१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंकृष्णोपनिषत् ] [ ३५६ देवताओं द्वारा भी नहीं जीती जा सकती । जिनकी माया के वश में पड़कर ही ब्रह्माजी को लकुटी और भगवान् शिव को बांसुरी बनना पड़ा है, उन श्रीहरि की माया का ज्ञान साधारण प्राणियों को किस प्रकार हो सकता है ? देवताओं के पास जो ज्ञान रूप बल है उसका भी श्रीहरि की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया । सनातन ब्रह्म श्रीकृष्ण हुए और शेषनाग ने बलराम का रूप ग्रहण किया । भगवान की सोलह हजार एक सौ रानियां वेद की ऋतुएँ और उपनिषद् ही हैं । इनके अतिरिक्त ब्रह्म स्वरूपिणी वेद-ऋचाएँ गोपियों के रूप में प्रकट हुईं । चाणूर मल्ल द्वेष है, अत्यन्त कठिनाई से जीता जाने के योग्य मुष्टिक मत्सर है और कुबलियापीड दर्प है । आकाश में विचरण करने वाला राक्षस बकासुर गर्व है । साक्षात् दया ही माता रोहिणी हुई है । पृथिवी माता ने सत्यभामा का रूप धारण किया है । महाव्याधि अघासुर और साक्षात् कलि ने राजा कंस का रूप बनाया । शम ने सुदामा का, सत्य ने अक्रूर का और दम ने उद्धव का रूप ग्रहण किया । शंख विष्णु है और लक्ष्मी का भ्राता होने से उसी के समान है । वह मेघ के समान गम्भीर घोष करने वाला क्षीर सागर से उत्पन्न हुआ है । भगवान् श्रीकृष्ण ने जो दूध-दही के मटके फोड़ कर घर-घर में दूध-दही की नदी-सी बहा दी वह प्रवाह साक्षात् क्षीर सागर ही हुआ । दूध-दही के प्रवाह रूप क्षीर सागर में बालक रूप में भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं । सन्तजनों की रक्षा में तथा दुष्टों के विनाश में वे समान रूप से लगे हुए हैं । सब प्राणियों पर अनुग्रह करने और धर्म की रक्षा करने के लिये ही भगवान् श्रीकृष्ण ने भूतल पर अवतार लिया है । जो चक्र भगवान शंकर ने श्रीहरि भगवान् के निमित्त प्रकट किया था, वही चक्र भगवान् श्रीकृष्ण के कर-कमलों में सुशोभित हो रहा है । वह चक्र भी ब्रह्म के समान है ॥ १०–१६ ॥