१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनृसिंहपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३७१ जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति सावित्रीं प्रणव यजुलक्ष्मीं स्त्री- शूद्राय नेच्छन्ति द्वात्रिंशदक्षरं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृ- तत्वं च गच्छति सावित्रीं लक्ष्मीं यजुः प्रणव यदि जानीयात् स्त्री शूद्रः स मृतोऽधो गच्छति तस्मात्सर्वदा नाचष्टे यद्याचष्टे स आचार्यस्तेनैव स मृतोऽधौ गच्छति ॥ ३ ॥ इस पर सुप्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा—'जो पुरुष श्री बीज से अभिषिक्त गायत्री मन्त्र अष्टाक्षरी पद को इस मन्त्रराज साम ही अंग समझता है वह श्रीसम्पन्न होता है । सभी वेदों के आदि में प्रणव है । अतः जो ज्ञानी इस प्रणव को साम का ही अंग मानता है वह त्रिलोकी पर विजय प्राप्त कर लेता है । चौबीस अक्षरों वाला महालक्ष्मी मन्त्र यजुर्वेद का ही स्वरूप है, उसे साम का अंग मानने वाला ज्ञानी यश, कीर्ति, ज्ञान, आयु और ऐश्वर्य से युक्त होता है । जो पुरुष अंगों सहित साम का ज्ञाता है, वह अमृतत्व प्राप्त करता है, इसलिए इस साम को अंगों सहित जानना चाहिये । ज्ञानीजन प्रणव, गायत्री और यजु स्वरूप महालक्ष्मी मन्त्र अनधिकारी जीवों को नहीं बताते । क्योंकि ऐसे व्यक्ति इन्हें जान लें तो भी उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त नहीं होती । इसलिये मन्त्र देने में सदा सावधान रहना चाहिये । जो आचार्य आदि किसी अनधिकारी को मन्त्रोपदेश करे, वह भी अधोगति प्राप्त करता है । बत्तीस अक्षर वाले साम को जानना चाहिये, उसका जानने वाला अमृतत्व को पाता है ॥ ३ ॥ स होवाच प्रजापतिः अग्निर्वै देवा इदं सर्वं विश्वा भूतानि प्राणा वा इन्द्रियाणि पशवोऽन्नममृतं सम्राट स्वराड्विराट् तत्साम्नः प्रथमं पादं जानीयात् ऋग्यजुःसामाथर्वरूपः सूर्योऽन्त- रादित्ये हिरण्मयः पुरुषस्तत्साम्नो द्वितीयं पादं जानीयात् य ओषधीनां प्रभुर्भवति ताराधिपतिः सोमस्तत्साम्नस्तृतीयं पादं