भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३८४ ] नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् देवताओं ने पूछा—"भगवान को नृसिंह क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी बोले—'सब प्राणियों में मानव का पराक्रम प्रसिद्ध है और सिंह भी सबसे अधिक पराक्रमी होता है। अतः नर और सिंह दोनों के संयुक्त रूप से पराक्रम में अधिक प्रबलता होती है, इसीलिए भगवान ने यह रूप धारण किया है। वे अपने इस रूप से विश्व का कल्याण करते हैं। उनका यह स्वरूप अविनाशी एवं सनातन है। वेद में कहा है—"भगवान विष्णु सिंह रूप धारण कर स्तोताओं द्वारा प्रस्तुत होते हैं। विभिन्न स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की जाती है। स्तोतागण विभिन्न प्रकार की शक्तियों को पाने के लिए उनकी स्तुति करते हैं। सिंह रूपधारी होने पर भी भगवान् अपने भक्तों के लिए भयङ्कर नहीं होते। वे पृथ्वी और पर्वत सर्वत्र हैं, सब रूपों में स्थिति हैं और स्तोता की वाणी में भी निहित हैं। इनके तीन डगों में लीन लोक समा गए। इसीलिए उन्हें 'नृसिंह कहा जाता है।' देवताओं ने प्रश्न किया—"उन्हें भीषण क्यों कहा जाता है ?" प्रजापति ने कहा—"इनके भीषण रूप से सब भयभीत होते हैं। सभी देवता, सभी प्राणी और सब लोक इनकी विकरालता से कांप कर भागते हैं, परन्तु यह किसी से भी नहीं डरते। वेद में कहा है— "इनके भय से ही सूर्य समय से प्रकाशित होता है। इनके भय से ही वायु चलता है और अग्नि तपता है, इन्द्र भी इन्हीं के भय से वर्षा आदि कर्म करते हैं तथा मृत्यु भी इनके भय से ही प्राणियों को देह से मुक्त करती है। इसीलिए यह 'भीषण' कहे जाते हैं।" देवताओं ने पूछा—"इन्हें भद्र क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया—"भद्र का तात्पर्य कल्याण से है। वे भगवान् कल्याण स्वरूप हैं और दूसरों का भी कल्याण करते हैं। वे स्वयं कान्तिमान हैं और दूसरों को भी कान्ति प्रदान करते हैं। वे स्वयं शोभा सम्पन्न हैं इसलिए दूसरों को भी शोभा सम्पन्न करते हैं। वेद में कहा है कि