भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ३२ ) हो जाता है। जैसे अन्य पदार्थों की अपनी छाया होती है, बस ही प्राण की छाया मन है।" राज्यादि मोक्षपर्यन्ताः समस्ता एव सम्पदः। देहानिलविधेयत्वात्साध्याः सर्वस्य राघव । —योगवाशिष्ठ ६।८०।३५ "हे राम, प्राणों को वश में कर लेने से मनुष्य राज्य-प्राप्ति से लेकर मोक्ष-प्राप्ति तक की सतस्त सिद्धि सम्पदाएँ प्राप्त कर सकता है।" द्वेबीजे चित्त वृक्षस्य प्राणस्पन्दन वासने । एकस्मिंश्च तयोः क्षीणेक्षिप्रं द्वे अपिनश्यतः । —योगवाशिष्ठ चित्त रूपी वृक्ष के दो बीज हैं—एक प्राण दूसरा वासना। इन दोनों में से एक क्षीण ( सूक्ष्म ) होने से दूसरा भी वैसा ही हो जाता है।" "चले वाते चलञ्चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ।" "प्राण वायु चलने से मन चंचल रहता है और प्राण के निश्चल होने पर मन निश्चल हो जाता है।" निष्कलं तं विजानीयात् श्वासोयत्र लयं गतः। यन्मनो विलयं याति तद् विष्णोर्परम पदम् । "छब श्वास का लय हो जाता है तो वह स्थिति निष्कल कहलाती है। मन का लय होना ही विष्णु का परमपद है।" ज्ञानं कुतो मनसि संभवतीह तावत्, प्राणोऽपि जीवति मनो म्रियते न यावत् । प्राणोमनोद्वयमिदं विलयं नयेद्यो, मोक्षं स गच्छति नरो नकथञ्चिदन्यः। Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi