भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३८१

एकीभूतः प्रज्ञानघन एकानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञ- स्तृतीयः पादः । एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्यौ हि भूतानां नान्तः प्रज्ञं न बहिः प्रज्ञं नोभयतः न प्रज्ञं प्रज्ञं नाप्रज्ञं न प्रज्ञानघनमदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणम- चिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्म्यप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ २

‘ओंकार अविनाशी है, इसी की महिमा यह सम्पूर्ण दृश्यमान विश्व है । भूत, भविष्यत्, वर्तमान इन तीनों कालों से सम्बन्धित जो कुछ है, वह सब ओंकार ही है । उक्त तीनों कालों में अतीत जो है, वह भी ओंकार है । यह सब कुछ ओंकार रूप ब्रह्म है । यह भगवान् नृसिंह ब्रह्म ही है । उनके चार पाद हैं ।

जाग्रत अवस्था और उससे व्याप्त यह स्थूल विश्व ही जिनका स्थान है और बाह्य संसार में जिनका ज्ञान प्रसारित है, सातों लोक जिनके अङ्ग हैं, पञ्च कर्मेन्द्रिय, पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, पंच प्राण और चार अन्तःकरण, इस प्रकार उन्नीस जिनके मुख हैं, जो इस स्थूल विश्व के भोगने वाले हैं, जो विश्व रूप देह में स्थित होने से वैश्वानर कहाते हैं, वही सर्वरूप वैश्वानर भगवान् श्रीनृसिंह के प्रथम पाद हैं ।

स्वप्नावस्था और उससे प्रभावित यह सूक्ष्म विश्व ही जिनका स्थान है और आन्तरिक संसार में जिनका ज्ञान फैला हुआ है, सातों लोक जिनके अङ्ग और उन्नीस मुख हैं जो सूक्ष्म विश्व के भोक्ता, पालक एवं रक्षक हैं, ऐसे वे तैजस पुरुष ही भगवान् नृसिंह के द्वितीय पाद हैं ।

सुषुप्ति और उससे उपलक्षित सम्पूर्ण विश्व की प्रलय रूप अवस्था ही जिनका स्थान है, जो एक रूप में ही स्थित हैं और जिनका रूप घनीभूत विज्ञान है, जिनका मुख चिन्मय प्रकाश है, जो स्वयं आनन्दमय हैं और जो अपने स्वरूप रूप आनन्द के भोगने वाले हैं तथा