१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ेंगणपत्युपनिषत् [ ३६५ भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् । आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात् परम् ॥१३ एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ १४ प्रथम 'ग्' का उच्चारण कर फिर 'अ' का उच्चारण करे । इसके पश्चात् अनुस्वार का उच्चारण होता है । इस प्रकार अनुस्वार से अलंकृत 'गँ' ही तुम्हारे बीज मन्त्र का रूप है । क्योंकि अर्द्धचन्द्र रूप में ओंकार अवरुद्ध है, ।७॥ गकार इसका पूर्वरूप, अकार मध्यरूप अनुस्वार अन्तरूप तथा बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संघान, संहिता सन्धि है। इस प्रकार यह गणेश-विद्या है ॥८॥ इसके ऋषि गणक, छन्द निचृद्गायत्री, देवता महागणपति हैं ॥६॥ एक दन्त से हम परिचित हैं। उन वक्रतुण्ड का हम चिन्तन करते हैं । यह गजानन हमें प्रेरणा करें यही गणेश-गायत्री है । जो योगी चतुर्भुज, पाश-अंकुश-वर-अभय मुद्राधारी, एकदन्त, लम्बोदर, मूषक-ध्वज, रक्तवर्ण वाले, बड़े-बड़े कानों वाले, लाल वस्त्र वाले, रक्त चन्दन का लेप किये हुये, लाल रङ्ग के पुष्पों से विभूषित, भक्त पर कृपा करने वाले, विश्व के कारण, अविनाशी सृष्टि के आदि में उत्पन्न, प्रकृति और पुरुष से पर श्रीगणेश जी का नित्य चिन्तन करता है, वह सब योगियों में श्रेष्ठ होता है ॥११-१४॥ नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्ते- ऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय वरद- मूर्तये नमोनमः ॥ १५ एतदथर्वशिरो योऽधीते स ब्रह्मभूयाय कल्पते । स सर्वतः सुखमेधते । स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते । स पञ्चमहापातकोपपातकात् प्रमुच्यते । सायमधियानो दिवसकृतं पापं नाशयति । प्रातर- धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽपापो भवति । धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥ १६