित है । यह समस्त संसार तुम्हीं में लीन हो जाता है । इस सम्पूर्ण विश्व की प्रतीति तुम में ही होती है । तुम्हीं पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो । वाणी के चार रूप परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा भी तुम हो । सत्व, रज और तम से परे—गुणातीत हो । भूत, भविष्यत्, वर्तमान से परे तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों प्रकार के शरीरों से भी परे हो । तुम मूलाधार चक्र में सदा स्थिति रहते हो । इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति यह तीनों रूप तुम्हारे ही हैं । योगी पुरुष तुम्हारा नित्य प्रति चिन्तन करते हैं । तुम ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हो । इन्द्राग्नि और वायु भी तुम ही हो । सूर्य-चन्द्रमा हो । तुम ब्रह्म हो तथा भूः भुवः स्वः रूप त्रिलोक और ओंकार रूप परब्रह्म तुम ही हो ॥६॥ गणादीन् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् । अनुस्वारः परतरः [अर्धेन्दुलसितं तथा ॥ तारेण युक्तमेतदेव मनुस्वरूपम् ॥ ७ गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वार- श्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् । नादः संधानम् । संहिता संधिः । सैषा गाणेशी विद्या ॥ ८ गणक ऋषिः । नृचद्गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपति- देवता । ॐ गणपतये नमः ॥ ६ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ १० एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणाम् । अभयं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥ ११ रक्तलम्बोदरं शूर्पसुकर्णं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ॥ १२

गणपत्युपनिषत् [ ३६५ भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् । आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात् परम् ॥१३ एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ १४ प्रथम 'ग्' का उच्चारण कर फिर 'अ' का उच्चारण करे । इसके पश्चात् अनुस्वार का उच्चारण होता है । इस प्रकार अनुस्वार से अलंकृत 'गँ' ही तुम्हारे बीज मन्त्र का रूप है । क्योंकि अर्द्धचन्द्र रूप में ओंकार अवरुद्ध है, ।७॥ गकार इसका पूर्वरूप, अकार मध्यरूप अनुस्वार अन्तरूप तथा बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संघान, संहिता सन्धि है। इस प्रकार यह गणेश-विद्या है ॥८॥ इसके ऋषि गणक, छन्द निचृद्गायत्री, देवता महागणपति हैं ॥६॥ एक दन्त से हम परिचित हैं। उन वक्रतुण्ड का हम चिन्तन करते हैं । यह गजानन हमें प्रेरणा करें यही गणेश-गायत्री है । जो योगी चतुर्भुज, पाश-अंकुश-वर-अभय मुद्राधारी, एकदन्त, लम्बोदर, मूषक-ध्वज, रक्तवर्ण वाले, बड़े-बड़े कानों वाले, लाल वस्त्र वाले, रक्त चन्दन का लेप किये हुये, लाल रङ्ग के पुष्पों से विभूषित, भक्त पर कृपा करने वाले, विश्व के कारण, अविनाशी सृष्टि के आदि में उत्पन्न, प्रकृति और पुरुष से पर श्रीगणेश जी का नित्य चिन्तन करता है, वह सब योगियों में श्रेष्ठ होता है ॥११-१४॥ नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्ते- ऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय वरद- मूर्तये नमोनमः ॥ १५ एतदथर्वशिरो योऽधीते स ब्रह्मभूयाय कल्पते । स सर्वतः सुखमेधते । स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते । स पञ्चमहापातकोपपातकात् प्रमुच्यते । सायमधियानो दिवसकृतं पापं नाशयति । प्रातर- धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽपापो भवति । धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥ १६

३६६ ] [ गणपति उपनिषत् इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् । यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति ॥ १७ सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् । अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति । इत्यथर्वणवाक्यं ब्रह्माद्याचरणं विद्यान्न बिभेति कदाचनेति । यो दूर्वाऽङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणो- पमो भवति । यो लाजैैर्यजति स यशोवान् भवति स मेधावान भवति । यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति । यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते । अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति । सूर्यग्रहणे महा- नद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा स सिद्धमन्त्रो भवति । महावि- घ्नात् प्रमुच्यते । महादोषात् प्रमुच्यते ॥ १८ स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति य एवं वेदेत्यु- पनिषत् ॥ १९ व्रात-नायक को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रथमपति को नमस्कार, लम्बोदर को नमस्कार, एकरदन को नमस्कार, विघ्न विनाशक को नमस्कार, शिव-सुवन को नमस्कार, वरदमूर्ति गणेशजी को नमस्कार ॥१५॥ यह अथर्वशिरस् है । इसका पाठ करने वाला पुरुष ब्रह्मत्व-प्राप्ति का अधिकारी होता है । उसके लिये किसी प्रकार का विघ्न बाधा नहीं करता । वह सभी स्थानों पर सुखी रहता है । पांचों प्रकार के पाप, उपपापों से वह छूटता है । सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों से मुक्त होता है और प्रातःकाल पाठ करने वाले के रात्रि में किये हुये पाप कट जाते हैं । प्रातः सायं दोनों काल में पाठ करने से पाप रहते ही नहीं । इसका पाठक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को पाता है ॥१६॥ इस अथर्व शिरस् को अशिष्य को न दे, शिष्य को ही दे । मोहवश इसे देने वाला पापी होता है ॥१७॥ सहस्र बार पाठ करने पर जिस-जिस अभिलाषा का उच्चारण करे, उस-उसकी सिद्धि हो सकती

गणपत्युपनिषत् ] [ ३६७ है। इसके द्वारा गणपति का अभिषेक करने वाला वक्ता बन जाता है। चतुर्थी तिथि को उपवास करके जो इसे जपता है, वह विद्यावान् होता है—ऐसा महर्षि अथर्वण का कथन है। इस मन्त्र के द्वारा तप करने वाले को कभी भय नहीं लगता। दूर्वा के अंकुरों द्वारा गणपति का यजन करने वाला कुबेर के समान धनवान् होता है। लाजाओं के द्वारा यज्ञ करने वाला यशस्वी होता है। सहस्र मोदकों से जो पुरुष यजन करता है वह इच्छित फल पाता है। घृत और समिधा से यज्ञ करता है उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। आठ ब्राह्मणों को भले प्रकार से इसे ग्रहण करावे तो सूर्य के समान तेजस्वी हो। सूर्य ग्रहण के समय किसी महानदी या प्रतिमा के निकट बैठ कर जप करे तो मन्त्र-सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा साधक घोर विघ्न से भी छुटकारा पा लेता है। वह महान् दोषों और महापापों से मुक्त हो जाता है ॥१८॥ इस प्रकार जानने वाला पुरुष भी सर्व ज्ञानी हो जाता है। सर्वज्ञता प्राप्त करता है ॥१९॥ ॥ गणपति उपनिषद् समाप्त ॥ —०~०—

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और बृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ ॐ आपो वा इदमासन्त्सलीलमेव । स प्रजापतिरेकः पुष्क- रपर्णे समभवत् । तस्यान्तर्मनसिः कामः समवर्तत इदं सृजेय- मिति । तस्माद्यत्पुरुषो मनसाभिगच्छति तद्वाचा वदति तत्क- र्मणा करोति तदेषाभ्यनूक्ता । कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति । निरविन्दन्हृदि प्रतीष्य कवयो मनीषेति उपैनं तदुपनमति यत्कामो भवति य एवं वेदांग तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभम- पश्यत् तेन व सर्वमिदमसृजत यदिदं किंच । तस्मात्सर्वमानुष्टु- भमित्याचक्षते यदिदं किंच । अनुष्टुभो वा इमानि भूतानि

नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१ जायन्ते ननुष्टुभा जातानि जीवन्ति अनुष्टुभं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तस्यैषा भवति अनुष्टुप्प्रथमा भवति अनुष्टुबुत्तमा भवति वाग्वा अनुष्टुप् वाचैव प्रयन्ति वाचोद्यन्ति परमा वा एषा छन्दसां यद- नूष्टुबिति ॥ १ प्राचीन काल में यह दृष्टिगोचर सम्पूर्ण विश्व जल के रूप में था । सर्वत्र जल ही जल दिखाई देता था । उसी जल में एक कमल पत्र पर सुप्रसिद्ध प्रजापति श्री ब्रह्माजी का प्राकट्य हुआ । ब्रह्माजी ने विचार किया कि मैं लोक-रचना-कार्य करूँ । यह बात सर्व विदित है कि मानव की जो भावना बनती है, उसे वह पहले वाणी द्वारा कहता और फिर क्रिया द्वारा पूर्ण करता है। इस सम्बन्ध में कहा है कि पूर्व काल में जब सृष्टि रचना हुई तब काम की उत्पत्ति हुई । ज्ञानीजन अपने मन में निहित आत्मा का निरीक्षण करते रहते हैं और काम.. को आत्मा के लिये पाश स्वरूप मानते हैं। ज्ञानियों के विचार में प्रकृति के कार्यभूत मन में काम का प्राकट्य होता है। सृष्टि से पहले जो जल ही जल था, वही इस विश्व का कारणभूत है । इस बात के जानने वाला विद्वान् जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह वस्तु उसे मिल जाती है। सुप्रसिद्ध प्रजापति ने तप प्रारम्भ किया । उसके द्वारा उन्हें अनुष्टुप् छन्द में अवतीर्ण इस नारसिंह मन्त्रराज की प्राप्ति हुई । उसी मन्त्रराज के प्रभाव से इस प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर विश्व की उन्होंने रचना की । इसलिये इस प्रत्यक्ष विश्व को मन्त्रराज आनुष्टुभमय कहा जाता है । इस अनुष्टुप् से ही इन सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, अनुष्टुप् के प्रभाव से ही यह उत्पन्न प्राणी जीवन धारण करते हैं और मरने पर इहलोक को त्यागने पर अनुष्टुप् में ही लीन हो जाते हैं। यह अनुष्टुप् वृत्ति सम्पूर्ण लोक की रचने वाली है । वाणी से ही मनुष्य जन्म-मरण को प्राप्त होते हैं इसलिये वाणी मात्र अनुष्टुप् ही है। यह अनुष्टुप् छन्द अन्य सब छन्दों में अधिक महिमा वाला है ॥१॥