भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७५ हैं। वे सम्पूर्ण विद्याओं और भूतों के स्वामी हैं। जो देवपति, ब्रह्मा के भी स्वामी और यजुर्वेद के वाच्यार्थ हैं, उन भगवान् नृसिंह को साम ही जान ले। जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'महा' है, द्वितीय चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'व॑न्तो' है, तृतीय- चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'षणं' है, चतुर्थ चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'नमा' है। इन सब को ही साम जाने। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। यह साम सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म ही है। उसे इस प्रकार जानने वाला पुरुष इस देह के रहते ही अमरत्व को प्राप्त होता है। इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार इसका ज्ञाता है वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करता है। विश्व के रचने वाले प्रजापतियों ने ही इस साम युक्त मन्त्र के द्वारा सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। इसीलिये वे विश्व रचयिता कहे गए हैं। यह विश्व उनसे ही प्रकट हुआ है। इस रहस्य के ज्ञाता ज्ञानी- जन ब्रह्मलोक और उसके पद को प्राप्त करते हैं। इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानते हैं वे भव-बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करते हैं ॥ ६ ॥ मन्त्रराज के प्रथम चरण का अन्तिमपद 'विष्णु' है, द्वितीय- चरण का अन्तिम पद 'मुखम्' है, तृतीय चरण का अन्तिम पद 'भद्रं' है तथा चतुर्थ चरण का अन्तिम पद 'म्यहम्' है। इन सब को साम जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। प्रजापति ने ही इन सब तत्वों को जाना। ब्रह्म में स्थित इस अनुष्टुभ मन्त्र की ब्रह्म में ही स्थिति है। जो ज्ञानी इस प्रकार जानता है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है।