१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६० ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् जिनसे परे और कोई नहीं है, ऐसे वे प्राज्ञ पुरुष ही भगवान् नृसिंह के तृतीय पाद हैं । उपरोक्त त्रिपाद परमेश्वर सबके स्वामी, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी हैं । सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार के स्थान भी वही हैं । जो न स्थूल का ज्ञाता है, न सूक्ष्म का और न इन दोनों का ही ज्ञाता है, जो न प्रज्ञान का घनीभूत है, न दिखाई देता है, जो न व्यवहार में आता, न स्पर्श में, जो किसी आकार वाला भी नहीं है, जो अचिन्त्य और अवर्णनीय है, जिनका स्वरूप आत्मसत्ता की प्रतीति मात्र है । जो प्रपंच-रहित, कल्याणकारी अद्वितीय है, ऐसा पूर्ण ब्रह्म ही भगवान् नृसिंह का चतुर्थ पाद है इस प्रकार ज्ञानीजन मानते हैं । उपरोक्त चार पादों में जिनका वर्णन हुआ है वे भगवान् नृसिंह ही हैं । उन्हें जानना चाहिए ॥२॥ अथ सावित्री गायत्र्या यजुषा प्रोक्ता तया सर्वमिदं व्याप्तं घृणिरिति द्वे अक्षरे सूर्य इति त्रीणि आदित्य इति त्रीणि एतद्वै सावित्रस्याष्टाक्षरं पदं श्रियाभिषिक्तं यं एवं वेद श्रिया हैवाभिषिच्यते तदेयहचाभ्युक्तं ऋचो अक्षरे परमे व्योम- न्यस्मिन्देवा अधिविश्वे निषेदुः । यस्तन्न वेदा किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासस इति न ह वा एतस्यर्चा न यजुषा न साम्नार्थोऽस्ति यः सावित्रं वेदेति । ओंभूलक्ष्मीर्भु वर्लक्ष्मीः स्वर्लक्ष्मीः कालकर्णी तन्नो महालक्ष्मीः प्रचोदयात् इत्येषा वै महालक्ष्मीर्यजुर्गायत्री चतुर्विंशत्यक्षरा भवति । गायत्री वा इदं सर्वं यदिदं किंच तस्माद्य एतां महालक्ष्मीं याजुषीं वेद महतीं श्रियमश्नुते । ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि । तन्नः सिंहः प्रचोदयात् इत्येषा वै नृसिंहगायत्री देवानां वेदानां निदानं भवति य एवं वेद निदानवान्भवति ॥ ३ ॥