१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः । स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः । स्वस्तिः नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । शान्ति पाठ—हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आंखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़ देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । हरिः ॐ सच्चिदानन्दरूपाय कृष्णायाक्लिष्टकर्मणे । नमो वेदान्तवेद्याय गुरवे बुद्धिसाक्षिणे ॥ मुनयो ह वै ब्राह्मणमूचुः । कः परमो देवः । कुतो मृत्यु- र्बिभेति । कस्य विज्ञानेनाखिलं विज्ञातं भवति । केनेदं विश्वं संसरतीति । तदुहोवाच ब्राह्मणः । कृष्णो वै परमं दैवतम् । गोविन्दान्मृत्युर्बिभेति । गोपीजनवल्लभज्ञानेनैतद्विज्ञातं भवति । स्वाहेदं विश्वं संसरतीति । तदुहोचुः । कः कृष्णः । गोविन्दश्च कोऽसाविति । गोपीजनवल्लभश्च कः । का स्वाहेति । तानुवाच ब्राह्मणः । पापकषर्णो गोभूमिवेदवेदितो गोपीजनविद्याकलाप- Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
३४६ ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् प्रेरकः । तन्माया चेति सकलं परं ब्रह्मैव तत् । यो ध्यायति रसति भजति सोऽमृतो भवतीति । ते होचुः । किं तद्रूपं किं रसनं किमाहो तद्भजनं तत्सर्वं विविदिषतामाख्याहीति । तदुहोवाच हैरण्यो गोपवेषमभ्रामं कल्पद्रुमाश्रितम् । तदिह श्लोका भवन्ति ॥ सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ १ ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रि- तम् । दिव्यालंकरणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ २ ॥ कालिन्दी- जलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयञ्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेः ॥ ३ ॥ सच्चिदानन्द स्वरूप परमेश्वर श्रीकृष्ण के नाम में 'कृष' शब्द सत्ता-वाचक और 'न' शब्द आनन्दबोधक है । यह सच्चिदानन्द स्वरूप श्रीकृष्ण अनायास ही सब कुछ कर सकने में समर्थ हैं, सब की बुद्धि के साक्षी और सब के जानने योग्य है । वे सम्पूर्ण विश्व के गुरु हैं । उनके लिये नमस्कार हो । एक समय मुनियों ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया कि "भगवन् ! कौन देवता सर्वश्रेष्ठ है ? मृत्यु किससे भय मानती है ? किसके तत्त्व को भले प्रकार जान लेने पर सब कुछ जान लिया जाता है ? यह जगत किसकी प्रेरणा से आवागमन के चक्र में घूमता है ?" ब्रह्माजी ने मुनियों को उत्तर दिया—"'सर्वश्रेष्ठ देवता श्रीकृष्ण हैं, वही गोविन्द हैं, उनसे मृत्यु भी भयभीत रहती है । उन गोपीजन- वल्लभ के तत्व को जो कोई जान लेता है, उसे अनजाना कुछ नहीं रहता । स्वाहा रूप माया की प्रेरणा से यह सम्पूर्ण जगत आवागमन के चक्र में पड़ा घूम रहा है ।"
गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३४७ तब उन मुनियों ने पुनः प्रश्न किया—"यह श्रीकृष्ण कौन हैं ? गोविन्द कौन हैं ? गोपीजन वल्लभ कौन हैं ? स्वाहा कौन है ? यह सब कृपाकर हमें बतावें।" ब्रह्माजी बोले—"श्रीकृष्ण पापों का अपकर्षण करने वाले हैं। वही गोविन्द नाम से गो, भूमि तथा वेदवाणी के जानने हारे के रूप में प्रसिद्ध हैं। गोपीजन-वल्लभ अविद्या के निवारक और अन्तरङ्ग शक्ति- रूप ब्रज-वनिताओं में सब ज्ञानमयी विद्याओं और चौंसठ कलाओं का ज्ञान भरने वाले हैं। इनकी माया शक्ति स्वाहा है। यह सब परमेश्वर के ही रूप हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण नाम से परब्रह्म ही प्रसिद्ध हुये हैं। जो मनुष्य उनके इस रूप का ध्यान करता है तथा उनके अमृतत्व को प्राप्त कराने वाले नामों को जपता है, या उनका भजन करता अथवा गुणानुवाद गाता है यह अवश्य ही अमृतत्व को प्राप्त करता है। तब उन मुनियों ने पुनः पूछा—"ध्यान करने के योग्य श्रीकृष्ण का कैसा रूप है ? उनके नाम रूप अमृत का रस किस प्रकार चाखा जा सकता है ? उनका भजन किस प्रकार होता है ? हमें यह सब बात स्पष्ट बताइये।" ब्रह्माजी ने बताया कि "भगवान के जिस रूप का ध्यान करना चाहिये उसका वेष ग्वाल-बाल जैसा है। उनका वर्ण नवीन जलधर के तुल्य श्याम है, किशोर अवस्था है और दिव्य कल्पतरु के नीचे वे विराज- मान हैं। उनका सौन्दर्य अपूर्व है और गोप तथा गोपियों से चारों ओर से घिरे हैं। जमुना जल की लहरों के स्पर्श से शीतल वायु भगवान की सेवा कर रही है। ऐसे रूप का चिन्तन करने वाला भव-बन्धन से छुट- कारा पा जाता है" ॥ १-३ ॥ तस्य पुना रसनमिति जलभूमिं तु संपाताः । कामादि कृष्णायेत्येकं पदम् ॥ गोविन्दायेति द्वितीयम् । गोपीजनेति तृती-
३४८ ] [ गोपालपूर्वत्तापिन्युपनिषत् यम् । वल्लभेति तुरीयम् । स्वाहेति पञ्चममिति पञ्चपदं जपन्पञ्चाङ्गं द्यावाभूमी सूर्याचन्द्रमसौ तद्रूपतया ब्रह्म संपद्यत इति । तदेष श्लोकः क्लीमित्येतदादावादाय कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभायेति बृहन्मानव्यासकृदुच्चरेद्योऽसौ गतिस्तस्यास्ति मङ्क्षु नान्या गति स्यादिति । भक्तिरस्य भजनम् । एतदिहा मुत्रोपाधिनैराश्येनामुष्मिन्मनःकल्पनम् । एतदेव च नैष्कर्म्यम् । कृष्णं तं विप्रा बहुधा यजन्ति । गोविन्दं सन्तं बहुधा आराध- यन्ति । गोपीजनवल्लभो भुवनानि दध्रे स्वाहाश्रितो जगदेतत्सु- रेताः ॥ १ ॥ वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो जन्येजन्ये पञ्चरूपो बभूव । कृष्णस्तदेकोऽपि जगद्धितार्थं शब्देनासौ पञ्चपदो विभाति ॥ २ ॥ इति ॥ ते होचुरुपासनमेतस्य परमात्मनो गोविन्दस्याखिला- धारिणो ब्रूहीति । तानुवाच यत्तस्य पीठं हैरण्याष्टपलाश- मम्बुजं तदन्तराधिकानलास्त्रयुगं तदन्तरालद्यर्णखिलबीजं कृष्णाय नम इति बीजाढ्यं सब्रह्म। ब्राह्मणमादायानङ्गगायत्रीं यथावदालिख्य भूमण्डलं शूलवेष्टितं कृत्वाऽङ्गवासुदेवादिरुक्मिण्या- दिस्वशक्ति नन्दादिसुदेवादिपार्थादिनिष्ठ्यादिवीतं यजेत्संध्यासु प्रतिपत्तिभिरुपचारः । तेनास्याखिलं भवत्यखिलं भवतीति ॥ २ ॥ तदिह श्लोका भवन्ति । एको वशी सर्वगः कृष्णः ईड्य एकोऽपि सन्बहुधा यो विभाति । तं पीठं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सिद्धिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ ३ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तं पीठगं येऽनुभजन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥ ४ ॥ एतद्विष्णोः परमं पदं ये नित्योद्युक्तास्तं यजन्ति न कामात् । तेषामसौ गोपरूपः प्रयत्ना त्प्रकाशयेदात्मपदं तदेव ॥ ५ ॥ क्लीं काम बीज है । जो उपासक इसे आदि में रखकर कृष्णाय
गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद् ] [ ३४६ गोविन्दाय, गोपीजन वल्लभाय इन तीनों पदों का स्वाहा सहित उच्चारण करेगा, वह शीघ्र ही श्रीकृष्ण से मिलकर मुक्ति को प्राप्त होगा। इसके लिए इससे भिन्न कोई गति नहीं समझनी चाहिये। इनकी भक्ति करना ही भजन माना गया है। भजन करना उसे कहते हैं, जिसमें साधक अपने भोगों की इच्छा को पूर्ण रूप से त्याग कर अपने मन और इन्द्रियों को उन्हीं में समर्पित कर देता है। इसी को वास्तविक संन्यास कहा गया है। वेद के ज्ञाता ब्राह्मण भगवान् श्रीकृष्ण का अनेक प्रकार से यजन करते तथा भक्तजन गोविन्द नाम से उनकी उपासना करते हैं। सम्पूर्ण संसार का पालन करने वाले वे ही गोपीजन-वल्लभ हैं, जिन्होंने अपनी स्वाहा नाम वाली माया शक्ति के द्वारा इस विश्व की रचना की। जैसे सम्पूर्ण संसार में एक ही वायु-तत्त्व है, परन्तु वह प्रत्येक शरीर में प्राण आदि पाँच रूपों में रमा हुआ है, वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण भी एक ही हैं, परन्तु इस मन्त्र में ये पाँच नामों वाले जान पड़ते हैं। इस मन्त्र में कहे हुए पाँचों नाम एक ही श्रीकृष्ण का प्रति- पादन करने वाले हैं। फिर उन मुनियों ने पूछा—"विश्व के आधारभूत भगवान् श्रीकृष्ण की उपासना किस प्रकार होती है, कृपा पूर्वक इसका वर्णन कीजिये।" तब श्री ब्रह्माजी ने भगवान् श्रीकृष्ण की पीठ का वर्णन किया और बोले—"पीठ पर सुवर्णयुक्त एक कमल बनावे, उसमें आठ पंखु- डियाँ हों, उसके बीच में दो त्रिकोण अंकित करे, वे परस्पर सम्पुटित हों। ऐस छः कोण बनावे। कोणों में स्थित कर्णिका में सभी अभीष्टों को पूर्ण करने वाले काम-बीज का अंकन करे। फिर हरेक कोण में क्लीं बीज युक्त 'कृष्णायनमः' को क्रमशः एक-एक अक्षर करके लिखे। फिर ब्रह्म-मन्त्र और काम-गायत्री विधिपूर्वक लिख कर
३५० ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् आठ वज्रों से आवेष्ठित पृथिवी मण्डल बनावे । फिर अङ्ग, वासुदेव, रुक्मिणी, इन्द्र, वसुदेव, पार्थ और निधि आदि अष्टावरणों से घेर कर उसका पूजन करना चाहिये । तीनों संध्याओं के समय षोडश उपचारों द्वारा उक्त आवरणों वाले श्रीकृष्ण की पूजा करे । ऐसा करने से साधक चारों पदार्थों को प्राप्त करता है । भगवान् श्रीकृष्ण सर्वव्यापी, सब पर शासन करने वाले हैं, वे सदा स्तुति के योग्य हैं । एक होकर भी वे अनेक रूपों में दिखाई देते हैं । जो ज्ञानी भक्त ऊपर कही हुई पीठ पर प्रतिष्ठित भगवान् श्रीकृष्ण की नित्य प्रति पूजा करते हैं, उन्हें स्थाई सुख की प्राप्ति होती है । जो श्रीकृष्ण सब साधकों का अभीष्ट पूर्ण करते हैं, जो नित्य में भी नित्य और चैतन्यों में भी चैतन्य हैं, उन्हें पहले कही हुई पीठ में प्रतिष्ठित करे । जो इस प्रकार उनका अर्चन करते हैं वे परम सिद्धि के अधिकारी होते हैं । जो भगवान् विष्णु के परमपद रूप इस मन्त्र को नित्य प्रति उत्साह सहित विधिपूर्वक पूजते हैं और भगवत्-प्राप्ति के सिवाय अन्य किसी वस्तु को नहीं चाहते, उनके लिये गोपस्वरूप श्रीकृष्ण अपने परमपद को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं ॥ १-५ ॥ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो विद्यां तस्मै गोपयति स्म कृष्णः । तं ह वेवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुः शरणं व्रजेत् ॥ ६ ॥ ओङ्कारेणान्तरितं ये जपन्ति गोविन्दस्य पञ्चपदं मनुम् । तेषा- मसौ दर्शयेदात्मरूपं तस्मान्मुमुक्षुरभ्यसेन्नित्यशान्त्यै ॥ ७ ॥ एतस्मा एव पञ्चपदादभूवन्गोविन्दस्य मनवो मानवानाम् । Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
गोपालपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३५१ दशार्णाद्यास्तेऽपि संक्रन्दाद्यै रभ्यस्यन्ते भूतिकामैर्यथावात् ॥८ जो सृष्टि के पूर्व काल में ब्रह्माजी उत्पन्न कर उन्हें वेद ज्ञान देते और उनसे साम-गान कराते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों को बुद्धि रूप प्रकाश प्रदान करते हैं, मुमुक्षु व्यक्ति उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण की शरण प्राप्त करे । भगवान गोविन्द के पञ्चपदी मन्त्र की ओंकार सम्पुट कर जप करने वाले साधक शीघ्र ही उनके दर्शन करते हैं । इसलिये भव-बन्धन से मुक्त होने की कामना करने वाले साधक को नित्य शांति की प्राप्ति के लिये उक्त मन्त्र का ही जप करना चाहिये । इस पञ्चपदी मन्त्र से ही दशाक्षर आदि अन्य मन्त्र भी प्रकट हुए हैं । वे सभी मन्त्र मानव का कल्याण करने वाले हैं । उन मन्त्रों का भी ऐश्वर्य-कामना वाले इन्द्रादि देव विधिपूर्वक सदा जप करते रहते हैं ॥६—८॥ ते पप्रच्छु स्तुदुहोवाच ब्रह्मसदनं चरतो मे ध्यातः स्तुतः परमेश्वरः परार्द्धान्ते सोऽबुध्यत । कोपदेष्टा मे पुहुषः पुरस्तादा- विर्बभूव । ततः प्रणतो मायानुकूलेन हृदा मह्यमष्टादशार्णस्वरूपं सृष्टये दत्त्वान्तर्हितः । पुनस्ते सिसृक्षतो मे प्रादुरभूवन् । तेष्व- क्षरेषु विभज्य भविष्यज्जगद्रूपं प्रकाशयम् । तदिह कादाका- लात्पृथिवीतोऽग्निर्बिन्दोरिन्दुस्तत्संपातात्तदर्क इति । क्लींकाराद- जस्रं कृष्णादाकाशं खाद्वायुरुत्तरात्सुरभिर्विद्याः प्रादुरकार्षमका- र्षमिति । तदुत्तरात्स्वापुंसादिभेदं सकलमिदं सकलमिदमिति ॥ ३ ॥ एतस्यव यजनेन चन्द्रध्वजो गतमोहमात्मानं वेदयति । ओंकारालिकं मनुमावर्तयेत् । सङ्गरहितोऽध्यानयेत् । तद्विष्णोः
:गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३५२ परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तस्मा- देतन्नित्यमावर्तयेन्नित्यमावर्तयेदिति ॥४॥ तदाहुरेके यस्य प्रथ- मपदाद्भूमिर्द्वितीयपदाज्जलं तृतीयपदाद्यं जश्चतुर्थपदाद्वायुश्चर- मपादाद्व्योमेति । वैष्णवं पञ्चव्याहृतिमयं मन्त्रं कृष्णावभासकं कैवल्यस्य सृप्त्यै सततमावर्तयेत्सततमावर्तयेदिति ॥ ५ ॥ तदत्र गाथाः ॥ यस्य चाद्यपदाद्भूमिर्द्वितीयात्सलिलोद्भवः । तृतीयाः तेज उद्भूतं चतुर्थाद्गन्धवाहनः ॥ १ ॥ पञ्चमादम्बरोत्पत्तिस्त- मेवैकं समभ्यसेत् । चन्द्रध्वजोगमद्विष्णोः परमं पदमव्ययम् ॥ २॥ ततो विशुद्धं विमलं विशोकमशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् । यत्तत्पदं पञ्चपदं तदेव स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ३ ॥ तमेकं गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं पञ्चपदं वृन्दावनसुरभूरूह- तलासीनं । सततं मरुद्गणोऽहं परमया स्तुत्या स्तोष्यामि ॥ ब्रह्माजी ने कहा—जब मेरी परार्ध आयु भगवान की स्तुति करते बीत गई तो मुझे गोप वेषधारी भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ । उन्होंने मुझे अष्टादशाक्षर मन्त्र का उपदेश देकर सृष्टि रचना की प्रेरणा की। मैंने इस मन्त्र के 'क' अक्षर से जल की, 'ल' से पृथ्वी की, 'ई' से अग्नि की, अनुस्वार से चन्द्रमा की और समग्र 'क्लीं' से सूर्य की रचना की । मन्त्र के द्वितीय पद 'कृष्णाय' से आकाश और वायु की, 'गोविन्दाय' से कामधेनु और वेदों की तथा 'गोपीजन वल्लभाय' से पुरुष-स्त्री की रचना की । अन्त के स्वाहा' पद से चराचर जगत को उत्पन्न किया । इस अष्टाक्षर मन्त्र से ही प्राचीन समय में चन्द्रध्वज राजा मोहरहित होकर पूर्ण आत्मज्ञान के अधिकारी बने थे । भगवान कृष्ण के गोलो- कधाम की प्राप्ति इसी मन्त्र से होती है । वह जो परम विशुद्ध, विमल, शोक रहित, आसक्ति और
गोपालपूर्वतपिनीयुपनिषत् [ ३५३ वासना से पृथक गोलोक धाम है वह इस मन्त्र से अभिन्न है । यह मन्त्र साक्षात वासुदेव स्वरूप ही है । उनकी स्तुति निम्न श्लोकों से करनी चाहिये । ॐ नमो विश्वस्वरूपाय विश्वस्थित्यन्तहेतवे । विश्वेश्वराय विश्वाय गोविंदाय नमोनमः ॥ १ ॥ नमो विज्ञानरूपाय परमा- नन्दरूपिणे । कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमोनमः ॥ २ ॥ नमः कमलनेत्राय नमः कमलमालिने । नमः कमलनाभाय कम- लापतये नमः ॥ ३ ॥ बर्हापीडाभिरामाय रामायाकुण्ठमेधसे । रमामानसहंसाय गोविंदाय नमोनमः ॥ ४ ॥ कंसवंशविनाशाय केशिचाणूरघातिने । वृषभध्वजवन्द्याय पार्थसारथये नमः ॥५॥ वेणुनादविनोदाय, गोपालाहिमर्दिने । कालिन्दीकूललोलाय, लोलकुण्डलधारिणे ॥ ६ ॥ बल्लवीवदनाम्भोजमालिने नृत्तशा- लिने । नमः प्रणतपालाय श्रीकृष्णाय नमोनमः ॥७॥ नमः पापप्रणाशाय गोवर्धनधराय च । पूतनाजीवितान्ताय तृणावर्त्ता- सुहारिणे ॥ ८ ॥ निष्कलाय विमोहाय शुद्धायाशुद्धवैरिणे । अद्वि- तीयाय महते श्रीकृष्णाय नमोनमः ॥ ९ ॥ प्रसीद परमानन्द प्रसीद परमेश्वर । आधिव्याधिभुजङ्गेन दष्टं मामुद्धर प्रभो ॥ १० ॥ श्रीकृष्ण रुक्मिणीकांत गोपीजनमनोहर। संसार- सागरे मग्नं मामुद्धर जगद्गुरो ॥११॥ केशव क्लेशहरण नारा यण जनार्दन । गोविंद परमानन्द मां समुद्धर माधव ॥ १२॥ अथैवं स्तुतिभिराधयामि । तथा यूयं पञ्चपदं जपन्तः श्रीकृष्णं ध्यायन्तः संसृतिं तरिष्यथेति होवाच हैरण्यगर्भः । अमुं पञ्चपदं मनुमावर्त्तयेद्यः स यात्यनायासतः केवलं तत्पदं तत् । अनेजदेकं मनसो जवीयो नैन द्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षदिति । तस्मात्कृष्ण एव परमो देवस्तं ध्यायेत् । तं रसयेत् । तं यजेत् । तं यजेत् । तं भजेत् । ओं तत्सदित्युपनिषत् ॥ तत्सत् ॥
३५४ ] [ गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् हे मुनिश्रेष्ठो ! जिस प्रकार मैं इन स्तुतियों को करता हूँ, उसी प्रकार तुम भी इस मन्त्र द्वारा श्रीकृष्ण की आराधना करके संसार समुद्र से तर जाओगे। इस जप को करने वाला भगवान के परमपद को प्राप्त हो जाता है। देवता (वाणी आदि) वहाँ तक कभी नहीं पहुँच सकते। इसलिये सदैव भगवान कृष्ण का ही ध्यान करे, मन्त्र-जप द्वारा उनके नामामृत का रसास्वादन करे तथा नित्य उन्हीं का भजन करे—उन्हीं का भजन करे। ॥ गोपालपूर्वतापनी उपनिषद् समाप्त ॥ —:०:—
