भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ३४ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri उसे कदाचित ही सफलता मिले। रोगी को अपनी चिकित्सा कराने के लिये किसी अनुभवी चिकित्सक की शरण लेनी पड़ती है, यदि वह अपने आप ही इलाज करने लगे तो उसमें भूल होने की संभावना रहेगी क्योंकि अपने सम्बन्ध में निर्णय करना हर व्यक्ति के लिये कठिन होता है। अपनी निज की त्रुटि, अपूर्णता बुराई, स्थिति एवं प्राप्ति के बारे में कोई विरला ही सही अनुमान लगा सकता है। जिस प्रकार अपना मुंह अपनी आंखों से नहीं देखा जा सकता, उसके लिये दर्पण की या किसी दूसरे से पूछने की सहायता लेनी पड़ती है, तभी कुछ जान सकना सम्भव होता है, उसी प्रकार अपने दोष-दुर्गुणों का, मनोभूमि का, आत्मिक-स्तर का एवं प्रगति का भी पता अपने आप नहीं चलता, कोई अनुभवी ही इस सम्बन्ध में विशेषण कर सकता है और उसी के द्वारा उद्धार एवं कल्याण का मार्ग-दर्शन किया जा सकता है। जिसने कोई रास्ता स्वयं देखा है, कोई मंजिल स्वयं पार की है, वही उस रास्ते की सुविधा-असुविधाओं को जानता है, नये-पथिक के लिये उसी की सलाह उपयोगी हो सकती है। बिना किसी से पूछे स्वयं ही अपना रास्ता आप बनाने वाले सम्भव है मंजिल पार करलें, निश्चित रूप से उन्हें कठिनाई बहुत उठानी पड़ेगी और देर भी बहुत लगेगी। इसलिये जब तक सर्वथा असम्भव ही न हो जाय तब तक मार्ग-दर्शक की तलाश करना ही उचित है। उसी के सहारे अध्यात्मिक यात्रा सुविधापूर्वक पूर्ण होती है। भौतिक शिक्षाओं के शिक्षक अपने विषय की जानकारी देकर अपना कर्तव्य पूरा कर लेते हैं, पर अध्यात्म-मार्ग में इतने से ही काम नहीं चल सकता। वहाँ शिक्षा ही पर्याप्त नहीं, वरन् गुरु द्वारा दिया हुआ आत्मबल भी दान या प्रसाद रूप में उपलब्ध Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi