१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 572 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३० ) "हृदय के पाँच देव सुषि ( छिद्र ) हैं। जो पूर्व दिशा- वर्ती छिद्र है, सो प्राण है। जो उसकी उपासना कपता है, वह तेजस्वी और अन्न का भोक्ता होता है। दक्षिण छिद्र व्यान है। जो उसकी उपासना करता है, वह श्रीमान और यशस्वी होता है। पश्चिचम छिद्र अपान है। जो उसकी उपासना करता है, वह ब्रह्म-तेजस्वी और अन्न का भोक्ता है। इसका उत्तरी छेद 'समान' है। जो इसकी उपासना करता है, वह कीर्तिमान और कान्तिमान होता है। उर्ध्वंछिद्र उदान है। जो उसकी उपासना करता है, वह ओजस्वी और तेजस्वी होता है। यह पांच प्राण ब्रह्मपुरुष के द्वारपाल हैं। जो उन्हें जानता है, उसके कुल में वीर उत्पन्न होता है। उसे स्वर्गलोक प्राप्त होता है।" —छान्दोग्य, अध्याय ३, खण्ड १३
"जैसे हाथों से इधर-उधर फेंकी हुई गेंद दौड़ती रहती है, उसी प्रकार प्राण और अपान वायु के फेंकने से जीव को कहीं विश्राम-स्थल नहीं मिलता। अपान, प्राण को खींचता है और प्राण, अपान को खींचता है, उसी प्रकार जैसे रस्सी से बँधा हुआ पक्षी खोंच लिया जाता है। इस रहस्य को जो जानता है, वह योगी है।" —ध्यानबिन्दु उपनिषद्
"चित्त की चंचलता के भाग होते हैं, एक वासना दूसरा प्राण। इनमें से एक के वश में होने से दूसरा वश में हो जाता है। इनमें से पहले प्राण को वश में करना चाहिये।" —योगकुण्डल्युपनिषद्