कृष्णोपनिषत्
ॐ भद्रं कर्णेभिःशृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।। स्थिरैरङ्गै स्तुष्टुः वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ।। स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।। स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।। स्वस्ति नस्ता- र्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।। स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।। ॐ शान्तिः, शान्तिः, शान्तिः । 'हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । सुदृढ़ अङ्गों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥
हरिः ॐ श्रीमहाविष्णुं सच्चिदानन्दलक्षणं रामचन्द्रं दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरं मुनयो वनवासिनो विस्मिता बभूवुः । तं होचुर्नोऽवद्यमवतारान्वै गण्यन्ते आलिङ्गामो भवन्तमिति । भवा- न्तरे कृष्णावतारे यूयं गोपिका भूत्वा मामालिङ्गथ अन्ये येऽव- तारास्ते हि गोपा न स्त्रीश्च नो कुरु ।
अन्योन्यविग्रहं धार्यं तवाङ्गस्पर्शनादिह । शश्वत्स्पर्शयितास्माकं गृह्लीमोऽवतानवयम् ॥१॥ रुद्रादीनां वचः श्रुत्वा प्रोवाच भगवान्स्वयम् ।
३५६ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ कृष्णोपनिषत् अङ्गसङ्गं करिष्यामि भवद्वाक्यं करोम्यहम् ॥२ श्रीकृष्ण के अवतार ग्रहण करने से पहिले की बात है। जब भगवान् ने देवताओं को पृथिवी पर अवतीर्ण होने की आज्ञा दी, तब सम्पूर्ण देवताओं ने भगवान् से कहा—'प्रभो ! हम देवता होकर पृथिवी पर जन्म ग्रहण करें, यह हमारे लिए शोभा की बात कदापि नहीं होगी। हम स्वेच्छा से तो पृथिवी पर जन्म नहीं ले सकते, परन्तु आपकी आज्ञा के कारण हमें वहाँ जन्म लेना ही होगा। फिर भी प्रभो ! हमें गोपों और स्त्रियों के रूप में वहाँ जन्म देना। आपके अङ्ग-स्पर्श से वञ्चित रह कर हम कहीं नहीं रहना चाहते। यदि आपकी समीपता से दूर करने के लिये हमें मनुष्य बनना पड़े तो हम ऐसे मनुष्य-जन्म को कभी स्वीकार न करेंगे। यदि वहाँ आपके सान्निध्य का और अङ्ग-स्पर्श का अवसर मिलता रहे तो हम पृथिवी पर जन्म लेने के लिये प्रस्तुत हैं।' देवताओं के ऐसे प्रेम-पूर्ण वचनों को सुनकर भगवान् बोले—'देवगण ! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी और मनुष्य जन्म में तुम्हें मेरे अङ्ग-स्पर्श का अवसर मिलता रहेगा' ॥ १-२ ॥ मोदितास्ते सुराः सर्वे कृतकृत्याधुना वयम् । यो नन्दः परमानन्दो यशोदा मुक्तिगेहिनी ॥३ माया सा त्रिविधा प्रोक्ता सत्त्वराजसतामसी । प्रोक्ता च सात्विकी रुद्रे भक्ते ब्रह्मणि राजसी ॥४ तामसी दैत्यपक्षेषु माया त्रेधा ह्य दाहृता । अजेया वैष्णवी माया जप्येन च सुता पुरा ॥५ देवकी ब्रह्मपुत्रा सा या वेदै रुपगीयते । निगमो वसुदेवो यो वेदार्थः कृष्णरामयोः ॥६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
कृष्णोपनिषत् ] [ ३५७ स्तुवते सततं यस्तु सोऽवतीर्णो महीतले । वने वृन्दावने क्रोडन्गोपगोपीसुरैः सह ॥७ गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः । वंशस्तु भगवान्रुद्रः शृंगमिन्द्रः सगोसुरः ॥८ गोकुलं वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमाः । लोभक्रोधादयो दैत्याः कलिकालस्तिरस्कृतः ॥