भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८५ “देवताओ ! हम यज्ञ करते हुए कानों से भद्र (कल्याण) सुनें—कल्याण का ही दर्शन करें। हम भगवान का स्तोत्र करते हुए अपने दृढ़ अङ्गों से ऐसी आयु पावें जो हमारे उपास्य भगवान के भजन, चिन्तनादि में काम आवे। इस प्रकार 'भद्र' वर्णित होने से भगवान को 'भद्र' कहते हैं।' देवताओं ने पूछा कि "भगवान को मृत्यु-मृत्यु क्यों कहा जाता है ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि 'अपनी महिमा द्वारा अपने भक्तों के स्मरण करते ही उनकी मृत्यु और अपमृत्यु को भी नष्ट कर डालते हैं। वेद का कथन है कि जिनकी अनुज्ञा में देवगण मस्तक झुकाकर रहते और आज्ञा पालन करते हैं, जिनकी छाया अमृत स्वरूप है, जो आत्मा और शक्ति के देने वाले हैं, जो मृत्यु के लिए भी मृत्यु स्वरूप ऐसे एक एवं अद्वितीय भगवान के समक्ष हम स्वयं उपस्थित होकर आराधना करते हैं।' इसी के अनुसार भगवान् को 'मृत्यु-मृत्यु' कहते हैं।' देवताओं ने प्रश्न किया कि 'मन्त्रराज में 'नमामि' पद क्यों प्रयुक्त हुआ है ?' प्रजापति ने उत्तर दिया 'कि जिन भगवान को सभी देवता, ब्रह्मवादीजन तथा मुक्ति की कामना वाले साधक नमस्कार करते हैं, इसलिए उन्हें नमस्कार करना चाहिए।' वेद में कहा है कि जिन भगवान को लक्ष्य करके ही ब्रह्मा अपने स्तवन में नमस्कार करते हैं, वे भगवान ब्रह्मा और वेदों के रक्षक हैं। इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा आदि के आश्रयभूत हैं, इसीलिए उनके निमित्त 'नमामि' शब्द प्रयुक्त हुआ है।' देवताओं ने पुनः प्रश्न किया कि 'मंत्र में 'अहम्' पद क्यों प्रयुक्त हुआ है ?' इसके उत्तर में ब्रह्माजी ने कहा कि 'श्रुति में कहा है कि मैं अमृत का भण्डार हूँ। देवताओं से भी पूर्व मैं प्रकट हुआ हूँ। मैं ही इस प्रकट और अप्रकट संसार से पूर्व प्रकट होने वाला आत्मा