भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 380

३७२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जानीयात् स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् तत्साम्नश्चतुर्थं पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति उग्रं प्रथमस्याद्यं ज्वलं द्वितीयस्याद्यं नृसिंह तृतीयस्याद्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम यत्र कुत्रचिन्नाचष्टे यदि दातुमपेक्षते पुत्राय शुश्रूषवे दास्यत्यन्यस्मै शिष्याय वा चेति ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी फिर कहने लगे—'सम्पूर्ण विश्व, सम्पूर्ण प्राणी, सम्पूर्ण वेद, अग्नि, प्राण, इन्द्रिय, अन्न, पशु, अमृत, सम्राट, स्वराट्, विराट् इन सब को मन्त्रराज साम का प्रथम चरण जानना चाहिए । ऋक्, यजु, साम, अथर्व रूप सूर्य उनके मण्डल में स्थित हिरण्यमय पुरुष, यह साम का दूसरा चरण जानना चाहिए । सब औषधियों और तारागणों के स्वामी चन्द्रमा को साम का तृतीयचरण जाने ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि और अविनाशी परमेश्वर इन्हें साम का चतुर्थ चरण जाने । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण का आदि अंश 'उग्रम्' है, द्वितीय चरण का आदि अंश 'ज्वलं' है, तृतीय चरण का आदि अंश 'नृसिंह' है और चतुर्थ चरण का आदि अंश 'मृत्यु' हैं। इन चारों को साम स्वरूप ही समझना चाहिए । ऐसा समझने वाला ज्ञानी अमृतत्व की प्राप्त होता है। यह मन्त्र किसी को देना हो तो जो इसका उपदेश लेना चाहे ऐसे सेवा परायण पुत्र को अथवा सदाचारी शिष्य आदि को देना चाहिए ॥ ४ ॥ स होवाच प्रजापतिः क्षीरोदार्णवशायिनं नृकेसरिविग्रहं योगिध्येयं परं पदं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं प्रथमस्याद्यार्द्धान्त्यं तं स द्वितीयस्याद्यार्द्धान्त्यं हं भी तृतीयस्याद्यान्त्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यार्द्धान्त्यं साम तु जानीयाद्यो