६ भगवान् द्वारा प्राप्त इस आश्वासन से सब देवता अत्यन्त प्रसन्न हुये और परस्पर कहने लगे—'अब हम धन्य हो गये' । फिर सब देवता भगवान् की सेवा के लिये अवतीर्ण हुए । नन्द के रूप में भगवान् का परम आनन्दमय अंश उत्पन्न हुआ । यशोदा के रूप में मुक्ति देवी प्रकट हुईं । तीन प्रकार की माया कही गई है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी । रुद्र भगवान में सात्त्विकी माया है, ब्रह्माजी में राजसी और दैत्यों में तामसी माया समाविष्ट हुई है। इस त्रिविध माया से भिन्न जो वैष्णवी माया है, उस पर विजय प्राप्त करना नितान्त असम्भव है। जिस ब्रह्ममयी वैष्णवी माया को प्राचीन काल में ब्रह्माजी भी नहीं जीत सके, उसकी देवगण स्तुति करते हैं। वही वैष्णवी माया देवकी के रूप में अवतीर्ण हुई । जो वेद नारायण के स्वरूप की सदैव स्तुति करते हैं, वे ही वसुदेव हुए । वेदों के अर्थभूत ब्रह्म ही इस पृथिवी पर बलराम और कृष्ण के रूप में प्रकट हुये । वही वेदार्थ साक्षात् रूप में, वृन्दावन में गोप-गोपिकाओं के साथ क्रीड़ा करता है । उन श्रीकृष्ण की गौएं और गोपिकाएं वेदों की ऋचाएं हैं । लकड़ी का रूप ब्रह्मा ने और वंशी का रूप रुद्र ने धारण किया है । इन्द्र सींगा बन गये । इस प्रकार गोकुल के रूप में साक्षात् वैकुण्ठ ही उपस्थित हो गया । वहां तपस्वी महात्माओं ने वृक्षों का रूप धारण किया है और लोभ-क्रोधादि
[३५८] [कृष्णोपनिषत्
विकार ही दैत्य हो गए हैं। वे कलिकाल में भगवान् का नाम लेने मात्र से नाश को प्राप्त होते हैं ॥३-६॥ गोपरूपो हरिः साक्षान्मायाविग्रहधारणः । दुर्बोधं कुहकं तस्य मायया मोहित जगत् ॥१० दुर्जेया सा सुरैः सर्वैर्धृष्टिरूपो भवेद्द्विजः । रुद्रो येन कृतो वंशस्तस्य माया जगत्कथम् ॥११ बलं ज्ञानं सुराणां वै तेषां ज्ञानं हृतं क्षणात् । शेषनागो भवेद्रामः कृष्णोब्रह्मव शाश्वतम् ॥१२ अष्टावष्टसहस्रे द्वे शताधिक्यः स्त्रियस्तथा । ऋचोपनिषदस्ता वै ब्रह्मरूपा ऋचः स्त्रियः ॥१३ द्वेषश्चाणूरमल्लोऽयंत्सरो मुष्टिको जयः । दर्पः कुवलयापीडो गर्वो रक्षः खगो बकः ॥१४ दया सा रोहिणी माता सत्यभामा घरेति वै । अघासुरो महाव्याधिः कलिः कंसः स भूपतिः ॥१५ शमो मित्रः सुदामा च सत्याक्रू रोद्धवो दमः । यः शङ्खः स स्वयं विष्णुर्लक्ष्मीरूपो व्यवस्थितः ॥१६ दुग्धसिन्धौ समुत्पन्नो मेघघोषस्तु संस्मृतः । दुग्धोदधिः कृतस्तेन भग्नभाण्डो दधिग्रहे ॥१७ क्रीडते बालको भूत्वा पूर्ववत्सुमहोदधौ । संहारार्थं च शत्रूणां रक्षणाय च संस्थितः ॥१८ कृपार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् । यत्तत्सृष्ट मेश्वरेणासीत्तच्चक्रं ब्रह्मरूपधृक् ॥१६ भगवान् श्रीहरि ने ही गोपरूप में लीला-विग्रह रूप धारण किया है । यह संसार माया से मोहित है, इसलिए ईश्वरीय माया का रहस्य जानना अत्यन्त दुष्कर है। क्योंकि प्रभु-माया तो
कृष्णोपनिषत् ] [ ३५६ देवताओं द्वारा भी नहीं जीती जा सकती । जिनकी माया के वश में पड़कर ही ब्रह्माजी को लकुटी और भगवान् शिव को बांसुरी बनना पड़ा है, उन श्रीहरि की माया का ज्ञान साधारण प्राणियों को किस प्रकार हो सकता है ? देवताओं के पास जो ज्ञान रूप बल है उसका भी श्रीहरि की माया ने क्षण भर में हरण कर लिया । सनातन ब्रह्म श्रीकृष्ण हुए और शेषनाग ने बलराम का रूप ग्रहण किया । भगवान की सोलह हजार एक सौ रानियां वेद की ऋतुएँ और उपनिषद् ही हैं । इनके अतिरिक्त ब्रह्म स्वरूपिणी वेद-ऋचाएँ गोपियों के रूप में प्रकट हुईं । चाणूर मल्ल द्वेष है, अत्यन्त कठिनाई से जीता जाने के योग्य मुष्टिक मत्सर है और कुबलियापीड दर्प है । आकाश में विचरण करने वाला राक्षस बकासुर गर्व है । साक्षात् दया ही माता रोहिणी हुई है । पृथिवी माता ने सत्यभामा का रूप धारण किया है । महाव्याधि अघासुर और साक्षात् कलि ने राजा कंस का रूप बनाया । शम ने सुदामा का, सत्य ने अक्रूर का और दम ने उद्धव का रूप ग्रहण किया । शंख विष्णु है और लक्ष्मी का भ्राता होने से उसी के समान है । वह मेघ के समान गम्भीर घोष करने वाला क्षीर सागर से उत्पन्न हुआ है । भगवान् श्रीकृष्ण ने जो दूध-दही के मटके फोड़ कर घर-घर में दूध-दही की नदी-सी बहा दी वह प्रवाह साक्षात् क्षीर सागर ही हुआ । दूध-दही के प्रवाह रूप क्षीर सागर में बालक रूप में भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे हैं । सन्तजनों की रक्षा में तथा दुष्टों के विनाश में वे समान रूप से लगे हुए हैं । सब प्राणियों पर अनुग्रह करने और धर्म की रक्षा करने के लिये ही भगवान् श्रीकृष्ण ने भूतल पर अवतार लिया है । जो चक्र भगवान शंकर ने श्रीहरि भगवान् के निमित्त प्रकट किया था, वही चक्र भगवान् श्रीकृष्ण के कर-कमलों में सुशोभित हो रहा है । वह चक्र भी ब्रह्म के समान है ॥ १०–१६ ॥
