१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
गणपत्युपनिषत् [ ३६५ भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् । आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात् परम् ॥१३ एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ १४ प्रथम 'ग्' का उच्चारण कर फिर 'अ' का उच्चारण करे । इसके पश्चात् अनुस्वार का उच्चारण होता है । इस प्रकार अनुस्वार से अलंकृत 'गँ' ही तुम्हारे बीज मन्त्र का रूप है । क्योंकि अर्द्धचन्द्र रूप में ओंकार अवरुद्ध है, ।७॥ गकार इसका पूर्वरूप, अकार मध्यरूप अनुस्वार अन्तरूप तथा बिन्दु उत्तर रूप है। नाद संघान, संहिता सन्धि है। इस प्रकार यह गणेश-विद्या है ॥८॥ इसके ऋषि गणक, छन्द निचृद्गायत्री, देवता महागणपति हैं ॥६॥ एक दन्त से हम परिचित हैं। उन वक्रतुण्ड का हम चिन्तन करते हैं । यह गजानन हमें प्रेरणा करें यही गणेश-गायत्री है । जो योगी चतुर्भुज, पाश-अंकुश-वर-अभय मुद्राधारी, एकदन्त, लम्बोदर, मूषक-ध्वज, रक्तवर्ण वाले, बड़े-बड़े कानों वाले, लाल वस्त्र वाले, रक्त चन्दन का लेप किये हुये, लाल रङ्ग के पुष्पों से विभूषित, भक्त पर कृपा करने वाले, विश्व के कारण, अविनाशी सृष्टि के आदि में उत्पन्न, प्रकृति और पुरुष से पर श्रीगणेश जी का नित्य चिन्तन करता है, वह सब योगियों में श्रेष्ठ होता है ॥११-१४॥ नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्ते- ऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय वरद- मूर्तये नमोनमः ॥ १५ एतदथर्वशिरो योऽधीते स ब्रह्मभूयाय कल्पते । स सर्वतः सुखमेधते । स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते । स पञ्चमहापातकोपपातकात् प्रमुच्यते । सायमधियानो दिवसकृतं पापं नाशयति । प्रातर- धीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानोऽपापो भवति । धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥ १६
३६६ ] [ गणपति उपनिषत् इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् । यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति ॥ १७ सहस्रावर्तनाद्यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् । अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति । इत्यथर्वणवाक्यं ब्रह्माद्याचरणं विद्यान्न बिभेति कदाचनेति । यो दूर्वाऽङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणो- पमो भवति । यो लाजैैर्यजति स यशोवान् भवति स मेधावान भवति । यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति । यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते । अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति । सूर्यग्रहणे महा- नद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा स सिद्धमन्त्रो भवति । महावि- घ्नात् प्रमुच्यते । महादोषात् प्रमुच्यते ॥ १८ स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति य एवं वेदेत्यु- पनिषत् ॥ १९ व्रात-नायक को नमस्कार, गणपति को नमस्कार, प्रथमपति को नमस्कार, लम्बोदर को नमस्कार, एकरदन को नमस्कार, विघ्न विनाशक को नमस्कार, शिव-सुवन को नमस्कार, वरदमूर्ति गणेशजी को नमस्कार ॥१५॥ यह अथर्वशिरस् है । इसका पाठ करने वाला पुरुष ब्रह्मत्व-प्राप्ति का अधिकारी होता है । उसके लिये किसी प्रकार का विघ्न बाधा नहीं करता । वह सभी स्थानों पर सुखी रहता है । पांचों प्रकार के पाप, उपपापों से वह छूटता है । सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों से मुक्त होता है और प्रातःकाल पाठ करने वाले के रात्रि में किये हुये पाप कट जाते हैं । प्रातः सायं दोनों काल में पाठ करने से पाप रहते ही नहीं । इसका पाठक धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को पाता है ॥१६॥ इस अथर्व शिरस् को अशिष्य को न दे, शिष्य को ही दे । मोहवश इसे देने वाला पापी होता है ॥१७॥ सहस्र बार पाठ करने पर जिस-जिस अभिलाषा का उच्चारण करे, उस-उसकी सिद्धि हो सकती
गणपत्युपनिषत् ] [ ३६७ है। इसके द्वारा गणपति का अभिषेक करने वाला वक्ता बन जाता है। चतुर्थी तिथि को उपवास करके जो इसे जपता है, वह विद्यावान् होता है—ऐसा महर्षि अथर्वण का कथन है। इस मन्त्र के द्वारा तप करने वाले को कभी भय नहीं लगता। दूर्वा के अंकुरों द्वारा गणपति का यजन करने वाला कुबेर के समान धनवान् होता है। लाजाओं के द्वारा यज्ञ करने वाला यशस्वी होता है। सहस्र मोदकों से जो पुरुष यजन करता है वह इच्छित फल पाता है। घृत और समिधा से यज्ञ करता है उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। आठ ब्राह्मणों को भले प्रकार से इसे ग्रहण करावे तो सूर्य के समान तेजस्वी हो। सूर्य ग्रहण के समय किसी महानदी या प्रतिमा के निकट बैठ कर जप करे तो मन्त्र-सिद्धि प्राप्त होती है, ऐसा साधक घोर विघ्न से भी छुटकारा पा लेता है। वह महान् दोषों और महापापों से मुक्त हो जाता है ॥१८॥ इस प्रकार जानने वाला पुरुष भी सर्व ज्ञानी हो जाता है। सर्वज्ञता प्राप्त करता है ॥१९॥ ॥ गणपति उपनिषद् समाप्त ॥ —०~०—
