भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ३५ ) करना पड़ता है । जिस प्रकार कोई रोगी चिकित्सक की शिक्षा मात्र से अच्छा नहीं हो सकता, उसे चिकित्सक से औषधि भी प्राप्त करनी पड़ती है, उसी प्रकार सच्चे गुरु न केवल आत्म- कल्याण का मार्ग बताते हैं वरन् उस पर चल सकने योग्य साहस, बल और उत्साह भी देते हैं । यह देन तभी सम्भव है जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-सम्पदा पर्याप्त मात्रा में हो । इसलिये गुरु का चयन और वरण करते समय उसकी विद्या ही नहीं आत्मिक-स्तर और तप की संग्रहीत पूँजी को भी देखना पड़ता है । यदि यह सभी गुण न हों तो कोई व्यक्ति आध्यात्म-मार्ग का उपदेष्टा भले ही कहा जा सके पर गुरु नहीं बन सकता । गुरु के पास साधना, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये । साधक को ऐसा गुरु तलाश करना पड़ता है और उसी के मार्ग दर्शन में अपना रास्ता बनाना पड़ता है । गुरु की महत्ता एवं योग्यता, शिष्य की पवित्रता एवं कुपात्रता, गुरु के प्रति भक्ति-भावना रखना, उनके आदर्श का अनुसरण करना आदि आवश्यक तथ्यों पर उपनिषदों में अनेक प्रसंग मिलते हैं । वे सभी माननीय एवं विचारणीय हैं । देखिये :- "वेद सम्पन्न आचार्य, ईश्वर भक्त, मत्सरता रहित, योग-ज्ञाता, योग-निष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष रूप से लीन इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है । 'गु' शब्द का अर्थ है अन्धकार । और 'रु' शब्द का अर्थ है-रोकने वाला । अन्धकार को दूर करने से गुरु होता है । गुरु ही परब्रह्म है । गुरु ही परमगति है । गुरु ही