भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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कृष्णोपनिषत् ] [ ३६१ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri संधान किये जाने के लिये बाण बना । संसार का बीज रूप कमल भगवान् के हाथों में लीलापूर्वक सुशोभित है । भाण्डीर वट का रूप गरुड़ ने धारण किया और नारद कृष्ण के सखा श्री सुदामा हुए । साक्षात् भक्ति ही वृन्दा हुई । सब प्राणियों को कर्म का ज्ञान कराने वाली, प्रकाश दायिनी बुद्धि ही भगवान् की क्रिया शक्ति हुई । इस प्रकार यह गोप-गोपी आदि सभी भगवान श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने स्वर्ग के और बैकुण्ठ के सब देवताओं को पृथिवी पर उतारा है ॥२०—२५॥ इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी सब तीर्थों का फल प्राप्त करता और शरीर-बन्धन से मुक्त होता है—यह उपनिषद् है । ॥ कृष्णोपनिषद् समाप्त ॥ —:— Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi