भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ३३ ) 'जब तक ज्ञान कैसे प्राप्त होगा जब तक कि मन न मरेगा ? और मन के साथ साथ प्राण भी जीवित रहता है। जो प्राण और मन दोनों का विलय कर देता है, वही मोक्ष प्राप्त कर सकता है और कोई नहीं । पवनोलीयते यत्र मनस्तत्र विलीयते । "जब प्राण वायु संयम में आ जाता है,तब मन भी स्थिर हो जाता है।" प्राणवृत्तौ विलीनायां मनो वृत्तिर्विलीयते । -बोधसार प्राणवृत्ति के विलीन होने से मनोवृत्ति भी विलीन हो जाती है।" ――― साधना में गुरु की आवश्यकता और उपयोगिता यों सभी महत्वपूर्ण विद्याएँ गुरु के माध्यम से प्राप्त की जाती हैं, पर ब्रह्मविद्या का प्रवेश-द्वार तो अनुभवी मार्ग-दर्शक के द्वारा ही खुलता है। अक्षरारम्भ यद्यपि हमारी दृष्टि में एक सामान्य सी बात है पर छोटा बालक उस कार्य को अध्यापक की सहायता के बिना अकेला ही पूर्ण करना चाहे तो नहीं कर सकता, भले ही वह कितना ही मेधावी क्यों न हो । गणित, शिल्प, सर्जरी, साइन्स, यंत्र-निर्माण आदि सभी महत्वपूर्ण कार्य अनुभवी अध्यापक ही सिखाते हैं । कोई छात्र शिक्षक की आवश्यकता न समझे और स्वयं ही यह सब सीखना चाहे तो

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