भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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कृष्णोपनिषत् ] [ ३५७ स्तुवते सततं यस्तु सोऽवतीर्णो महीतले । वने वृन्दावने क्रोडन्गोपगोपीसुरैः सह ॥७ गोप्यो गाव ऋचस्तस्य यष्टिका कमलासनः । वंशस्तु भगवान्रुद्रः शृंगमिन्द्रः सगोसुरः ॥८ गोकुलं वनवैकुण्ठं तापसास्तत्र ते द्रुमाः । लोभक्रोधादयो दैत्याः कलिकालस्तिरस्कृतः ॥६ भगवान् द्वारा प्राप्त इस आश्वासन से सब देवता अत्यन्त प्रसन्न हुये और परस्पर कहने लगे—'अब हम धन्य हो गये' । फिर सब देवता भगवान् की सेवा के लिये अवतीर्ण हुए । नन्द के रूप में भगवान् का परम आनन्दमय अंश उत्पन्न हुआ । यशोदा के रूप में मुक्ति देवी प्रकट हुईं । तीन प्रकार की माया कही गई है—सात्त्विकी, राजसी और तामसी । रुद्र भगवान में सात्त्विकी माया है, ब्रह्माजी में राजसी और दैत्यों में तामसी माया समाविष्ट हुई है। इस त्रिविध माया से भिन्न जो वैष्णवी माया है, उस पर विजय प्राप्त करना नितान्त असम्भव है। जिस ब्रह्ममयी वैष्णवी माया को प्राचीन काल में ब्रह्माजी भी नहीं जीत सके, उसकी देवगण स्तुति करते हैं। वही वैष्णवी माया देवकी के रूप में अवतीर्ण हुई । जो वेद नारायण के स्वरूप की सदैव स्तुति करते हैं, वे ही वसुदेव हुए । वेदों के अर्थभूत ब्रह्म ही इस पृथिवी पर बलराम और कृष्ण के रूप में प्रकट हुये । वही वेदार्थ साक्षात् रूप में, वृन्दावन में गोप-गोपिकाओं के साथ क्रीड़ा करता है । उन श्रीकृष्ण की गौएं और गोपिकाएं वेदों की ऋचाएं हैं । लकड़ी का रूप ब्रह्मा ने और वंशी का रूप रुद्र ने धारण किया है । इन्द्र सींगा बन गये । इस प्रकार गोकुल के रूप में साक्षात् वैकुण्ठ ही उपस्थित हो गया । वहां तपस्वी महात्माओं ने वृक्षों का रूप धारण किया है और लोभ-क्रोधादि

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