भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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३७० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ससागरां समर्वतां सप्तद्वीपां वसुन्धरां तत्साम्नः प्रथमं पादं जानीयात् यक्षगन्धर्वाप्सरोगणसेवितमन्तरिक्षं तत्साम्नो द्वितीयं पादं जानीयाद्वसुरुद्रादित्यैः सर्वैर्देवैः सेवितं दिवं तत्साम्न- स्तृतीयं पादं जानीयात् ब्रह्मस्वरूपं निरंजनं परमं व्योमकं तत्साम्नश्चतुर्थ पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ऋग्यजुः सामाथर्वाणश्चत्वारो वेदाः साङ्गाः सशाखाश्चत्वारः पादा भवन्ति किं ध्यानं किं दैवतं कान्यंगानि कानि दैवतानि किं छन्दः क ऋषिरिति ॥ २ मन्त्रराज का प्रथम चरण रूप यह पर्वत, समुद्र तथा सप्तद्वीप वाली पृथिवी है । द्वितीय चरण रूप यक्षों, गन्धर्वों और अप्सराओं द्वारा सेवित अन्तरिक्ष है । तृतीय चरण के रूप में, वसु, रुद्र और आदित्य आदि देवताओं द्वारा सेवित द्युलोक है और चतुर्थ चरण रूप माया- रहित, पवित्र, परम व्योम युक्त ब्रह्म रूप है । इन सब को इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी अमरत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज के चार पाद हैं—शाखाओं और अङ्गों सहित ऋक्, यजु, साम और अथर्व यह चारों वेद । तब प्रश्न हुआ कि मन्त्रराज का ध्यान कैसे है, उसका देवता, अङ्ग, देवताओं का गण, छन्द और ऋषि यह सब कौन-कौन हैं ? ॥२॥ स होवाच प्रजापतिः स यो ह वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं तत्साम्नोजं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते सर्वे वेदाः प्रणवादिकास्तं प्रणवं तत्साम्नोऽङ्गं वेद स त्रीँल्लोकांज यति चतुर्विंशत्यक्षरा महालक्ष्मीर्यजुस्तत्साम्नोऽङ्गं वेद स आयु- र्यशःकीर्तिज्ञानैश्वर्यवान्भवति तस्मादिदं सांगं साम जानीयाद्यो