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें। महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और बृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ ॐ आपो वा इदमासन्त्सलीलमेव । स प्रजापतिरेकः पुष्क- रपर्णे समभवत् । तस्यान्तर्मनसिः कामः समवर्तत इदं सृजेय- मिति । तस्माद्यत्पुरुषो मनसाभिगच्छति तद्वाचा वदति तत्क- र्मणा करोति तदेषाभ्यनूक्ता । कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् । सतो बन्धुमसति । निरविन्दन्हृदि प्रतीष्य कवयो मनीषेति उपैनं तदुपनमति यत्कामो भवति य एवं वेदांग तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभम- पश्यत् तेन व सर्वमिदमसृजत यदिदं किंच । तस्मात्सर्वमानुष्टु- भमित्याचक्षते यदिदं किंच । अनुष्टुभो वा इमानि भूतानि
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१ जायन्ते ननुष्टुभा जातानि जीवन्ति अनुष्टुभं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तस्यैषा भवति अनुष्टुप्प्रथमा भवति अनुष्टुबुत्तमा भवति वाग्वा अनुष्टुप् वाचैव प्रयन्ति वाचोद्यन्ति परमा वा एषा छन्दसां यद- नूष्टुबिति ॥ १ प्राचीन काल में यह दृष्टिगोचर सम्पूर्ण विश्व जल के रूप में था । सर्वत्र जल ही जल दिखाई देता था । उसी जल में एक कमल पत्र पर सुप्रसिद्ध प्रजापति श्री ब्रह्माजी का प्राकट्य हुआ । ब्रह्माजी ने विचार किया कि मैं लोक-रचना-कार्य करूँ । यह बात सर्व विदित है कि मानव की जो भावना बनती है, उसे वह पहले वाणी द्वारा कहता और फिर क्रिया द्वारा पूर्ण करता है। इस सम्बन्ध में कहा है कि पूर्व काल में जब सृष्टि रचना हुई तब काम की उत्पत्ति हुई । ज्ञानीजन अपने मन में निहित आत्मा का निरीक्षण करते रहते हैं और काम.. को आत्मा के लिये पाश स्वरूप मानते हैं। ज्ञानियों के विचार में प्रकृति के कार्यभूत मन में काम का प्राकट्य होता है। सृष्टि से पहले जो जल ही जल था, वही इस विश्व का कारणभूत है । इस बात के जानने वाला विद्वान् जिस वस्तु की इच्छा करता है, वह वस्तु उसे मिल जाती है। सुप्रसिद्ध प्रजापति ने तप प्रारम्भ किया । उसके द्वारा उन्हें अनुष्टुप् छन्द में अवतीर्ण इस नारसिंह मन्त्रराज की प्राप्ति हुई । उसी मन्त्रराज के प्रभाव से इस प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर विश्व की उन्होंने रचना की । इसलिये इस प्रत्यक्ष विश्व को मन्त्रराज आनुष्टुभमय कहा जाता है । इस अनुष्टुप् से ही इन सम्पूर्ण भूतों की उत्पत्ति हुई है, अनुष्टुप् के प्रभाव से ही यह उत्पन्न प्राणी जीवन धारण करते हैं और मरने पर इहलोक को त्यागने पर अनुष्टुप् में ही लीन हो जाते हैं। यह अनुष्टुप् वृत्ति सम्पूर्ण लोक की रचने वाली है । वाणी से ही मनुष्य जन्म-मरण को प्राप्त होते हैं इसलिये वाणी मात्र अनुष्टुप् ही है। यह अनुष्टुप् छन्द अन्य सब छन्दों में अधिक महिमा वाला है ॥१॥
३७० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ससागरां समर्वतां सप्तद्वीपां वसुन्धरां तत्साम्नः प्रथमं पादं जानीयात् यक्षगन्धर्वाप्सरोगणसेवितमन्तरिक्षं तत्साम्नो द्वितीयं पादं जानीयाद्वसुरुद्रादित्यैः सर्वैर्देवैः सेवितं दिवं तत्साम्न- स्तृतीयं पादं जानीयात् ब्रह्मस्वरूपं निरंजनं परमं व्योमकं तत्साम्नश्चतुर्थ पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ऋग्यजुः सामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाश्चत्वारः पादा भवन्ति किं ध्यानं किं दैवतं कान्यंगानि कानि दैवतानि किं छन्दः क ऋषिरिति ॥ २ मन्त्रराज का प्रथम चरण रूप यह पर्वत, समुद्र तथा सप्तद्वीप वाली पृथिवी है । द्वितीय चरण रूप यक्षों, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा सेवित अन्तरिक्ष है । तृतीय चरण के रूप में, वसु, रुद्र और आदित्य आदि देवताओं द्वारा सेवित द्युलोक है और चतुर्थ चरण रूप माया- रहित, पवित्र, परम व्योम युक्त ब्रह्म रूप है । इन सब को इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी अमरत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज के चार पाद हैं—शाखाओं और अङ्गों सहित ऋक्, यजु, साम और अथर्व यह चारों वेद । तब प्रश्न हुआ कि मन्त्रराज का ध्यान कैसे है, उसका देवता, अङ्ग, देवताओं का गण, छन्द और ऋषि यह सब कौन-कौन हैं ? ॥२॥ स होवाच प्रजापतिः स यो ह वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं तत्साम्नोजं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते सर्वे वेदाः प्रणवादिकास्तं प्रणवं तत्साम्नोऽङ्गं वेद स त्रीँल्लोकांज यति चतुर्विंशत्यक्षरा महालक्ष्मीर्यजुस्तत्साम्नोऽङ्गं वेद स आयु- र्यशःकीर्तिज्ञानैश्वर्यवान्भवति तस्मादिदं सांगं साम जानीयाद्यो
नृसिंहपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३७१ जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति सावित्रीं प्रणव यजुलक्ष्मीं स्त्री- शूद्राय नेच्छन्ति द्वात्रिंशदक्षरं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृ- तत्वं च गच्छति सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणव यदि जानीयात् स्त्री शूद्रः स मृतोऽधो गच्छति तस्मात्सर्वदा नाचष्टे यद्याचष्टे स आचार्यस्तेनैव स मृतोऽधौ गच्छति ॥ ३ ॥ इस पर सुप्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—'जो पुरुष श्री बीज से अभिषिक्त गायत्री मन्त्र अष्टाक्षरी पद को इस मन्त्रराज साम ही अंग समझता है वह श्रीसम्पन्न होता है । सभी वेदों के आदि में प्रणव है । अतः जो ज्ञानी इस प्रणव को साम का ही अंग मानता है वह त्रिलोकी पर विजय प्राप्त कर लेता है । चौबीस अक्षरों वाला महालक्ष्मी मन्त्र यजुर्वेद का ही स्वरूप है, उसे साम का अंग मानने वाला ज्ञानी यश, कीर्ति, ज्ञान, आयु और ऐश्वर्य से युक्त होता है । जो पुरुष अंगों सहित साम का ज्ञाता है, वह अमृतत्व प्राप्त करता है, इसलिए इस साम को अंगों सहित जानना चाहिये । ज्ञानीजन प्रणव, गायत्री और यजु स्वरूप महालक्ष्मी मन्त्र अनधिकारी जीवों को नहीं बताते । क्योंकि ऐसे व्यक्ति इन्हें जान लें तो भी उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त नहीं होती । इसलिये मन्त्र देने में सदा सावधान रहना चाहिये । जो आचार्य आदि किसी अनधिकारी को मन्त्रोपदेश करे, वह भी अधोगति प्राप्त करता है । बत्तीस अक्षर वाले साम को जानना चाहिये, उसका जानने वाला अमृतत्व को पाता है ॥ ३ ॥ स होवाच प्रजापतिः अग्निर्वै देवा इदं सर्वं विश्वा भूतानि प्राणा वा इन्द्रियाणि पशवोऽन्नममृतं सम्राट स्वराड्विराट् तत्साम्नः प्रथमं पादं जानीयात् ऋग्यजुःसामाथर्वरूपः सूर्योऽन्त- रादित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तत्साम्नो द्वितीयं पादं जानीयात् य ओषधीनां प्रभुर्भवति ताराधिपतिः सोमस्तत्साम्नस्तृतीयं पादं
३७२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जानीयात् स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् तत्साम्नश्चतुर्थं पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति उग्रं प्रथमस्याद्यं ज्वलं द्वितीयस्याद्यं नृसिंह तृतीयस्याद्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम यत्र कुत्रचिन्नाचष्टे यदि दातुमपेक्षते पुत्राय शुश्रूषवे दास्यत्यन्यस्मै शिष्याय वा चेति ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी फिर कहने लगे—'सम्पूर्ण विश्व, सम्पूर्ण प्राणी, सम्पूर्ण वेद, अग्नि, प्राण, इन्द्रिय, अन्न, पशु, अमृत, सम्राट, स्वराट्, विराट् इन सब को मन्त्रराज साम का प्रथम चरण जानना चाहिए । ऋक्, यजु, साम, अथर्व रूप सूर्य उनके मण्डल में स्थित हिरण्यमय पुरुष, यह साम का दूसरा चरण जानना चाहिए । सब औषधियों और तारागणों के स्वामी चन्द्रमा को साम का तृतीयचरण जाने ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि और अविनाशी परमेश्वर इन्हें साम का चतुर्थ चरण जाने । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण का आदि अंश 'उग्रम्' है, द्वितीय चरण का आदि अंश 'ज्वलं' है, तृतीय चरण का आदि अंश 'नृसिंह' है और चतुर्थ चरण का आदि अंश 'मृत्यु' हैं। इन चारों को साम स्वरूप ही समझना चाहिए । ऐसा समझने वाला ज्ञानी अमृतत्व की प्राप्त होता है। यह मन्त्र किसी को देना हो तो जो इसका उपदेश लेना चाहे ऐसे सेवा परायण पुत्र को अथवा सदाचारी शिष्य आदि को देना चाहिए ॥ ४ ॥ स होवाच प्रजापतिः क्षीरोदार्णवशायिनं नृकेसरिविग्रहं योगिध्येयं परं पदं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं प्रथमस्याद्यार्द्धान्त्यं तं स द्वितीयस्याद्यार्द्धान्त्यं हं भी तृतीयस्याद्यान्त्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यार्द्धान्त्यं साम तु जानीयाद्यो
