१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६४ ] [ गणपत्युपनिषत् मय भी हो, तुम्हीं साक्षात् ब्रह्म हो ॥५॥ यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हारे द्वारा ही प्रकट होता है । यह विश्व तुम्हारे द्वारा ही स्थित है । यह समस्त संसार तुम्हीं में लीन हो जाता है । इस सम्पूर्ण विश्व की प्रतीति तुम में ही होती है । तुम्हीं पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो । वाणी के चार रूप परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा भी तुम हो । सत्व, रज और तम से परे—गुणातीत हो । भूत, भविष्यत्, वर्तमान से परे तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों प्रकार के शरीरों से भी परे हो । तुम मूलाधार चक्र में सदा स्थिति रहते हो । इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति यह तीनों रूप तुम्हारे ही हैं । योगी पुरुष तुम्हारा नित्य प्रति चिन्तन करते हैं । तुम ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हो । इन्द्राग्नि और वायु भी तुम ही हो । सूर्य-चन्द्रमा हो । तुम ब्रह्म हो तथा भूः भुवः स्वः रूप त्रिलोक और ओंकार रूप परब्रह्म तुम ही हो ॥६॥ गणादीन् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् । अनुस्वारः परतरः [अर्धेन्दुलसितं तथा ॥ तारेण युक्तमेतदेव मनुस्वरूपम् ॥ ७ गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वार- श्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् । नादः संधानम् । संहिता संधिः । सैषा गाणेशी विद्या ॥ ८ गणक ऋषिः । नृचद्गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपति- देवता । ॐ गणपतये नमः ॥ ६ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ १० एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणाम् । अभयं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥ ११ रक्तलम्बोदरं शूर्पसुकर्णं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ॥ १२