भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri “हे सौम्य, जिस प्रकार डोरी से बँधा हुआ पक्षी अनेक दिशाओं में घूमकर फिर अपने बन्धन स्थान पर ही लौट आता है, उसी प्रकार यह मन भी अनेक दिशाओं में घूमकर भी कहीं आश्रय नहीं पाता और अन्त में प्राण का ही सहारा लेता है क्योंकि यह मन प्राण से ही बँधा हुआ है।” —छान्दोग्य उपनिषद् ‘योग वाशिष्ठ’ आदि अन्य ग्रन्थों में भी प्राणायाम द्वारा मन का निग्रह एवं आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होने का प्रतिपादन किया गया है। यथा:— अभ्यासेन परिस्पन्दे प्राणानां क्षयमागते । मनःप्रशममायाति निर्वाणमवशिष्यते । —योगवाशिष्ठ ५।७८।४६ “अभ्यास के द्वारा प्राणों की गति रुक जाने पर मन शान्त हो जाता है और तब केवल निर्वाण ही शेष रहता है।” तालवृन्तस्य संस्पन्दे शान्ते शान्तो यथानिलः। प्राणानिल परिस्पन्दे शान्ते शान्तं तथा मनः। —योगवाशिष्ठ ६।६६।४१ “जैसे पंखा बन्द कर देने से हवा की गति रुक जाती है, वैसे ही प्राण के निरोध से निश्चय ही मन शान्त हो जाता है।” प्राण शक्तौ निरुद्धायां मनो राम विलीयते । द्रव्यच्छायानु तद्द्रव्यं प्राणरूपं हिनसम् । —योगवाशिष्ठ ५।१३।८३ “हे राम, प्राण शक्ति का निरोध होने से मन का निरोध Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi