१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
३७२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जानीयात् स ब्रह्मा स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् तत्साम्नश्चतुर्थं पादं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति उग्रं प्रथमस्याद्यं ज्वलं द्वितीयस्याद्यं नृसिंह तृतीयस्याद्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम यत्र कुत्रचिन्नाचष्टे यदि दातुमपेक्षते पुत्राय शुश्रूषवे दास्यत्यन्यस्मै शिष्याय वा चेति ॥ ४ ॥ ब्रह्माजी फिर कहने लगे—'सम्पूर्ण विश्व, सम्पूर्ण प्राणी, सम्पूर्ण वेद, अग्नि, प्राण, इन्द्रिय, अन्न, पशु, अमृत, सम्राट, स्वराट्, विराट् इन सब को मन्त्रराज साम का प्रथम चरण जानना चाहिए । ऋक्, यजु, साम, अथर्व रूप सूर्य उनके मण्डल में स्थित हिरण्यमय पुरुष, यह साम का दूसरा चरण जानना चाहिए । सब औषधियों और तारागणों के स्वामी चन्द्रमा को साम का तृतीयचरण जाने ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, अग्नि और अविनाशी परमेश्वर इन्हें साम का चतुर्थ चरण जाने । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी अमृतत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण का आदि अंश 'उग्रम्' है, द्वितीय चरण का आदि अंश 'ज्वलं' है, तृतीय चरण का आदि अंश 'नृसिंह' है और चतुर्थ चरण का आदि अंश 'मृत्यु' हैं। इन चारों को साम स्वरूप ही समझना चाहिए । ऐसा समझने वाला ज्ञानी अमृतत्व की प्राप्त होता है। यह मन्त्र किसी को देना हो तो जो इसका उपदेश लेना चाहे ऐसे सेवा परायण पुत्र को अथवा सदाचारी शिष्य आदि को देना चाहिए ॥ ४ ॥ स होवाच प्रजापतिः क्षीरोदार्णवशायिनं नृकेसरिविग्रहं योगिध्येयं परं पदं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं प्रथमस्याद्यार्द्धान्त्यं तं स द्वितीयस्याद्यार्द्धान्त्यं हं भी तृतीयस्याद्यान्त्यं मृत्युं चतुर्थस्याद्यार्द्धान्त्यं साम तु जानीयाद्यो
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७३ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम येन केनचिदा- चार्यमुखेन यो जानीते स तेनैव शरीरेण संसारान्मुच्यते मोचयति मुमुक्षुर्भवति जपात्तेनैव शरीरेण देवतादर्शनं करोति तस्मादिदमेव मुख्यद्वार कलौ नान्येषां भवति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ ५ ॥ सुप्रसिद्ध प्रजापति ने पुनः कहा—'भगवान् का जो नृसिंह रूप विग्रह क्षीर सागरशायी है, वह परमपद रूप है तथा योगियों के लिये भी ध्यान करने योग्य है । उस विग्रह को सामवेद का ही रूप माने । जो ऐसा मानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'वीर' है । द्वितीय चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'तं सं' है । तृतीय चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'हृं भी' है और चतुर्थ चरण के पूर्वार्द्ध का अन्तिम भाग 'मृत्युम्' पद है । इन सब को साम ही जानना चाहिए । जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है । अतः जो इस साम को किसी आचार्य के मुख से प्राप्त कर इस प्रकार जानता है, वह इस जीवन में ही भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है और अपने सम्पर्क में आने वाले अन्य व्यक्तियों को भी भव-पाश से छुड़ाता है । जो व्यक्ति सांसारिक मोह ममता में पड़ा है, वह इसे सुनकर मुक्ति की कामना करने लगता है । इस मन्त्रराज साम के जप से इसी देह में भगवान् नृसिंह का दर्शन कर लेता है । कलियुग में मुक्ति का यह एक सरल मार्ग है । अतः इस साम को अङ्गों सहित भले प्रकार जान ले । इसे जो भले प्रकार जान लेता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥ ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम् । ऊर्ध्वरेतं विरू- पाक्षं शङ्कर नीलोहितम् ॥ उमापतिः पशुपतिः पिनाकी ह्यमितद्युतिः । ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधि- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
३७४ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्यो वै यजुर्वेदवाच्यस्तं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति महाप्रथमान्तार्धस्याद्यन्तवतो द्वितीयान्तार्धस्याद्यंषणं तृतीयान्तार्धस्याद्यन्नाम चतुर्थान्तार्धस्याद्यं साम जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम सच्चिदानन्द- मयं परं ब्रह्म तमेवंविद्वानमृतं इह भवति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ ६ ॥ विश्वसृज एतेन वै विश्वमिदमसृजन्त यदिदंविश्वमसृजन्त तस्माद्विश्वसृजो विश्वमेनाननु प्रजायते ब्रह्मणः सलोकतां साष्ट्रितां सायुज्यं यान्ति तस्मादिदं साङ्गं साम जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति विष्णुं प्रथमान्त्यं मुखं द्वितीयान्त्यं भद्रं तृतीयान्त्यं म्यहं चतुर्थान्त्यं साम जानीयाद्यो जानीते तोऽमृतत्वं च गच्छति योऽसौ वेद यदिदं किञ्चात्मनि ब्रह्मण्येवानुष्टुभं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति स्त्रीपुंसयोर्वा इहैव स्थातुमपेक्षते तस्मै सर्वैश्वर्यं ददाति यत्र कुत्रापि म्रियते देहान्ते देवः परमं ब्रह्म तारकं व्याचष्टे येनासावमृतीभूत्वा सोऽमृतत्वं च गच्छति तस्मादिदं साम मध्यगं जपति तस्मादिदं सामाङ्गं प्रजापतिस्तस्मादिदं सामाङ्गं प्रजा- पतिर्य एवं वेदेति महोपनिषत् । य एतां महोपनिषदं वेद स कृतपुरश्चरणो महाविष्णुर्भवति । महाविष्णुर्भवति । इति प्रथमो- पनिषत् ॥ ७ ॥
भगवान् नृसिंह अन्तर्यामी और सर्वव्यापी परमेश्वर हैं । उन्हें ऋत और सत्य समझना चाहिए । वे मनुष्य और सिंह की संयुक्त आकृति वाले, काले-पीले रङ्ग से युक्त हैं । उनके नेत्र अत्यन्त विकराल तथा भयङ्कर हैं । वही कल्याणकारी शिव हैं । कण्ठ में नीलवर्ण और उसके ऊर्ध्व भाग में तेजोमय लोहित वर्ण का होने के कारण 'नील लोहित' कहलाते हैं । वे सर्व देवात्मक भगवान् नृसिंह ही गिरिजा, उमापति, पशुपति, धनुर्धारी और अत्यन्त तेजस्वी महेश्वर
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७५ हैं। वे सम्पूर्ण विद्याओं और भूतों के स्वामी हैं। जो देवपति, ब्रह्मा के भी स्वामी और यजुर्वेद के वाच्यार्थ हैं, उन भगवान् नृसिंह को साम ही जान ले। जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। मन्त्रराज अनुष्टुप् के प्रथम चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'महा' है, द्वितीय चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'व॑न्तो' है, तृतीय- चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'षणं' है, चतुर्थ चरण के उत्तरार्द्ध का आदि भाग 'नमा' है। इन सब को ही साम जाने। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। यह साम सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म ही है। उसे इस प्रकार जानने वाला पुरुष इस देह के रहते ही अमरत्व को प्राप्त होता है। इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार इसका ज्ञाता है वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करता है। विश्व के रचने वाले प्रजापतियों ने ही इस साम युक्त मन्त्र के द्वारा सम्पूर्ण जगत् की रचना की है। इसीलिये वे विश्व रचयिता कहे गए हैं। यह विश्व उनसे ही प्रकट हुआ है। इस रहस्य के ज्ञाता ज्ञानी- जन ब्रह्मलोक और उसके पद को प्राप्त करते हैं। इस साम को अङ्गों सहित जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानते हैं वे भव-बन्धन से मुक्त होकर अमरत्व प्राप्त करते हैं ॥ ६ ॥ मन्त्रराज के प्रथम चरण का अन्तिमपद 'विष्णु' है, द्वितीय- चरण का अन्तिम पद 'मुखम्' है, तृतीय चरण का अन्तिम पद 'भद्रं' है तथा चतुर्थ चरण का अन्तिम पद 'म्यहम्' है। इन सब को साम जानना चाहिए। जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्व को प्राप्त होता है। प्रजापति ने ही इन सब तत्वों को जाना। ब्रह्म में स्थित इस अनुष्टुभ मन्त्र की ब्रह्म में ही स्थिति है। जो ज्ञानी इस प्रकार जानता है, वह अमरत्व को प्राप्त करता है।
३७६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जो साधक स्त्री पुरुष इस लोक में उत्तम आचरणपूर्वक रहकर आनन्द में स्थित रहने की की इच्छा करते हैं, भगवान् नृसिंह उनके लिए सम्पूर्ण ऐश्वर्य देते हैं। वह जहाँ भी देह-त्याग करता है वहीं भगवान् नृसिंह उसे तारक मन्त्र का उपदेश कर अमृतत्व प्राप्त कराते हैं। मोक्ष- प्राप्ति के इच्छुकों तारक मन्त्र का जाप करना उचित है। साम के अङ्गभूत प्रजापति मन्त्रदृष्टा होने से तारक मन्त्र है। ऐसा जानने वाला ही सच्चा साधक होता है। यह महोपनिषद् है, जो जानता है, वह साक्षात् विष्णु स्वरूप हो जाता है ॥ ७ ॥ ॥ प्रथम उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयुस्ते प्रजा- पतिमुपाधावंस्तेभ्य एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रायच्छत्तेन वै ते मृत्युमजयन् पाप्मानं चातरन्संसारं चातरंस्तस्माद्यो मृत्योः पाप्मभ्यः संसाराच्च बिभीयात्स एतं मन्त्रराजं नारसिंहमानुष्टुभं प्रतिगृह्णीयात्स मृत्युं तरति स पाप्मानं तरति स संसारं तरति तस्य ह वै प्रणवस्य या पूर्वा मात्रा पृथिव्यकारः स ऋग्भि- र्ऋग्वेदो ब्रह्मा वसवो गायत्री गार्हपत्यः सा साम्नः प्रथमः पादो भवति द्वितीयान्तरिक्षं स उकारः स यजुर्भैर्यजुर्वेदो विष्णुरुद्रास्त्रिष्टुब्दक्षिणाग्निः सा साम्नो द्वितीयः पादो भवति तृतीया द्यौः स मकारः स सामभिः सामवेदो रुद्रा आदित्या जगत्याहवनीयः सा साम्नस्तृतीयः पादो भवति यावसानेऽस्य चतुर्थ्यर्धमात्रा सा सोमलोक ओंकारः सौऽथर्वणैर्मन्त्रैरथर्ववेदः संवर्तकोऽग्निर्मरुतो विराडेकर्षिर्भास्वती स्मृता सा साम्नश्चतुर्थः पादो भवति ॥ १ ॥ एक समय की बात है कि मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता अत्यन्त भयभीत हुए और भागकर प्रजापति ब्रह्माजी की शरण में पहुंचे। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान् नृसिंह का मन्त्रराज आनुष्टुभ् बताया।
नृसिंहपूर्वत्तापिन्युपनिषत् ] [ ३७७ देवताओं ने इस मन्त्र की सिद्धि द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त करली । वे सब पापों से मुक्त हो गये और इस संसाररूपी समुद्र को भी लांघ गये । अतः जो मनुष्य मृत्यु, पाप और भवसागर से भय मानता हो, वह इस मन्त्रराज की शरण ग्रहण करे । जो इस प्रकार मन्त्रराज की शरण लेता है, वह मृत्यु, पाप और इस संसार से भी तर जाता है । प्रणव भी पूर्वोक्त मन्त्रराज का ही अङ्ग है। वह प्रणव प्रथम मात्रा 'अ'कार वाला है, पृथ्वी उसका लोक और ऋचाओं से विभूषित ऋग्वेद ही उसका वेद, देवता ब्रह्मा तथा छन्द गायत्री है, वह वसु देव- ताओं का गण है और गार्हपत्य अग्नि रूप है यह सब प्रणव की प्रथम मात्रा में ही निहित है और यही साम का प्रथम पाद है । प्रणव की द्वितीय मात्रा 'उ'कार है। अन्तरिक्ष लोक, यजुर्मन्त्रों- युक्त यजुर्वेद, विष्णु और रुद्र देवों का गण, दक्षिण अग्नि और त्रिष्टुप् छन्द, यह द्वितीय मात्रा है। यह साम का द्वितीय पाद है । प्रणव की तृतीय मात्रा 'त'कार है। द्युलोक, सामवेद, रुद्र और आदित्य का गण, जगती छन्द और आहवनीय अग्नि यह सब तृतीय मात्रा के अन्तर्गत हैं। यह तृतीय मात्रा ही साम का तृतीय- पाद है । प्रणव की चौथी मात्रा में नादात्मक अद्धंमात्रा का आभास मिलता है। उसमें चन्द्रलोक, ओंकारवाची परब्रह्म, अथर्ववेद, संवर्तक नामक अग्नि, मरुद्गण तथा विराट् छन्द है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं। यह ब्रह्म रूपिणी होने से अत्यन्त प्रकाश वाली है। यह चतुर्थमात्रा ही साम का चतुर्थपाद है ॥ १ ॥ अष्टाक्षरः प्रथमा पादो भवत्यष्टाक्षरास्त्रयः पादा भव- न्त्येवं द्वात्रिंशदक्षराणि संपद्यन्ते द्वात्रिंशदक्षरा वा अनुष्टुब्भव- त्यनुष्टुभा सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमुपसंहृतं तस्य हैतस्य
३७८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् पञ्चाङ्गानि भवन्ति चत्वारः पादाश्चत्वार्यङ्गानि भवन्ति सप्रणवं सर्वं पञ्चमं भवति हृदयाय नमः शिरसे स्वाहा शिखायै वषट् कव- चाय हुं अस्त्राय फडिति प्रथमं प्रथमेन संयुज्यत द्वितीयं द्वितीयेन तृतीयं तृतीयेन चतुर्थं चतुर्थेन पञ्चमं पञ्चमेन व्यतिषजति व्यति- षिक्तावा इमे लोकास्तस्माद्व्यतिषिक्तान्यङ्गानि भवन्ति ओमित्ये- तदक्षरमिदं सर्वं तस्मात्प्रत्यक्षरमुभयत ओंकारो भवति अक्षराणां न्यासमुपदिशन्ति ब्रह्मवादिनः ॥ २ ॥ आठ अक्षरों का अनुष्टुप् मन्त्र का प्रथम चरण है। आठ-आठ अक्षरों के ही शेष तीन चरण हैं। इस प्रकार चारों पदों में बत्तीस अक्षर होते हैं। इस अनुष्टुप् से ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि हुई है। सब का उपसंहार भी अनुष्टुप् के द्वारा ही होता है। इसके चार अङ्गों का चरणों के रूप में ऊपर वर्णन हुआ है, परन्तु प्रणव उसका पांचवां अङ्ग है। इस प्रकार अनुष्टुप् पांच अङ्गों वाला है। मनुष्य शरीर के भी पांच अङ्ग हैं—हृदय, शिर, शिखा, बाहुमूल और मस्तक। दोनों के पांच- पांच अङ्ग होने से मन्त्र के प्रथम अङ्ग का हृदय से संयोग करे, दूसरे अंग का शिर से, तीसरे अंग का शिखा से, चौथे अंग का दोनों बाहुमूलों से तथा पांचवें अंग का मस्तक से संयोग करे। जैसे सम्पूर्ण लोक परस्पर मिले हुए हैं वैसे ही दोनों के अंग भी परस्पर सम्बद्ध हैं। ओंकार को सम्पूर्ण विश्व माना गया है। इसीलिए अनुष्टुप् के प्रत्येक अक्षर के दोनों ओर ओंकार का सम्पुट देना चाहिए। ब्रह्मज्ञानीजन इस मन्त्र के प्रत्येक अक्षर के न्याय की बात कहते हैं ॥ २ ॥ तस्य ह वा उग्रं प्रथमं स्थानं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति वीरं द्वितीयं स्थानं महाविष्णुं तृतीयं स्थानं ज्वलन्तं चतुर्थं स्थानं सर्वतोमुखं पञ्चमं स्थानं नृसिंह
