१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ ]CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri [ कृष्णोपनिषत् अङ्गसङ्गं करिष्यामि भवद्वाक्यं करोम्यहम् ॥२ श्रीकृष्ण के अवतार ग्रहण करने से पहिले की बात है। जब भगवान् ने देवताओं को पृथिवी पर अवतीर्ण होने की आज्ञा दी, तब सम्पूर्ण देवताओं ने भगवान् से कहा—'प्रभो ! हम देवता होकर पृथिवी पर जन्म ग्रहण करें, यह हमारे लिए शोभा की बात कदापि नहीं होगी। हम स्वेच्छा से तो पृथिवी पर जन्म नहीं ले सकते, परन्तु आपकी आज्ञा के कारण हमें वहाँ जन्म लेना ही होगा। फिर भी प्रभो ! हमें गोपों और स्त्रियों के रूप में वहाँ जन्म देना। आपके अङ्ग-स्पर्श से वञ्चित रह कर हम कहीं नहीं रहना चाहते। यदि आपकी समीपता से दूर करने के लिये हमें मनुष्य बनना पड़े तो हम ऐसे मनुष्य-जन्म को कभी स्वीकार न करेंगे। यदि वहाँ आपके सान्निध्य का और अङ्ग-स्पर्श का अवसर मिलता रहे तो हम पृथिवी पर जन्म लेने के लिये प्रस्तुत हैं।' देवताओं के ऐसे प्रेम-पूर्ण वचनों को सुनकर भगवान् बोले—'देवगण ! तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी और मनुष्य जन्म में तुम्हें मेरे अङ्ग-स्पर्श का अवसर मिलता रहेगा' ॥ १-२ ॥ मोदितास्ते सुराः सर्वे कृतकृत्याधुना वयम् । यो नन्दः परमानन्दो यशोदा मुक्तिगेहिनी ॥३ माया सा त्रिविधा प्रोक्ता सत्त्वराजसतामसी । प्रोक्ता च सात्विकी रुद्रे भक्ते ब्रह्मणि राजसी ॥४ तामसी दैत्यपक्षेषु माया त्रेधा ह्य दाहृता । अजेया वैष्णवी माया जप्येन च सुता पुरा ॥५ देवकी ब्रह्मपुत्रा सा या वेदै रुपगीयते । निगमो वसुदेवो यो वेदार्थः कृष्णरामयोः ॥६ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi