भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३७८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् पञ्चाङ्गानि भवन्ति चत्वारः पादाश्चत्वार्यङ्गानि भवन्ति सप्रणवं सर्वं पञ्चमं भवति हृदयाय नमः शिरसे स्वाहा शिखायै वषट् कव- चाय हुं अस्त्राय फडिति प्रथमं प्रथमेन संयुज्यत द्वितीयं द्वितीयेन तृतीयं तृतीयेन चतुर्थं चतुर्थेन पञ्चमं पञ्चमेन व्यतिषजति व्यति- षिक्तावा इमे लोकास्तस्माद्व्यतिषिक्तान्यङ्गानि भवन्ति ओमित्ये- तदक्षरमिदं सर्वं तस्मात्प्रत्यक्षरमुभयत ओंकारो भवति अक्षराणां न्यासमुपदिशन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ २ ॥ आठ अक्षरों का अनुष्टुप् मन्त्र का प्रथम चरण है। आठ-आठ अक्षरों के ही शेष तीन चरण हैं। इस प्रकार चारों पदों में बत्तीस अक्षर होते हैं। इस अनुष्टुप् से ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि हुई है। सब का उपसंहार भी अनुष्टुप् के द्वारा ही होता है। इसके चार अङ्गों का चरणों के रूप में ऊपर वर्णन हुआ है, परन्तु प्रणव उसका पांचवां अङ्ग है। इस प्रकार अनुष्टुप् पांच अङ्गों वाला है। मनुष्य शरीर के भी पांच अङ्ग हैं—हृदय, शिर, शिखा, बाहुमूल और मस्तक। दोनों के पांच- पांच अङ्ग होने से मन्त्र के प्रथम अङ्ग का हृदय से संयोग करे, दूसरे अंग का शिर से, तीसरे अंग का शिखा से, चौथे अंग का दोनों बाहुमूलों से तथा पांचवें अंग का मस्तक से संयोग करे। जैसे सम्पूर्ण लोक परस्पर मिले हुए हैं वैसे ही दोनों के अंग भी परस्पर सम्बद्ध हैं। ओंकार को सम्पूर्ण विश्व माना गया है। इसीलिए अनुष्टुप् के प्रत्येक अक्षर के दोनों ओर ओंकार का सम्पुट देना चाहिए। ब्रह्मज्ञानीजन इस मन्त्र के प्रत्येक अक्षर के न्याय की बात कहते हैं ॥ २ ॥ तस्य ह वा उग्रं प्रथमं स्थानं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं द्वितीयं स्थानं महाविष्णुं तृतीयं स्थानं ज्वलन्तं चतुर्थं स्थानं सर्वतोमुखं पञ्चमं स्थानं नृसिंह