१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० ] [ कृष्णोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri जयन्तीसंभवौ वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः । यस्यासौ ज्वलनाभासः खङ्गरूपो महेश्वरः ॥२० कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्माताऽदितिस्तथा । चक्रं शंखं च संसिद्धि बिन्दुं च सर्वमूर्धनि ॥२१ यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जनाः । नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशयः ॥२२ गदा च कालिका ताक्षात्सर्वशत्रु निबर्हिणी । धनुः शार्ङ्गं स्वमाया च शरत्कालः सुभोजनः ॥२३ अब्जकाण्डं जगद्बीजं धृतं पाणौ स्वलीलया । गरुडो वटभाण्डीरः सुदामा नारदो मुनिः ॥२४ वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धिः सर्वजन्तुप्रकाशिनी । तस्मान्न भिन्नं नाभिन्नमाभिर्भिन्नो न वै विभुः ॥ भूमावुत्तारितं सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् ॥२५ सर्वतीर्थफलं लभते य एवं वेद । देहबन्धाद्विमुच्यते इत्युपनिषत् ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ धर्म ने चँवर का रूप धारण किया और वायु देवता वैजयन्ती- माला के रूप में हुए । महेश्वर ने चमकते हुए खंग का रूप बनाया और कश्यप नन्दगृह में ऊखल बन गए । माता अदिति ने रस्सी का रूप बनाया । सब वर्णों पर जैसे अनुस्वार अलंकृत होता है, वैसे ही सब से ऊपर सुशोभित आकाश भगवान का . छत्र है । वाल्मीकि और व्यास आदि महर्षियों ने देवताओं के जितने रूपों का वर्णन किया है और जिन- जिन रूपों में देवताओं को सब प्राणी नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रम में ही रहते हैं । भगवान् की गदा साक्षात् काली स्वरूपा है, जो समस्त शत्रुओं का नाश करने में समर्थ है । वैष्णवी माया ने शार्ङ्ग धनुष का रूप बनाया और प्राण नाशक काल ही उस पर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi