१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें:गोपालपूर्वतापिन्युपनिषत् [ ३५२ परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् । तस्मा- देतन्नित्यमावर्तयेन्नित्यमावर्तयेदिति ॥४॥ तदाहुरेके यस्य प्रथ- मपदाद्भूमिर्द्वितीयपदाज्जलं तृतीयपदाद्यं जश्चतुर्थपदाद्वायुश्चर- मपादाद्व्योमेति । वैष्णवं पञ्चव्याहृतिमयं मन्त्रं कृष्णावभासकं कैवल्यस्य सृप्त्यै सततमावर्तयेत्सततमावर्तयेदिति ॥ ५ ॥ तदत्र गाथाः ॥ यस्य चाद्यपदाद्भूमिर्द्वितीयात्सलिलोद्भवः । तृतीयाः तेज उद्भूतं चतुर्थाद्गन्धवाहनः ॥ १ ॥ पञ्चमादम्बरोत्पत्तिस्त- मेवैकं समभ्यसेत् । चन्द्रध्वजोगमद्विष्णोः परमं पदमव्ययम् ॥ २॥ ततो विशुद्धं विमलं विशोकमशेषलोभादिनिरस्तसङ्गम् । यत्तत्पदं पञ्चपदं तदेव स वासुदेवो न यतोऽन्यदस्ति ॥ ३ ॥ तमेकं गोविन्दं सच्चिदानन्दविग्रहं पञ्चपदं वृन्दावनसुरभूरूह- तलासीनं । सततं मरुद्गणोऽहं परमया स्तुत्या स्तोष्यामि ॥ ब्रह्माजी ने कहा—जब मेरी परार्ध आयु भगवान की स्तुति करते बीत गई तो मुझे गोप वेषधारी भगवान का दर्शन प्राप्त हुआ । उन्होंने मुझे अष्टादशाक्षर मन्त्र का उपदेश देकर सृष्टि रचना की प्रेरणा की। मैंने इस मन्त्र के 'क' अक्षर से जल की, 'ल' से पृथ्वी की, 'ई' से अग्नि की, अनुस्वार से चन्द्रमा की और समग्र 'क्लीं' से सूर्य की रचना की । मन्त्र के द्वितीय पद 'कृष्णाय' से आकाश और वायु की, 'गोविन्दाय' से कामधेनु और वेदों की तथा 'गोपीजन वल्लभाय' से पुरुष-स्त्री की रचना की । अन्त के स्वाहा' पद से चराचर जगत को उत्पन्न किया । इस अष्टाक्षर मन्त्र से ही प्राचीन समय में चन्द्रध्वज राजा मोहरहित होकर पूर्ण आत्मज्ञान के अधिकारी बने थे । भगवान कृष्ण के गोलो- कधाम की प्राप्ति इसी मन्त्र से होती है । वह जो परम विशुद्ध, विमल, शोक रहित, आसक्ति और