भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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[Header] नृसिंहपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३८३

ददाति रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः । भद्रं कर्णेभिः शृणुयामः देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरंगै- स्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः तस्मादुच्यते भद्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति यस्मात्स्वमहिम्ना स्वभक्तानां स्मृत एव मृत्युमपमृत्युं च मारयति । य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः यस्य छायामृतं यो मृत्युमृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम । तस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते नमामीति यस्माद्यं सर्वे देवा नमन्ति मुमुक्षवो ब्रह्मवादिनश्च । प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युकथ्यं यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे तस्मादुच्यते नमा- मीति ॥ अथ कस्मादुच्यतेऽहमिति । अहमस्मि प्रथमजा ऋतऽस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाभिः । यो मा ददाति स इदेवमावाः अहमन्नमन्नमदन्तमद्मि अह ं विश्वं भुवनमभ्यभवां सुवर्णज्योतिर्र्यं एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ इति द्वितीयोपनिषत् ॥ २ ॥ देवता पूछने लगे—'वे 'सर्वतोमुख' किस लिये कहे जाते हैं ?' ब्रह्माजी ने कहा— सब प्राणियों, आत्माओं, देवताओं और सभी लोकों को वे अपनी महिमा के द्वारा ही, इन्द्रियों से परे होते हुए भी सबको सब ओर देखते हैं। वे सब ओर से सुनते, सब ओर से ग्रहण करते और सब ओर गमन करते हैं । वे सभी स्थानों में समान रूप से व्याप्त रहते हैं । ऋग्वेद में उनकी महिमा का वर्णन इस प्रकार किया गया है—"जो भगवान सृष्टि से पूर्व अकेले ही थे और स्वयं ही इस विश्व रूप से उत्पन्न हो गए, जिनके द्वारा इस विश्व की सृष्टि हुई, जो सब लोकों का पालन करते हैं तथा समस्त सृष्टि अन्त में, उन्हीं में लीन हो जाती है, वे भगवान सर्वतोमुख हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।' इसमें भगवान को सर्वतोमुख कहा गया है, इसलिए वे 'सर्वतोमुख' कहाते हैं !