१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनृसिंहपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३७७ देवताओं ने इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त करली । वे सब पापों से मुक्त हो गये और इस संसाररूपी समुद्र को भी लांघ गये । अतः जो मनुष्य मृत्यु, पाप और भवसागर से भय मानता हो, वह इस मन्त्रराज की शरण ग्रहण करे । जो इस प्रकार मन्त्रराज की शरण लेता है, वह मृत्यु, पाप और इस संसार से भी तर जाता है । प्रणव भी पूर्वोक्त मन्त्रराज का ही अङ्ग है। वह प्रणव प्रथम मात्रा 'अ'कार वाला है, पृथ्वी उसका लोक और ऋचाओं से विभूषित ऋग्वेद ही उसका वेद, देवता ब्रह्मा तथा छन्द गायत्री है, वह वसु देव- ताओं का गण है और गार्हपत्य अग्नि रूप है यह सब प्रणव की प्रथम मात्रा में ही निहित है और यही साम का प्रथम पाद है । प्रणव की द्वितीय मात्रा 'उ'कार है। अन्तरिक्ष लोक, यजुर्मन्त्रों- युक्त यजुर्वेद, विष्णु और रुद्र देवों का गण, दक्षिण अग्नि और त्रिष्टुप् छन्द, यह द्वितीय मात्रा है। यह साम का द्वितीय पाद है । प्रणव की तृतीय मात्रा 'त'कार है। द्युलोक, सामवेद, रुद्र और आदित्य का गण, जगती छन्द और आहवनीय अग्नि यह सब तृतीय मात्रा के अन्तर्गत हैं। यह तृतीय मात्रा ही साम का तृतीय- पाद है । प्रणव की चौथी मात्रा में नादात्मक अद्धंमात्रा का आभास मिलता है। उसमें चन्द्रलोक, ओंकारवाची परब्रह्म, अथर्ववेद, संवर्तक नामक अग्नि, मरुद्गण तथा विराट् छन्द है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं। यह ब्रह्म रूपिणी होने से अत्यन्त प्रकाश वाली है। यह चतुर्थमात्रा ही साम का चतुर्थपाद है ॥ १ ॥ अष्टाक्षरः प्रथमा पादो भवत्यष्टाक्षरास्त्रयः पादा भव- न्त्येवं द्वात्रिंशदक्षराणि संपद्यन्ते द्वात्रिंशदक्षरा वा अनुष्टुब्भव- त्यनुष्टुभा सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमुपसंहृतं तस्य हैतस्य