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३७६ षष्ठं स्थानं भीषणं सप्तमं स्थानं भद्रमष्टमं स्थानं मृत्युमृत्युं नवमं स्थानं नमामि दशनं स्थानमहमेकादशं स्थानं जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति एकादशपदा वा अनुष्टुब्भवत्यनुष्टुभा सर्वमिदं सृष्टमनुष्टुभा सर्वमिदमुपसंहृतं तस्मात्सर्वानुष्टुभं जानीयाद्यो जानीते सोऽम तत्वं च गच्छति ॥३॥ अनुष्टुप् का प्रथम स्थान 'उग्रम्'पद है। जो इसे जानता है, वह अमर हो जाता है। द्वितीय स्थान 'वीरम्' है, तृतीय स्थान 'महाविष्णुम्' है, चतुर्थ स्तान 'ज्वलन्तम्' है, पञ्चम स्थान 'सर्वतोमुखम्' है छठा स्थान 'नृसिंहम्' है, सातवां स्थान 'भीषणम्' आठवां स्थान 'भद्रम्' है, नौवां स्यान, 'मृत्युमृत्युम्' है, दसवां स्थान 'नमामि' है और ग्यारहवां स्थान 'अहम्' है इस प्रकार जाने। जो ऐसा जानता है वह अमृतत्त्व को प्राप्त होता है। यह अनुष्टुप् वृत्ति ग्यारह पदों वाली है, इसी के द्वारा सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई है, इसी के द्वारा सब का उपसंहार होता है। इस लिये यह सब अनुष्टुप् की ही महिमा है। जो ऐसा जानता है, वह अमृतत्व को पाता है ॥३॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नथ कस्मादुच्यत उग्रमिति स होवाच प्रजापतिर्यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वाना- त्मनः सर्वाणि भूतान्युद्गृह्णात्यजस्रं सृजति विसृजति वासय- त्युद्ग्राह्यत उद्गृह्यते स्तुहि श्रुतं गर्तसदं युवानं मृगं न भीम- मुपहतनुमुग्रं मृडा जरित्रे रुद्र स्तवानो अन्यत्ते अस्मन्निवपन्तु सेनाः तस्मादुच्यत उग्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते वीरमिति यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि विरमति विरामयत्यजस्रं सृजति विसृजति वासयति यो वीरः कर्मण्यः सुदक्षो युक्तग्रावा जायते देवकामस्त- स्मादुच्यते वीरमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते महाविष्णुमिति ॥
[Header] ३८० ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत्
[Main Text] यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि व्याप्नोति व्यापयति स्नेहो यथा पललपिण्डं शान्त- मूलमोतं प्रोतमनुव्यास व्यतिषिक्तो व्याप्यते व्यापयते यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा प्रजापतिः प्रजया संविदानः त्रीणि ज्योतींषि सचते सषोडशीं तस्मा दुच्यते महाविष्णुमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते ज्वलन्तमिति यस्मात्स्वमहिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि स्वतेजसा ज्वलति ज्वालयति ज्वाल्यते ज्वालपते सविता प्रसविता दीप्तो दीपयन्दीन्यमानः ज्वल ज्वलिता तपन्वित- पन्तसंतपन्नोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणस्तस्मा- दुच्यते ज्वलन्तमिति ॥ यह सुनकर कर देवताओं ने प्रश्न किया—'नृसिंह भगवान् के लिए 'उग्रम्' क्यों कहा गया है ?' प्रसिद्ध प्रजापति ने इसका उत्तर दिया—'भगवान् नृसिंह अपनी महिमा से सब देवताओं, सब भूतों सब आत्माओं और सब लोकों को ऊपर उठाते हैं, वही उनकी सृष्टि, स्थिति और संहार करते हैं, वे ही उन्हें अपने में लीन कर लेते हैं। संसार पर दूसरों से अनुग्रह कराते और स्वयं भी करते हैं। इसीलिए उन्हें उग्र कहा जाता है। इस विषय में ऋग्वेद में कहा है, श्रुतियां जिनकी स्तुति करती हैं, उन्हीं परमेश्वर की स्तुति करो। वे हृदय रूप गर्त में हैं, नवीन तरुणाई से शोभाय- मान हैं, सिंह रूप से प्रकट होते हुए भी भक्तों के लिये विकराल नहीं हैं। सब पर कृपा करने के लिये वे सब स्थान पर तथा सब के समीप पहुँचते हैं। वे सन्तजनों पर कृपा और दुष्टों को नष्ट करने वाले हैं, इसलिए उग्र कहे जाते हैं। हे भगवान नृसिंह ! आप इस स्तुति से संतुष्ट होकर मुझ स्तोता को सुखी करो। आपकी भयङ्कर सेना हम पर आक्रमण न करे, वह कहीं अन्यत्र जाय । इस मंत्र में
[Page-header: नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१ ]
भगवान् नृसिंह को 'उग्र' कह कर स्तुति की है, इसलिए उन्हें उग्र कहा गया है।' इसके पश्चात् देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवन् ! प्रभु श्रीनृसिंह को 'वीर' क्यों कहा गया है ?' इस पर ब्रह्माजी ने कहा—'भगवान नृसिंह अपनी महिमा के द्वारा ही सब भूतों के साथ विभिन्न प्रकार के खेल खेलते हैं, वही सब लोकों और सब देवताओं में व्याप्त हैं, सभी आत्मा उन्हीं का प्रतिरूप मात्र हैं। वही सृष्टि के पालन और विनाश करने वाले हैं। सम्पूर्ण विश्व प्रलय के पश्चात् उन्हीं में लीन हो जाता है, इसलिए वे 'वीर' कहे गए हैं । ऋग्वेद में भी भगवान् को वीर कहा गया है, वे भक्तों पर तुरन्त कृपा करने वाले हैं, वे कर्मठ हैं क्योंकि सोमयाग में पाषण हाथ में लेकर अध्वर्यु आदि के रूप में सोम निष्पीडन करते हैं। यही देव- ताओं की रचना करने की कामना करते रहते हैं।' देवताओं ने प्रश्न किया—'भगवान को 'महाविष्णु क्यों कहा जाता है ? 'ब्रह्माजी' बोले—'भगवान नृसिंह अपनी महिमा से सब देव- ताओं, सब आत्माओं, समस्त भूतों और सम्पूर्ण लोकों को व्याप्त करते हैं। मांस पिण्ड में चिकनाई के व्याप्त रहने के समान देह के सब अवयवों में व्याप्त हैं। यह संसार प्रलयकाल में, उनमें ही लय हो जाता है, क्योंकि यह उन्हीं से संबंधित है।' ऋग्वेद में भी इनकी महिमा का वर्णन हुआ है—जो सर्वव्यापी होने से समस्त संसार में व्याप्त हैं, जो प्रजा-पालक और प्रजा के उपास्यदेव हैं, जिनसे प्रबल अन्य कोई भी प्रकट नहीं हुआ, वे भगवान सोलह कलाओं से युक्त होकर तीनों प्रकार के तेजों में व्याप्त रहते हैं। इसलिए इन्हें 'महाविष्णु' कहा जाता है। देवता पूछने लगे—"यह 'ज्वलन्त' क्यों कहे जाते हैं ?" प्रजापति