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७३ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम येन केनचिदा- चार्यमुखेन यो जानीते स तेनैव शरीरेण संसारान्मुच्यते मोचयति मुमुक्षुर्भवति जपात्तेनैव शरीरेण देवतादर्शनं करोति तस्मादिदमेव मुख्यद्वार कलौ नान्येषां भवति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ ५ ॥ सुप्रसिद्ध प्रजापति ने पुनः कहा—'भगवान् का जो नृसिंह रूप विग्रह क्षीर सागरशायी है, वह परमपद रूप है तथा योगियों के लिये भी ध्यान करने योग्य है । उस विग्रह को सामवेद का ही रूप माने । जो ऐसा मानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'वीर' है । द्वितीय चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'तं सं' है । तृतीय चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'हृं भी' है और चतुर्थ चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'मृत्युम्' पद है । इन सब को साम ही जानना चाहिए । जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । अतः जो इस साम को किसी आचार्य के मुख से प्राप्त कर इस प्रकार जानता है, वह इस जीवन में ही भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है और अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य व्यक्तियों को भी भव-पाश से छुड़ाता है । जो व्यक्ति सांसारिक मोह ममता में पड़ा है, वह इसे सुनकर मुक्ति की कामना करने लगता है । इस मन्त्रराज साम के जप से इसी देह में भगवान् नृसिंह का दर्शन कर लेता है । कलियुग में मुक्ति का यह एक सरल मार्ग है । अतः इस साम को अङ्गों सहित भले प्रकार जान ले । इसे जो भले प्रकार जान लेता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम् । ऊर्ध्वरेतं विरू- पाक्षं शङ्कर नीलोहितम् ॥ उमापतिः पशुपतिः पिनाकी ह्यमितद्युतिः । ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधि- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
३७४ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्यो वै यजुर्वेदवाच्यस्तं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति महाप्रथमान्तार्धस्याद्यन्तवतो द्वितीयान्तार्धस्याद्यंषणं तृतीयान्तार्धस्याद्यन्नाम चतुर्थान्तार्धस्याद्यं साम जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम सच्चिदानन्द- मयं परं ब्रह्म तमेवंविद्वानमृतं इह भवति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ ६ ॥ विश्वसृज एतेन वै विश्वमिदमसृजन्त यदिदंविश्वमसृजन्त तस्माद्विश्वसृजो विश्वमेनाननु प्रजायते ब्रह्मणः सलोकतां साष्ट्रितां सायुज्यं यान्ति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति विष्णुं प्रथमान्त्यं मुखं द्वितीयान्त्यं भद्रं तृतीयान्त्यं म्यहं चतुर्थान्त्यं साम जानीयाद्यो जानीते तोऽमृतत्वं च गच्छति योऽसौ वेद यदिदं किञ्चात्मनि ब्रह्मण्येवानुष्टुभं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति स्त्रीपुंसयोर्वा इहैव स्थातुमपेक्षते तस्मै सर्वैश्वर्यं ददाति यत्र कुत्रापि म्रियते देहान्ते देवः परमं ब्रह्म तारकं व्याचष्टे येनासावमृतीभूत्वा सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम मध्यगं जपति तस्मादिदं सामाङ्गं प्रजापतिस्तस्मादिदं सामाङ्गं प्रजा- पतिर्य एवं वेदेति महोपनिषत् । य एतां महोपनिषदं वेद स कृतपुरश्चरणो महाविष्णुर्भवति । महाविष्णुर्भवति । इति प्रथमो- पनिषत् ॥ ७ ॥
भगवान् नृसिंह अन्तर्यामी और सर्वव्यापी परमेश्वर हैं । उन्हें ऋत और सत्य समझना चाहिए । वे मनुष्य और सिंह की संयुक्त आकृति वाले, काले-पीले रङ्ग से युक्त हैं । उनके नेत्र अत्यन्त विकराल तथा भयङ्कर हैं । वही कल्याणकारी शिव हैं । कण्ठ में नीलवर्ण और उसके ऊर्ध्व भाग में तेजोमय लोहित वर्ण का होने के कारण 'नील लोहित' कहलाते हैं । वे सर्व देवात्मक भगवान् नृसिंह ही गिरिजा, उमापति, पशुपति, धनुर्धारी और अत्यन्त तेजस्वी महेश्वर
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७५ हैं। वे सम्पूर्ण विद्याओं और भूतों के स्वामी हैं। जो देवपति, ब्रह्मा के भी स्वामी और यजुर्वेद के वाच्यार्थ हैं, उन भगवान् नृसिंह को साम ही जान ले। जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'महा' है, द्वितीय चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'व॑न्तो' है, तृतीय- चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'षणं' है, चतुर्थ चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'नमा' है। इन सब को ही साम जाने। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। यह साम सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म ही है। उसे इस प्रकार जानने वाला पुरुष इस देह के रहते ही अमरत्व को प्राप्त होता है। इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार इसका ज्ञाता है वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करता है। विश्व के रचने वाले प्रजापतियों ने ही इस साम युक्त मन्त्र के द्वारा सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। इसीलिये वे विश्व रचयिता कहे गए हैं। यह विश्व उनसे ही प्रकट हुआ है। इस रहस्य के ज्ञाता ज्ञानी- जन ब्रह्मलोक और उसके पद को प्राप्त करते हैं। इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानते हैं वे भव-बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करते हैं ॥ ६ ॥ मन्त्रराज के प्रथम चरण का अन्तिमपद 'विष्णु' है, द्वितीय- चरण का अन्तिम पद 'मुखम्' है, तृतीय चरण का अन्तिम पद 'भद्रं' है तथा चतुर्थ चरण का अन्तिम पद 'म्यहम्' है। इन सब को साम जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। प्रजापति ने ही इन सब तत्वों को जाना। ब्रह्म में स्थित इस अनुष्टुभ मन्त्र की ब्रह्म में ही स्थिति है। जो ज्ञानी इस प्रकार जानता है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है।
३७६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जो साधक स्त्री पुरुष इस लोक में उत्तम आचरणपूर्वक रहकर आनन्द में स्थित रहने की की इच्छा करते हैं, भगवान् नृसिंह उनके लिए सम्पूर्ण ऐश्वर्य देते हैं। वह जहाँ भी देह-त्याग करता है वहीं भगवान् नृसिंह उसे तारक मन्त्र का उपदेश कर अमृतत्व प्राप्त कराते हैं। मोक्ष- प्राप्ति के इच्छुकों तारक मन्त्र का जाप करना उचित है। साम के अङ्गभूत प्रजापति मन्त्रदृष्टा होने से तारक मन्त्र है। ऐसा जानने वाला ही सच्चा साधक होता है। यह महोपनिषद् है, जो जानता है, वह साक्षात् विष्णु स्वरूप हो जाता है ॥ ७ ॥ ॥ प्रथम उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयुस्ते प्रजा- पतिमुपाधावंस्तेभ्य एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रायच्छत्तेन वै ते मृत्युमजयन् पाप्मानं चातरन्संसारं चातरंस्तस्माद्यो मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयात्स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रतिगृह्णीयात्स मृत्युं तरति स पाप्मानं तरति स संसारं तरति तस्य ह वै प्रणवस्य या पूर्वा मात्रा पृथिव्यकारः स ऋग्भि- र्ऋग्वेदो ब्रह्मा वसवो गायत्री गार्हपत्यः सा साम्नः प्रथमः पादो भवति द्वितीयान्तरिक्षं स उकारः स यजुर्भैर्यजुर्वेदो विष्णुरुद्रास्त्रिष्टुब्दक्षिणाग्निः सा साम्नो द्वितीयः पादो भवति तृतीया द्यौः स मकारः स सामभिः सामवेदो रुद्रा आदित्या जगत्याहवनीयः सा साम्नस्तृतीयः पादो भवति यावसानेऽस्य चतुर्थ्यर्धमात्रा सा सोमलोक ओंकारः सौऽथर्वणैर्मन्त्रैरथर्ववेदः संवर्तकोऽग्निर्मरुतो विराडेकर्षिर्भास्वती स्मृता सा साम्नश्चतुर्थः पादो भवति ॥ १ ॥ एक समय की बात है कि मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता अत्यन्त भयभीत हुए और भागकर प्रजापति ब्रह्माजी की शरण में पहुंचे। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान् नृसिंह का मन्त्रराज आनुष्टुभ् बताया।
नृसिंहपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३७७ देवताओं ने इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त करली । वे सब पापों से मुक्त हो गये और इस संसाररूपी समुद्र को भी लांघ गये । अतः जो मनुष्य मृत्यु, पाप और भवसागर से भय मानता हो, वह इस मन्त्रराज की शरण ग्रहण करे । जो इस प्रकार मन्त्रराज की शरण लेता है, वह मृत्यु, पाप और इस संसार से भी तर जाता है । प्रणव भी पूर्वोक्त मन्त्रराज का ही अङ्ग है। वह प्रणव प्रथम मात्रा 'अ'कार वाला है, पृथ्वी उसका लोक और ऋचाओं से विभूषित ऋग्वेद ही उसका वेद, देवता ब्रह्मा तथा छन्द गायत्री है, वह वसु देव- ताओं का गण है और गार्हपत्य अग्नि रूप है यह सब प्रणव की प्रथम मात्रा में ही निहित है और यही साम का प्रथम पाद है । प्रणव की द्वितीय मात्रा 'उ'कार है। अन्तरिक्ष लोक, यजुर्मन्त्रों- युक्त यजुर्वेद, विष्णु और रुद्र देवों का गण, दक्षिण अग्नि और त्रिष्टुप् छन्द, यह द्वितीय मात्रा है। यह साम का द्वितीय पाद है । प्रणव की तृतीय मात्रा 'त'कार है। द्युलोक, सामवेद, रुद्र और आदित्य का गण, जगती छन्द और आहवनीय अग्नि यह सब तृतीय मात्रा के अन्तर्गत हैं। यह तृतीय मात्रा ही साम का तृतीय- पाद है । प्रणव की चौथी मात्रा में नादात्मक अद्धंमात्रा का आभास मिलता है। उसमें चन्द्रलोक, ओंकारवाची परब्रह्म, अथर्ववेद, संवर्तक नामक अग्नि, मरुद्गण तथा विराट् छन्द है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं। यह ब्रह्म रूपिणी होने से अत्यन्त प्रकाश वाली है। यह चतुर्थमात्रा ही साम का चतुर्थपाद है ॥ १ ॥ अष्टाक्षरः प्रथमा पादो भवत्यष्टाक्षरास्त्रयः पादा भव- न्त्येवं द्वात्रिंशदक्षराणि संपद्यन्ते द्वात्रिंशदक्षरा वा अनुष्टुब्भव- त्यनुष्टुभा सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमुपसंहृतं तस्य हैतस्य