३६० ] [ कृष्णोपनिषत् CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri जयन्तीसंभवौ वायुश्चमरो धर्मसंज्ञितः । यस्यासौ ज्वलनाभासः खङ्गरूपो महेश्वरः ॥२० कश्यपोलूखलः ख्यातो रज्जुर्माताऽदितिस्तथा । चक्रं शंखं च संसिद्धि बिन्दुं च सर्वमूर्धनि ॥२१ यावन्ति देवरूपाणि वदन्ति विबुधा जनाः । नमन्ति देवरूपेभ्य एवमादि न संशयः ॥२२ गदा च कालिका ताक्षात्सर्वशत्रु निबर्हिणी । धनुः शार्ङ्गं स्वमाया च शरत्कालः सुभोजनः ॥२३ अब्जकाण्डं जगद्बीजं धृतं पाणौ स्वलीलया । गरुडो वटभाण्डीरः सुदामा नारदो मुनिः ॥२४ वृन्दा भक्तिः क्रिया बुद्धिः सर्वजन्तुप्रकाशिनी । तस्मान्न भिन्नं नाभिन्नमाभिर्भिन्नो न वै विभुः ॥ भूमावुत्तारितं सर्वं वैकुण्ठं स्वर्गवासिनाम् ॥२५ सर्वतीर्थफलं लभते य एवं वेद । देहबन्धाद्विमुच्यते इत्युपनिषत् ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ धर्म ने चँवर का रूप धारण किया और वायु देवता वैजयन्ती- माला के रूप में हुए । महेश्वर ने चमकते हुए खंग का रूप बनाया और कश्यप नन्दगृह में ऊखल बन गए । माता अदिति ने रस्सी का रूप बनाया । सब वर्णों पर जैसे अनुस्वार अलंकृत होता है, वैसे ही सब से ऊपर सुशोभित आकाश भगवान का . छत्र है । वाल्मीकि और व्यास आदि महर्षियों ने देवताओं के जितने रूपों का वर्णन किया है और जिन- जिन रूपों में देवताओं को सब प्राणी नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रम में ही रहते हैं । भगवान् की गदा साक्षात् काली स्वरूपा है, जो समस्त शत्रुओं का नाश करने में समर्थ है । वैष्णवी माया ने शार्ङ्ग धनुष का रूप बनाया और प्राण नाशक काल ही उस पर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
कृष्णोपनिषत् ] [ ३६१ CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri संधान किये जाने के लिये बाण बना । संसार का बीज रूप कमल भगवान् के हाथों में लीलापूर्वक सुशोभित है । भाण्डीर वट का रूप गरुड़ ने धारण किया और नारद कृष्ण के सखा श्री सुदामा हुए । साक्षात् भक्ति ही वृन्दा हुई । सब प्राणियों को कर्म का ज्ञान कराने वाली, प्रकाश दायिनी बुद्धि ही भगवान् की क्रिया शक्ति हुई । इस प्रकार यह गोप-गोपी आदि सभी भगवान श्रीकृष्ण से अभिन्न हैं। उन्हीं श्रीकृष्ण ने स्वर्ग के और बैकुण्ठ के सब देवताओं को पृथिवी पर उतारा है ॥२०—२५॥ इस प्रकार जानने वाला ज्ञानी सब तीर्थों का फल प्राप्त करता और शरीर-बन्धन से मुक्त होता है—यह उपनिषद् है । ॥ कृष्णोपनिषद् समाप्त ॥ —:— Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri गणपत्युपनिषत् ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्रा ॥ स्थिरैरङ्गै स्तुष्टु वांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ॥ स्वस्ति न पूषा विश्ववेदाः ॥ स्वस्ति नस्ता- क्ष्र्यो अरिष्टनेमिः ॥ स्वस्ति नो वृहस्पतिर्द धातु ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांति ॥ हे पूज्य देवो ! हम कानों से कल्याण सुनें, आँखों से कल्याण को देखें । अंगों तथा देह के द्वारा तुम्हारी स्तुति करते रहें और देवताओं ने हमारे लिये जो आयुष्य नियत कर दिया है उसे भोगें । महान कीर्ति वाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सब को जानने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें, जिसकी गति रोकी न जा सके ऐसे गरुड़देव हमारा कल्याण करें और वृहस्पति हमारा कल्याण करें ! ॐ शांति, शांति, शांति ॥ ॐ लं नमस्ते गणपतये ॥१॥ त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ताऽसि । त्वमेव केवलं धर्ताऽसि । त्वमेव केवलं हर्ताऽसि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्माऽसि ॥२॥ नित्यमृतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥३॥ अथ त्वं माम् । अव वक्तारम् । अव श्रोतारम् । अव दातारम् । अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् । अव पुरस्ता- त्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव पश्चात्तात् । अवोत्तरात्तात् अव Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi
गणपत्युपनिषत् ] [ ३६३ च्चोर्ध्वात्तात् । अवाधरात्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥४॥ त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः । त्वमानन्दमयस्त्व ब्रह्ममयः । त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ५ सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते । सर्वं जगदिदं त्वत्तस्ति- ष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति । सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति । त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः । त्वं चत्वारि वाक्प- रिमिता पदानि । त्वं गुणत्रयातीतः । त्वं देहत्रयातीतः । त्वं कालत्रयातीतः । त्वं मूलाधारे स्थितोऽसि नित्यम् । त्वं शक्ति- त्रयात्मकः । त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् । त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णु- स्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरोम् ॥ ६ भगवान् गणपति को नमस्कार ॥१॥ तुम्हीं कर्ता, धर्ता हो एवं प्रत्यक्ष तत्व हो । तुम्हीं इन रूपों में विराजमान साक्षात् ब्रह्म हो । तुम ही नित्य एवं आत्म स्वरूप हो ॥२॥ मैं सत्यपूर्वक एवं न्यायपूर्वक कहता हूँ ॥३॥ तुम मुझ शिष्य की एवं उपदेष्टा गुरु की रक्षा करो। श्रोता, दाता और घाता की रक्षा करो। व्याख्या आचार्य और शिष्य की रक्षा करने वाले होओ । पश्चिम की ओर से मेरी रक्षा करो, पूर्व की ओर से रक्षा करो, उत्तर की ओर से तथा दक्षिण ओर से भी मेरी रक्षा करो। ऊपर, नीचे तथा सब ओर से मेरी रक्षा करो । चारों ओर से मेरे रक्षक बनो ॥४॥ तुम वाङ्मय, चिन्मय एवं आनन्दमय हो । तुम ब्रह्ममय, सत्-चित्-आनन्द रूप तथा एक अद्वितीय हो । ज्ञान-विज्ञान-
३६४ ] [ गणपत्युपनिषत् मय भी हो, तुम्हीं साक्षात् ब्रह्म हो ॥५॥ यह सम्पूर्ण विश्व तुम्हारे द्वारा ही प्रकट होता है । यह विश्व तुम्हारे द्वारा ही स्थित है । यह समस्त संसार तुम्हीं में लीन हो जाता है । इस सम्पूर्ण विश्व की प्रतीति तुम में ही होती है । तुम्हीं पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो । वाणी के चार रूप परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा भी तुम हो । सत्व, रज और तम से परे—गुणातीत हो । भूत, भविष्यत्, वर्तमान से परे तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों प्रकार के शरीरों से भी परे हो । तुम मूलाधार चक्र में सदा स्थिति रहते हो । इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति यह तीनों रूप तुम्हारे ही हैं । योगी पुरुष तुम्हारा नित्य प्रति चिन्तन करते हैं । तुम ही ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र हो । इन्द्राग्नि और वायु भी तुम ही हो । सूर्य-चन्द्रमा हो । तुम ब्रह्म हो तथा भूः भुवः स्वः रूप त्रिलोक और ओंकार रूप परब्रह्म तुम ही हो ॥६॥ गणादीन् पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् । अनुस्वारः परतरः [अर्धेन्दुलसितं तथा ॥ तारेण युक्तमेतदेव मनुस्वरूपम् ॥ ७ गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वार- श्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम् । नादः संधानम् । संहिता संधिः । सैषा गाणेशी विद्या ॥ ८ गणक ऋषिः । नृचद्गायत्री छन्दः । श्रीमहागणपति- देवता । ॐ गणपतये नमः ॥ ६ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ १० एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणाम् । अभयं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥ ११ रक्तलम्बोदरं शूर्पसुकर्णं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पै सुपूजितम् ॥ १२