३८२ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ने उत्तर दिया- "भगवान् अपने महत्त्व से ही सब देवताओं, सब आत्माओं सब लोकों और सब भूतों को अपने तेज से प्रकाशित करते और उसी तेज से स्वयं भी प्रकाशित रहते हैं। सभी लोक और ज्योतियाँ उनके तेज से प्रकाशित होकर अपना प्रकाश फैलाते हैं। ऋग्वेद में कहा कि—"वे सविता हैं, प्रसविता भी वही हैं, वे प्रकाश से युक्त हैं, वे स्वयं प्रज्ज्वलित रहकर दूसरों को भी प्रज्ज्वलित करते हैं। वे स्वयं तपते और दूसरों को तपाते हैं। वे अपने तेज से ही कान्तियुक्त हैं तथा अपनी कान्ति से दूसरों को कान्तिमान बनाते हैं। वे परम कल्याणरूप एवं सुशोभित हैं तथा अन्य पदार्थ उन्हीं के द्वारा सुशोभित होते हैं। इसीलिये ज्ञानीजन उन्हें 'ज्वलन्त' कहते हैं। अथ कस्मादुच्यते सर्वतोमुखमिति यस्मात्स्महिम्ना सर्वांल्लोकान्सर्वान्देवान्सर्वानात्मनः सर्वाणि भूतानि स्वयमनिन्द्रि योऽपि सर्वतः पश्यति सर्वतः शृणोति सर्वतो गच्छति सर्वत आदत्ते सर्वगः सर्वगतस्तिष्ठा । एकः पुरन्ताद्य इदं बभूव यतो बभूव भुवनस्य गोपाः । यमप्येति भुवनं सांपराये नमामि तमहं सर्वतोमुखम् । तस्मादुच्यते सर्वतोमुखमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते नृसिंहमिति यस्मात्सर्वेषां भूतानां ना वीर्यंतमः श्रेष्ठतमश्च सिंहो वीर्यतमः श्रेष्ठतमश्च । तस्मान्नृसिंह आसीत्परमेश्वरो जगद्धितं वा एतद्रू पं यदक्षरं भवति प्रतिद्विष्णुस्तवते वीर्याय मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः । यस्योरुषु त्रिषु विक्रमणेण्वधिक्षियन्ति भुव- नानि विश्वा तस्मादुच्यते नृसिंहमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते भीषणमिति यस्माद्भीषणं यस्य रूपं दृष्ट्वा सर्वे लोकाः सर्वे देवाः सर्वाणि भूतानि भीत्या पलायन्ते स्वयं यतः कुतश्च न बिभेति भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः भीषास्मादग्नि- श्चेन्द्रस्य मृत्युर्धावति पञ्चम इति तस्मादुच्यते भीषणमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते भद्रोमिति यस्मात्स्वयं भद्रो भूत्वा सर्वदा भद्रं
[Header] नृसिंहपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३८३
ददाति रोचनो रोचमानः शोभनः शोभमानः कल्याणः । भद्रं कर्णेभिः शृणुयामः देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरंगै- स्तुष्टुवां सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः तस्मादुच्यते भद्रमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति यस्मात्स्वमहिम्ना स्वभक्तानां स्मृत एव मृत्युमपमृत्युं च मारयति । य आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देवाः यस्य छायामृतं यो मृत्युमृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम । तस्मादुच्यते मृत्युमृत्युमिति ॥ अथ कस्मादुच्यते नमामीति यस्माद्यं सर्वे देवा नमन्ति मुमुक्षवो ब्रह्मवादिनश्च । प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युकथ्यं यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे तस्मादुच्यते नमा- मीति ॥ अथ कस्मादुच्यतेऽहमिति । अहमस्मि प्रथमजा ऋतऽस्य पूर्वं देवेभ्यो अमृतस्य नाभिः । यो मा ददाति स इदेवमावाः अहमन्नमन्नमदन्तमद्मि अह ं विश्वं भुवनमभ्यभवां सुवर्णज्योतिर्र्यं एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ इति द्वितीयोपनिषत् ॥ २ ॥ देवता पूछने लगे—'वे 'सर्वतोमुख' किस लिये कहे जाते हैं ?' ब्रह्माजी ने कहा— सब प्राणियों, आत्माओं, देवताओं और सभी लोकों को वे अपनी महिमा के द्वारा ही, इन्द्रियों से परे होते हुए भी सबको सब ओर देखते हैं। वे सब ओर से सुनते, सब ओर से ग्रहण करते और सब ओर गमन करते हैं । वे सभी स्थानों में समान रूप से व्याप्त रहते हैं । ऋग्वेद में उनकी महिमा का वर्णन इस प्रकार किया गया है—"जो भगवान सृष्टि से पूर्व अकेले ही थे और स्वयं ही इस विश्व रूप से उत्पन्न हो गए, जिनके द्वारा इस विश्व की सृष्टि हुई, जो सब लोकों का पालन करते हैं तथा समस्त सृष्टि अन्त में, उन्हीं में लीन हो जाती है, वे भगवान सर्वतोमुख हैं, उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ।' इसमें भगवान को सर्वतोमुख कहा गया है, इसलिए वे 'सर्वतोमुख' कहाते हैं !
३८४ ] नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् देवताओं ने पूछा—"भगवान को नृसिंह क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी बोले—'सब प्राणियों में मानव का पराक्रम प्रसिद्ध है और सिंह भी सबसे अधिक पराक्रमी होता है। अतः नर और सिंह दोनों के संयुक्त रूप से पराक्रम में अधिक प्रबलता होती है, इसीलिए भगवान ने यह रूप धारण किया है। वे अपने इस रूप से विश्व का कल्याण करते हैं। उनका यह स्वरूप अविनाशी एवं सनातन है। वेद में कहा है—"भगवान विष्णु सिंह रूप धारण कर स्तोताओं द्वारा प्रस्तुत होते हैं। विभिन्न स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति की जाती है। स्तोतागण विभिन्न प्रकार की शक्तियों को पाने के लिए उनकी स्तुति करते हैं। सिंह रूपधारी होने पर भी भगवान् अपने भक्तों के लिए भयङ्कर नहीं होते। वे पृथ्वी और पर्वत सर्वत्र हैं, सब रूपों में स्थिति हैं और स्तोता की वाणी में भी निहित हैं। इनके तीन डगों में लीन लोक समा गए। इसीलिए उन्हें 'नृसिंह कहा जाता है।' देवताओं ने प्रश्न किया—"उन्हें भीषण क्यों कहा जाता है ?" प्रजापति ने कहा—"इनके भीषण रूप से सब भयभीत होते हैं। सभी देवता, सभी प्राणी और सब लोक इनकी विकरालता से कांप कर भागते हैं, परन्तु यह किसी से भी नहीं डरते। वेद में कहा है— "इनके भय से ही सूर्य समय से प्रकाशित होता है। इनके भय से ही वायु चलता है और अग्नि तपता है, इन्द्र भी इन्हीं के भय से वर्षा आदि कर्म करते हैं तथा मृत्यु भी इनके भय से ही प्राणियों को देह से मुक्त करती है। इसीलिए यह 'भीषण' कहे जाते हैं।" देवताओं ने पूछा—"इन्हें भद्र क्यों कहते हैं ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया—"भद्र का तात्पर्य कल्याण से है। वे भगवान् कल्याण स्वरूप हैं और दूसरों का भी कल्याण करते हैं। वे स्वयं कान्तिमान हैं और दूसरों को भी कान्ति प्रदान करते हैं। वे स्वयं शोभा सम्पन्न हैं इसलिए दूसरों को भी शोभा सम्पन्न करते हैं। वेद में कहा है कि
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८५ “देवताओ ! हम यज्ञ करते हुए कानों से भद्र (कल्याण) सुनें—कल्याण का ही दर्शन करें। हम भगवान का स्तोत्र करते हुए अपने दृढ़ अङ्गों से ऐसी आयु पावें जो हमारे उपास्य भगवान के भजन, चिन्तनादि में काम आवे। इस प्रकार 'भद्र' वर्णित होने से भगवान को 'भद्र' कहते हैं।' देवताओं ने पूछा कि "भगवान को मृत्यु-मृत्यु क्यों कहा जाता है ?" ब्रह्माजी ने उत्तर दिया कि 'अपनी महिमा द्वारा अपने भक्तों के स्मरण करते ही उनकी मृत्यु और अपमृत्यु को भी नष्ट कर डालते हैं। वेद का कथन है कि जिनकी अनुज्ञा में देवगण मस्तक झुकाकर रहते और आज्ञा पालन करते हैं, जिनकी छाया अमृत स्वरूप है, जो आत्मा और शक्ति के देने वाले हैं, जो मृत्यु के लिए भी मृत्यु स्वरूप ऐसे एक एवं अद्वितीय भगवान के समक्ष हम स्वयं उपस्थित होकर आराधना करते हैं।' इसी के अनुसार भगवान् को 'मृत्यु-मृत्यु' कहते हैं।' देवताओं ने प्रश्न किया कि 'मन्त्रराज में 'नमामि' पद क्यों प्रयुक्त हुआ है ?' प्रजापति ने उत्तर दिया 'कि जिन भगवान को सभी देवता, ब्रह्मवादीजन तथा मुक्ति की कामना वाले साधक नमस्कार करते हैं, इसलिए उन्हें नमस्कार करना चाहिए।' वेद में कहा है कि जिन भगवान को लक्ष्य करके ही ब्रह्मा अपने स्तवन में नमस्कार करते हैं, वे भगवान ब्रह्मा और वेदों के रक्षक हैं। इन्द्र, वरुण, मित्र, अर्यमा आदि के आश्रयभूत हैं, इसीलिए उनके निमित्त 'नमामि' शब्द प्रयुक्त हुआ है।' देवताओं ने पुनः प्रश्न किया कि 'मंत्र में 'अहम्' पद क्यों प्रयुक्त हुआ है ?' इसके उत्तर में ब्रह्माजी ने कहा कि 'श्रुति में कहा है कि मैं अमृत का भण्डार हूँ। देवताओं से भी पूर्व मैं प्रकट हुआ हूँ। मैं ही इस प्रकट और अप्रकट संसार से पूर्व प्रकट होने वाला आत्मा
३८६ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri हूँ। हे देव ! तुम मुझे आश्रय प्रदान करते हो, वैसे तुमने मेरा पालन किया है। मैं अन्न हूँ, अन्न भक्षक का भी भक्षक बन जाता हूँ। सूर्य के प्रकाश के समान यह सम्पूर्ण विश्व मेरे प्रकाश के सामने फीका पड़ जाता है। जो इस प्रकार का ज्ञाता है; वही यथार्थ उपासना करने वाला है। यही महोपनिषत् है। ॥ द्वितीय उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नानुष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नर- सिंहस्य शक्तिं बीजं नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच प्रजापतिर्माया वा एषा नारसिंही सर्वमिदं सृजति सर्वमिदं रक्षति सर्वमिदं संहरति तस्मान्मायामेतां शक्तिं विद्याद्य एतां मायां शक्तिं वेद स पाप्मानं तरति स मृत्युं तरति स संसारं तरति सोऽमृतत्वं च गच्छति महतीं श्रियतश्नुते मीमासन्ते ब्रह्मवादिनो ह्रस्वा दीर्घा- प्लुता चेति ॥ यदि ह्रस्वा भवति सर्वं पाप्मानं दहत्यमृतत्वं च गच्छति यदि दीर्घा भवति महतीं श्रियमाप्नोत्यमृतत्वं च गच्छति यदि प्लुता भवति ज्ञानवान्भवत्यमृतत्वं च गच्छति तदेतदृषिणो- क्तं निदर्शनं स ईं पाहि य ऋजीषी तरुतः श्रियं लक्ष्मीमौपलाम- म्बिकां गां षष्ठीं च यामिन्द्रसेनेत्युदाहुः तां विद्यां ब्रह्मयोनिं सरूपा- मिहायुषे शरणमहं प्रपद्ये।