३७८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् पञ्चाङ्गानि भवन्ति चत्वारः पादाश्चत्वार्यङ्गानि भवन्ति सप्रणवं सर्वं पञ्चमं भवति हृदयाय नमः शिरसे स्वाहा शिखायै वषट् कव- चाय हुं अस्त्राय फडिति प्रथमं प्रथमेन संयुज्यत द्वितीयं द्वितीयेन तृतीयं तृतीयेन चतुर्थं चतुर्थेन पञ्चमं पञ्चमेन व्यतिषजति व्यति- षिक्तावा इमे लोकास्तस्माद्व्यतिषिक्तान्यङ्गानि भवन्ति ओमित्ये- तदक्षरमिदं सर्वं तस्मात्प्रत्यक्षरमुभयत ओंकारो भवति अक्षराणां न्यासमुपदिशन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ २ ॥ आठ अक्षरों का अनुष्टुप् मन्त्र का प्रथम चरण है। आठ-आठ अक्षरों के ही शेष तीन चरण हैं। इस प्रकार चारों पदों में बत्तीस अक्षर होते हैं। इस अनुष्टुप् से ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि हुई है। सब का उपसंहार भी अनुष्टुप् के द्वारा ही होता है। इसके चार अङ्गों का चरणों के रूप में ऊपर वर्णन हुआ है, परन्तु प्रणव उसका पांचवां अङ्ग है। इस प्रकार अनुष्टुप् पांच अङ्गों वाला है। मनुष्य शरीर के भी पांच अङ्ग हैं—हृदय, शिर, शिखा, बाहुमूल और मस्तक। दोनों के पांच- पांच अङ्ग होने से मन्त्र के प्रथम अङ्ग का हृदय से संयोग करे, दूसरे अंग का शिर से, तीसरे अंग का शिखा से, चौथे अंग का दोनों बाहुमूलों से तथा पांचवें अंग का मस्तक से संयोग करे। जैसे सम्पूर्ण लोक परस्पर मिले हुए हैं वैसे ही दोनों के अंग भी परस्पर सम्बद्ध हैं। ओंकार को सम्पूर्ण विश्व माना गया है। इसीलिए अनुष्टुप् के प्रत्येक अक्षर के दोनों ओर ओंकार का सम्पुट देना चाहिए। ब्रह्मज्ञानीजन इस मन्त्र के प्रत्येक अक्षर के न्याय की बात कहते हैं ॥ २ ॥ तस्य ह वा उग्रं प्रथमं स्थानं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं द्वितीयं स्थानं महाविष्णुं तृतीयं स्थानं ज्वलन्तं चतुर्थं स्थानं सर्वतोमुखं पञ्चमं स्थानं नृसिंह
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७६ षष्ठं स्थानं भीषणं सप्तमं स्थानं भद्रमष्टमं स्थानं मृत्युमृत्युं नवमं स्थानं नमामि दशनं स्थानमहमेकादशं स्थानं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति एकादशपदा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमिदमुपसंहृतं तस्मात्सर्वानुष्टुभं जानीयाद्यो जानीते सोऽम तत्वं च गच्छति ॥३॥ अनुष्टुप् का प्रथम स्थान 'उग्रम्'पद है। जो इसे जानता है, वह अमर हो जाता है। द्वितीय स्थान 'वीरम्' है, तृतीय स्थान 'महाविष्णुम्' है, चतुर्थ स्तान 'ज्वलन्तम्' है, पञ्चम स्थान 'सर्वतोमुखम्' है छठा स्थान 'नृसिंहम्' है, सातवां स्थान 'भीषणम्' आठवां स्थान 'भद्रम्' है, नौवां स्यान, 'मृत्युमृत्युम्' है, दसवां स्थान 'नमामि' है और ग्यारहवां स्थान 'अहम्' है इस प्रकार जाने। जो ऐसा जानता है वह अमृतत्त्व को प्राप्त होता है। यह अनुष्टुप् वृत्ति ग्यारह पदों वाली है, इसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई है, इसी के द्वारा सब का उपसंहार होता है। इस लिये यह सब अनुष्टुप् की ही महिमा है। जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को पाता है ॥३॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नथ कस्मादुच्यत उग्रमिति स होवाच प्रजापतिर्यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वाना- त्मनः सर्वाणि भूतान्युद्गृह्णात्यजस्रं सृजति विसृजति वासय- त्युद्ग्राह्यत उद्गृह्यते स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीम- मुपहतनुमुग्रं मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यत्ते अस्मन्निवपन्तु सेनाः तस्मादुच्यत उग्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते वीरमिति यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि विरमति विरामयत्यजस्रं सृजति विसृजति वासयति यो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामस्त- स्मादुच्यते वीरमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते महाविष्णुमिति ॥
[Header] ३८० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
[Main Text] यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि व्याप्नोति व्यापयति स्नेहो यथा पललपिण्डं शान्त- मूलमोतं प्रोतमनुव्यास व्यतिषिक्तो व्याप्यते व्यापयते यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा प्रजापतिः प्रजया संविदानः त्रीणि ज्योतींषि सचते सषोडशीं तस्मा दुच्यते महाविष्णुमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते ज्वलन्तमिति यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि स्वतेजसा ज्वलति ज्वालयति ज्वाल्यते ज्वालपते सविता प्रसविता दीप्तो दीपयन्दीन्यमानः ज्वल ज्वलिता तपन्वित- पन्तसंतपन्नोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणस्तस्मा- दुच्यते ज्वलन्तमिति ॥ यह सुनकर कर देवताओं ने प्रश्न किया—'नृसिंह भगवान् के लिए 'उग्रम्' क्यों कहा गया है ?' प्रसिद्ध प्रजापति ने इसका उत्तर दिया—'भगवान् नृसिंह अपनी महिमा से सब देवताओं, सब भूतों सब आत्माओं और सब लोकों को ऊपर उठाते हैं, वही उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार करते हैं, वे ही उन्हें अपने में लीन कर लेते हैं। संसार पर दूसरों से अनुग्रह कराते और स्वयं भी करते हैं। इसीलिए उन्हें उग्र कहा जाता है। इस विषय में ऋग्वेद में कहा है, श्रुतियां जिनकी स्तुति करती हैं, उन्हीं परमेश्वर की स्तुति करो। वे हृदय रूप गर्त में हैं, नवीन तरुणाई से शोभाय- मान हैं, सिंह रूप से प्रकट होते हुए भी भक्तों के लिये विकराल नहीं हैं। सब पर कृपा करने के लिये वे सब स्थान पर तथा सब के समीप पहुँचते हैं। वे सन्तजनों पर कृपा और दुष्टों को नष्ट करने वाले हैं, इसलिए उग्र कहे जाते हैं। हे भगवान नृसिंह ! आप इस स्तुति से संतुष्ट होकर मुझ स्तोता को सुखी करो। आपकी भयङ्कर सेना हम पर आक्रमण न करे, वह कहीं अन्यत्र जाय । इस मंत्र में
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भगवान् नृसिंह को 'उग्र' कह कर स्तुति की है, इसलिए उन्हें उग्र कहा गया है।' इसके पश्चात् देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवन् ! प्रभु श्रीनृसिंह को 'वीर' क्यों कहा गया है ?' इस पर ब्रह्माजी ने कहा—'भगवान नृसिंह अपनी महिमा के द्वारा ही सब भूतों के साथ विभिन्न प्रकार के खेल खेलते हैं, वही सब लोकों और सब देवताओं में व्याप्त हैं, सभी आत्मा उन्हीं का प्रतिरूप मात्र हैं। वही सृष्टि के पालन और विनाश करने वाले हैं। सम्पूर्ण विश्व प्रलय के पश्चात् उन्हीं में लीन हो जाता है, इसलिए वे 'वीर' कहे गए हैं । ऋग्वेद में भी भगवान् को वीर कहा गया है, वे भक्तों पर तुरन्त कृपा करने वाले हैं, वे कर्मठ हैं क्योंकि सोमयाग में पाषण हाथ में लेकर अध्वर्यु आदि के रूप में सोम निष्पीडन करते हैं। यही देव- ताओं की रचना करने की कामना करते रहते हैं।' देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवान को 'महाविष्णु क्यों कहा जाता है ? 'ब्रह्माजी' बोले—'भगवान नृसिंह अपनी महिमा से सब देव- ताओं, सब आत्माओं, समस्त भूतों और सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त करते हैं। मांस पिण्ड में चिकनाई के व्याप्त रहने के समान देह के सब अवयवों में व्याप्त हैं। यह संसार प्रलयकाल में, उनमें ही लय हो जाता है, क्योंकि यह उन्हीं से संबंधित है।' ऋग्वेद में भी इनकी महिमा का वर्णन हुआ है—जो सर्वव्यापी होने से समस्त संसार में व्याप्त हैं, जो प्रजा-पालक और प्रजा के उपास्यदेव हैं, जिनसे प्रबल अन्य कोई भी प्रकट नहीं हुआ, वे भगवान सोलह कलाओं से युक्त होकर तीनों प्रकार के तेजों में व्याप्त रहते हैं। इसलिए इन्हें 'महाविष्णु' कहा जाता है। देवता पूछने लगे—"यह 'ज्वलन्त' क्यों कहे जाते हैं ?" प्रजापति
३८२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ने उत्तर दिया- "भगवान् अपने महत्त्व से ही सब देवताओं, सब आत्माओं सब लोकों और सब भूतों को अपने तेज से प्रकाशित करते और उसी तेज से स्वयं भी प्रकाशित रहते हैं। सभी लोक और ज्योतियाँ उनके तेज से प्रकाशित होकर अपना प्रकाश फैलाते हैं। ऋग्वेद में कहा कि—"वे सविता हैं, प्रसविता भी वही हैं, वे प्रकाश से युक्त हैं, वे स्वयं प्रज्ज्वलित रहकर दूसरों को भी प्रज्ज्वलित करते हैं। वे स्वयं तपते और दूसरों को तपाते हैं। वे अपने तेज से ही कान्तियुक्त हैं तथा अपनी कान्ति से दूसरों को कान्तिमान बनाते हैं। वे परम कल्याणरूप एवं सुशोभित हैं तथा अन्य पदार्थ उन्हीं के द्वारा सुशोभित होते हैं। इसीलिये ज्ञानीजन उन्हें 'ज्वलन्त' कहते हैं। अथ कस्मादुच्यते सर्वतोमुखमिति यस्मात्स्महिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि स्वयमनिन्द्रि योऽपि सर्वतः पश्यति सर्वतः शृणोति सर्वतो गच्छति सर्वत आदत्ते सर्वगः सर्वगतस्तिष्ठा । एकः पुरन्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः । यमप्येति भुवनं सांपराये नमामि तमहं सर्वतोमुखम् । तस्मादुच्यते सर्वतोमुखमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते नृसिंहमिति यस्मात्सर्वेषां भूतानां ना वीर्यंतमः श्रेष्ठतमश्च सिंहो वीर्यतमः श्रेष्ठतमश्च । तस्मान्नृसिंह आसीत्परमेश्वरो जगद्धितं वा एतद्रू पं यदक्षरं भवति प्रतिद्विष्णुस्तवते वीर्याय मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेण्वधिक्षियन्ति भुव- नानि विश्वा तस्मादुच्यते नृसिंहमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते भीषणमिति यस्माद्भीषणं यस्य रूपं दृष्ट्वा सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि भीत्या पलायन्ते स्वयं यतः कुतश्च न बिभेति भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः भीषास्मादग्नि- श्चेन्द्रस्य मृत्युर्धावति पञ्चम इति तस्मादुच्यते भीषणमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते भद्रोमिति यस्मात्स्वयं भद्रो भूत्वा सर्वदा भद्रं
[Header] नृसिंहपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३८३
ददाति रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः । भद्रं कर्णेभिः शृणुयामः देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरंगै- स्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः तस्मादुच्यते भद्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति यस्मात्स्वमहिम्ना स्वभक्तानां स्मृत एव मृत्युमपमृत्युं च मारयति । य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः यस्य छायामृतं यो मृत्युमृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम । तस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते नमामीति यस्माद्यं सर्वे देवा नमन्ति मुमुक्षवो ब्रह्मवादिनश्च । प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युकथ्यं यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे तस्मादुच्यते नमा- मीति ॥ अथ कस्मादुच्यतेऽहमिति । अहमस्मि प्रथमजा ऋतऽस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाभिः । यो मा ददाति स इदेवमावाः अहमन्नमन्नमदन्तमद्मि अह ं विश्वं भुवनमभ्यभवां सुवर्णज्योतिर्र्यं एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ इति द्वितीयोपनिषत् ॥ २ ॥ देवता पूछने लगे—'वे 'सर्वतोमुख' किस लिये कहे जाते हैं ?' ब्रह्माजी ने कहा— सब प्राणियों, आत्माओं, देवताओं और सभी लोकों को वे अपनी महिमा के द्वारा ही, इन्द्रियों से परे होते हुए भी सबको सब ओर देखते हैं। वे सब ओर से सुनते, सब ओर से ग्रहण करते और सब ओर गमन करते हैं । वे सभी स्थानों में समान रूप से व्याप्त रहते हैं । ऋग्वेद में उनकी महिमा का वर्णन इस प्रकार किया गया है—"जो भगवान सृष्टि से पूर्व अकेले ही थे और स्वयं ही इस विश्व रूप से उत्पन्न हो गए, जिनके द्वारा इस विश्व की सृष्टि हुई, जो सब लोकों का पालन करते हैं तथा समस्त सृष्टि अन्त में, उन्हीं में लीन हो जाती है, वे भगवान सर्वतोमुख हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।' इसमें भगवान को सर्वतोमुख कहा गया है, इसलिए वे 'सर्वतोमुख' कहाते हैं !
३८४ ] नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् देवताओं ने पूछा—"भगवान को नृसिंह क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी बोले—'सब प्राणियों में मानव का पराक्रम प्रसिद्ध है और सिंह भी सबसे अधिक पराक्रमी होता है। अतः नर और सिंह दोनों के संयुक्त रूप से पराक्रम में अधिक प्रबलता होती है, इसीलिए भगवान ने यह रूप धारण किया है। वे अपने इस रूप से विश्व का कल्याण करते हैं। उनका यह स्वरूप अविनाशी एवं सनातन है। वेद में कहा है—"भगवान विष्णु सिंह रूप धारण कर स्तोताओं द्वारा प्रस्तुत होते हैं। विभिन्न स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की जाती है। स्तोतागण विभिन्न प्रकार की शक्तियों को पाने के लिए उनकी स्तुति करते हैं। सिंह रूपधारी होने पर भी भगवान् अपने भक्तों के लिए भयङ्कर नहीं होते। वे पृथ्वी और पर्वत सर्वत्र हैं, सब रूपों में स्थिति हैं और स्तोता की वाणी में भी निहित हैं। इनके तीन डगों में लीन लोक समा गए। इसीलिए उन्हें 'नृसिंह कहा जाता है।' देवताओं ने प्रश्न किया—"उन्हें भीषण क्यों कहा जाता है ?" प्रजापति ने कहा—"इनके भीषण रूप से सब भयभीत होते हैं। सभी देवता, सभी प्राणी और सब लोक इनकी विकरालता से कांप कर भागते हैं, परन्तु यह किसी से भी नहीं डरते। वेद में कहा है— "इनके भय से ही सूर्य समय से प्रकाशित होता है। इनके भय से ही वायु चलता है और अग्नि तपता है, इन्द्र भी इन्हीं के भय से वर्षा आदि कर्म करते हैं तथा मृत्यु भी इनके भय से ही प्राणियों को देह से मुक्त करती है। इसीलिए यह 'भीषण' कहे जाते हैं।" देवताओं ने पूछा—"इन्हें भद्र क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया—"भद्र का तात्पर्य कल्याण से है। वे भगवान् कल्याण स्वरूप हैं और दूसरों का भी कल्याण करते हैं। वे स्वयं कान्तिमान हैं और दूसरों को भी कान्ति प्रदान करते हैं। वे स्वयं शोभा सम्पन्न हैं इसलिए दूसरों को भी शोभा सम्पन्न करते हैं। वेद में कहा है कि