भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३७६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जो साधक स्त्री पुरुष इस लोक में उत्तम आचरणपूर्वक रहकर आनन्द में स्थित रहने की की इच्छा करते हैं, भगवान् नृसिंह उनके लिए सम्पूर्ण ऐश्वर्य देते हैं। वह जहाँ भी देह-त्याग करता है वहीं भगवान् नृसिंह उसे तारक मन्त्र का उपदेश कर अमृतत्व प्राप्त कराते हैं। मोक्ष- प्राप्ति के इच्छुकों तारक मन्त्र का जाप करना उचित है। साम के अङ्गभूत प्रजापति मन्त्रदृष्टा होने से तारक मन्त्र है। ऐसा जानने वाला ही सच्चा साधक होता है। यह महोपनिषद् है, जो जानता है, वह साक्षात् विष्णु स्वरूप हो जाता है ॥ ७ ॥ ॥ प्रथम उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयुस्ते प्रजा- पतिमुपाधावंस्तेभ्य एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रायच्छत्तेन वै ते मृत्युमजयन् पाप्मानं चातरन्संसारं चातरंस्तस्माद्यो मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयात्स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रतिगृह्णीयात्स मृत्युं तरति स पाप्मानं तरति स संसारं तरति तस्य ह वै प्रणवस्य या पूर्वा मात्रा पृथिव्यकारः स ऋग्भि- र्ऋग्वेदो ब्रह्मा वसवो गायत्री गार्हपत्यः सा साम्नः प्रथमः पादो भवति द्वितीयान्तरिक्षं स उकारः स यजुर्भैर्यजुर्वेदो विष्णुरुद्रास्त्रिष्टुब्दक्षिणाग्निः सा साम्नो द्वितीयः पादो भवति तृतीया द्यौः स मकारः स सामभिः सामवेदो रुद्रा आदित्या जगत्याहवनीयः सा साम्नस्तृतीयः पादो भवति यावसानेऽस्य चतुर्थ्यर्धमात्रा सा सोमलोक ओंकारः सौऽथर्वणैर्मन्त्रैरथर्ववेदः संवर्तकोऽग्निर्मरुतो विराडेकर्षिर्भास्वती स्मृता सा साम्नश्चतुर्थः पादो भवति ॥ १ ॥ एक समय की बात है कि मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता अत्यन्त भयभीत हुए और भागकर प्रजापति ब्रह्माजी की शरण में पहुंचे। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान् नृसिंह का मन्त्रराज आनुष्टुभ् बताया।