सर्वेषां वा एतद्भूतानामाकाशः परा- यणं सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव जायन्त आकाशादेव जातानि जीवन्त्याकाशं प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तस्मादाकाशं बीजं विद्यात्तदेव ज्यायस्तदेतदृषिणोक्तं निदर्शनं हंस शुचिषद्वसुरन्त- रिक्षद्वोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् ॥ नृषद्वरसदृतसद् व्योम- दब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ य एवं वेदेति महोपनिषत् ॥ ॥ इति तृतीयोपनिषत् ॥ प्रसिद्ध देवगण जिज्ञासु भाव से प्रजापति ब्रह्माजी के सामने Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३८७ नतमस्तक होकर बोले- 'भगवान ! मंत्रराज आनुष्टुभ की शक्ति और बीज का हमें उपदेश कीजिये ।' इस पर ब्रह्माजी ने कहा- "भगवान की शक्तिभूता माया ही इस विश्व की रचना, रक्षा और विनाश करती है। इसलिए यह माया ही शक्ति है। इस माया को शक्ति रूप से जानने वाला ज्ञानी पापों से पार होता है और भव-सागर से तर कर अमृतत्व को प्राप्त होता है, और वह इस लोक में भी महान् सुख-समृद्धि का उपभोग करता है। ब्रह्मवादी जन सोचते हैं कि भगवान की माया शक्ति लघु दीर्घ अथवा प्लुत है ? यदि लघु है तो जो कोई इसे लघु जाने वह अपने सब पापों को उसके द्वारा भस्म कर देता और अमृतत्व को पाता है। यदि दीर्घ है तो जो कोई उसके इस रूप को जानता है वह महान् ऐश्वर्य प्राप्त करता हुआ अंत में अमर हो जाता है। यदि वह प्लुत है तो जो उसके इस रूप का ज्ञाता है, वह अत्यन्त ज्ञानी होता और अमृतत्व प्राप्त करता है। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि- "हे माया रूप बिन्दुममय स्वर ! मैं इस भव-सागर से पार होने की कामना वाला हूँ तो साधन के निमित्त दीर्घ आयु भी प्राप्त करना चाहता हूँ। इस उद्देश्य से मैं भगवान की शक्ति श्री, लक्ष्मी शङ्कर भगवान की शक्ति अम्बिका, ब्रह्मशक्ति सरस्वती, स्कन्दशक्ति षष्ठी, इन्द्र-शक्ति इन्द्रसेना और ब्रह्म को प्राप्त कराने वाली साक्षात् प्रकट विद्या-शक्ति का आश्रय ग्रहण करता हूँ । तुम सभी उपरोक्त शक्तियों के सहित मेरी रक्षा करो।' यह सभी प्राणी आकाश से उत्पन्न होते हैं, इसलिए आकाश ही सब प्राणियों का आश्रयभूत है। उत्पन्न प्राणी आकाश से ही जीवन धारण करते और अपना देह त्यागते और आकाश में ही लीन हो जाते हैं। अतः आकाश को ही सम्पूर्ण विश्व का बीज मानना चाहिए। इस विषय में यह दृष्टांत है कि जो पुरुषोत्तम भगवान् अपने
३८८ ] [ नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् विशुद्ध परमधाम में स्वयं प्रकाशित हैं, वे ही अन्तरिक्ष में निवास करने वाले वसु हैं। वे ही घरों में आने वाले अतिथि हैं। वे ही यज्ञ की वेदी में प्रतिष्ठित अग्नि और उसमें आहुति देने वाले होते हैं। वे आकाश और स्वर्गलोक में निवास करते हैं, वे मर्त्यलोक में और सर्वश्रेष्ठ सत्यलोक में रहते हैं। वे ही पृथिवी, जल, पर्वतों और शुभ कर्मों में प्रकट होते हैं, वे ही परम सत्य एवं सबसे महान् हैं।' इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी पूर्व कथित फलों को प्राप्त करता है। यह महोपनिषद् है। ॥ तृतीय उपनिषद् समाप्त ॥ देवा ह वै प्रजापतिमब्रुवन्नाष्टुभस्य मन्त्रराजस्य नारसिंहस्याङ्गमन्त्रान्नो ब्रूहि भगव इति सहोवाच प्रजापतिः प्रणवं सावित्रीं यजुर्लक्ष्मीं नृसिंहगायत्रीमित्यङ्गानि जानीयाद्यो जानीते सोऽमृतत्वं च गच्छति ॥ १ ॥ प्रसिद्ध देवताओं ने जिज्ञासु भाव से ब्रह्माजी ने प्रश्न किया— ‘मन्त्रराज अनुष्टुप के अङ्गभूत मन्त्रों को हमारे प्रति कहने की कृपा करो।' प्रजापति ब्रह्माजी ने कहा— 'प्रणव, यजुलक्ष्मी, गायत्री और नृसिंह गायत्री ये सब मंत्रराज के अङ्गभूत मन्त्र हैं। इनका ज्ञाता ऐश्वर्य प्राप्ति के साथ ही अन्त में अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है ॥ १ ॥ ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भ- विष्यदिति सर्वमोंकार एव यच्चान्यन्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव सर्वं ह्येतद्ब्रह्मायामात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पाज्जा- गरितस्थानो बहिःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वा- नरः प्रथमः पादः। स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्तांग एकोनविंश- तिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः। यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तं सुषुप्तस्थान Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१
एकीभूतः प्रज्ञानघन एकानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ- स्तृतीयः पादः । एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्यौ हि भूतानां नान्तः प्रज्ञं न बहिः प्रज्ञं नोभयतः न प्रज्ञं प्रज्ञं नाप्रज्ञं न प्रज्ञानघनमदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम- चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ २
‘ओंकार अविनाशी है, इसी की महिमा यह सम्पूर्ण दृश्यमान विश्व है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीनों कालों से सम्बन्धित जो कुछ है, वह सब ओंकार ही है । उक्त तीनों कालों में अतीत जो है, वह भी ओंकार है । यह सब कुछ ओंकार रूप ब्रह्म है । यह भगवान् नृसिंह ब्रह्म ही है । उनके चार पाद हैं ।
जाग्रत अवस्था और उससे व्याप्त यह स्थूल विश्व ही जिनका स्थान है और बाह्य संसार में जिनका ज्ञान प्रसारित है, सातों लोक जिनके अङ्ग हैं, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पंच प्राण और चार अन्तःकरण, इस प्रकार उन्नीस जिनके मुख हैं, जो इस स्थूल विश्व के भोगने वाले हैं, जो विश्व रूप देह में स्थित होने से वैश्वानर कहाते हैं, वही सर्वरूप वैश्वानर भगवान् श्रीनृसिंह के प्रथम पाद हैं ।
स्वप्नावस्था और उससे प्रभावित यह सूक्ष्म विश्व ही जिनका स्थान है और आन्तरिक संसार में जिनका ज्ञान फैला हुआ है, सातों लोक जिनके अङ्ग और उन्नीस मुख हैं जो सूक्ष्म विश्व के भोक्ता, पालक एवं रक्षक हैं, ऐसे वे तैजस पुरुष ही भगवान् नृसिंह के द्वितीय पाद हैं ।
सुषुप्ति और उससे उपलक्षित सम्पूर्ण विश्व की प्रलय रूप अवस्था ही जिनका स्थान है, जो एक रूप में ही स्थित हैं और जिनका रूप घनीभूत विज्ञान है, जिनका मुख चिन्मय प्रकाश है, जो स्वयं आनन्दमय हैं और जो अपने स्वरूप रूप आनन्द के भोगने वाले हैं तथा
३६० ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जिनसे परे और कोई नहीं है, ऐसे वे प्राज्ञ पुरुष ही भगवान् नृसिंह के तृतीय पाद हैं । उपरोक्त त्रिपाद परमेश्वर सबके स्वामी, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं । सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्थान भी वही हैं । जो न स्थूल का ज्ञाता है, न सूक्ष्म का और न इन दोनों का ही ज्ञाता है, जो न प्रज्ञान का घनीभूत है, न दिखाई देता है, जो न व्यवहार में आता, न स्पर्श में, जो किसी आकार वाला भी नहीं है, जो अचिन्त्य और अवर्णनीय है, जिनका स्वरूप आत्मसत्ता की प्रतीति मात्र है । जो प्रपंच-रहित, कल्याणकारी अद्वितीय है, ऐसा पूर्ण ब्रह्म ही भगवान् नृसिंह का चतुर्थ पाद है इस प्रकार ज्ञानीजन मानते हैं । उपरोक्त चार पादों में जिनका वर्णन हुआ है वे भगवान् नृसिंह ही हैं । उन्हें जानना चाहिए ॥२॥ अथ सावित्री गायत्र्या यजुषा प्रोक्ता तया सर्वमिदं व्याप्तं घृणिरिति द्वे अक्षरे सूर्य इति त्रीणि आदित्य इति त्रीणि एतद्वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं यं एवं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते तदेयहचाभ्युक्तं ऋचो अक्षरे परमे व्योम- न्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेदा किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासस इति न ह वा एतस्यर्चा न यजुषा न साम्नार्थोऽस्ति यः सावित्रं वेदेति । ओंभूलक्ष्मीर्भु वर्लक्ष्मीः स्वर्लक्ष्मीः कालकर्णी तन्नो महालक्ष्मीः प्रचोदयात् इत्येषा वै महालक्ष्मीर्यजुर्गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा भवति । गायत्री वा इदं सर्वं यदिदं किंच तस्माद्य एतां महालक्ष्मीं याजुषीं वेद महतीं श्रियमश्नुते । ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि । तन्नः सिंहः प्रचोदयात् इत्येषा वै नृसिंहगायत्री देवानां वेदानां निदानं भवति य एवं वेद निदानवान्भवति ॥ ३ ॥
नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३६१ अब सावित्री मन्त्र के सम्बन्ध में उपदेश करते हैं—यह सावित्री मन्त्र, गायत्री छन्द से युक्त होकर यजुर्मन्त्र के रूप में प्रकट हुआ है । यह सभी विश्व उससे व्याप्त है । अष्टाक्षरी होने से इसे गायत्री कहा गया है । इसमें 'घृणिः' और 'सूर्य' दो-दो अक्षर हैं तथा 'आदित्यः' तीन अक्षर हैं, आरम्भ में इसे 'श्री' बीज से अलंकृत किया जाता है । इस प्रकार यह सावित्री मन्त्र अष्टाक्षरी कहा गया है । जो ज्ञानी इस मन्त्र का ज्ञाता है, वह लक्ष्मी के द्वारा अलंकृत होता है । ऐसा दृष्टान्त भी है कि 'ऋग्वेद की ऋचायें परम व्योमरूप अविनाशी, प्रकाशमान ब्रह्म में विद्यमान हैं, वहीं सब देवताओं का निवास है। जो साधक उन स्वयं तेजस्वी ब्रह्म को नहीं जानता वह स्वाध्याय से क्या लाभ उठा लेगा ? जो ज्ञानी उस ब्रह्म के ज्ञाता हैं, वे परमधाम में आनन्दोपभोग करते हुए रहते हैं।' इस सावित्रमन्त्र के इस प्रकार जानने वाले को ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मन्त्र से कोई कार्य नहीं रहता । 'जो देवी भू-लोक की लक्ष्मी, भुवर्लोक की लक्ष्मी और स्वर्ग लोक की लक्ष्मी है, जो कालकर्णी नाम वाली है, वह महालक्ष्मी हमें श्रेष्ठ कर्मों में प्रेरित करे ।' यह यजुर्वेदोक्त महालक्ष्मी की गायत्री चौबीस अक्षरों वाली है। यह सब दृश्यमान विश्व गायत्री रूप ही है । अतः जो इस गायत्री का ज्ञाता है, वह महान् ऐश्वर्य को प्राप्त करता है । 'हम भगवान् नृसिंह की प्राप्ति के निमित्त उपासना करते हैं । वज्ररूप नखों वाले उन परमात्मा का ही हम चिन्तन करते हैं, वे ही नृसिंह भगवान् हमें सत्कर्मों में प्रेरित करें।' यह नृसिंह गायत्री देवताओं और वेदों के भी कारणभूता हैं । इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी भगवान् को प्राप्त होता है ॥३॥ देवा ह वै प्रजापति मब्रुवन्नथ कैर्मन्त्रैः स्तुतो देवः प्रीतो भवति स्वात्मानं दर्शयति तन्नो ब्रूहि भगवन्निति स होवाच