भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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गोपालपूर्वतपिन्युपनिषत् [ ३५१ दशार्णाद्यास्तेऽपि संक्रन्दाद्यै रभ्यस्यन्ते भूतिकामैर्यथावात् ॥८ जो सृष्टि के पूर्व काल में ब्रह्माजी उत्पन्न कर उन्हें वेद ज्ञान देते और उनसे साम-गान कराते हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों को बुद्धि रूप प्रकाश प्रदान करते हैं, मुमुक्षु व्यक्ति उन्हीं भगवान् श्रीकृष्ण की शरण प्राप्त करे । भगवान गोविन्द के पञ्चपदी मन्त्र की ओंकार सम्पुट कर जप करने वाले साधक शीघ्र ही उनके दर्शन करते हैं । इसलिये भव-बन्धन से मुक्त होने की कामना करने वाले साधक को नित्य शांति की प्राप्ति के लिये उक्त मन्त्र का ही जप करना चाहिये । इस पञ्चपदी मन्त्र से ही दशाक्षर आदि अन्य मन्त्र भी प्रकट हुए हैं । वे सभी मन्त्र मानव का कल्याण करने वाले हैं । उन मन्त्रों का भी ऐश्वर्य-कामना वाले इन्द्रादि देव विधिपूर्वक सदा जप करते रहते हैं ॥६—८॥ ते पप्रच्छु स्तुदुहोवाच ब्रह्मसदनं चरतो मे ध्यातः स्तुतः परमेश्वरः परार्द्धान्ते सोऽबुध्यत । कोपदेष्टा मे पुहुषः पुरस्तादा- विर्बभूव । ततः प्रणतो मायानुकूलेन हृदा मह्यमष्टादशार्णस्वरूपं सृष्टये दत्त्वान्तर्हितः । पुनस्ते सिसृक्षतो मे प्रादुरभूवन् । तेष्व- क्षरेषु विभज्य भविष्यज्जगद्रूपं प्रकाशयम् । तदिह कादाका- लात्पृथिवीतोऽग्निर्बिन्दोरिन्दुस्तत्संपातात्तदर्क इति । क्लींकाराद- जस्रं कृष्णादाकाशं खाद्वायुरुत्तरात्सुरभिर्विद्याः प्रादुरकार्षमका- र्षमिति । तदुत्तरात्स्वापुंसादिभेदं सकलमिदं सकलमिदमिति ॥ ३ ॥ एतस्यव यजनेन चन्द्रध्वजो गतमोहमात्मानं वेदयति । ओंकारालिकं मनुमावर्तयेत् । सङ्गरहितोऽध्यानयेत् । तद्विष्णोः