भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ३६ ) पर विद्या है। गुरु ही परायण योग्य है। गुरु ही पराकाष्ठा है। गुरु ही परम धन है। वह उपदेष्टा होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है।” —अद्वयतारक उपनिषद् “जो इन्द्रियों को जीतने वाला, ब्रह्मचारी गुरुभक्त हो, उसी के सम्मुख यह रहस्य प्रकट करना उचित है।” —हंसोपनिषद् जो शिक्षा प्राप्त करके भो मन, कर्म, बचन से भी गुरुजनों का आदर नहीं करते, उनके अन्न को कोई कल्याण- इच्छुक स्वीकार नहीं करता। न गुरुजन और न यती ही उस कृतघ्नी के अन्न को खाते हैं। गुरु ही परम धर्म है। गुरु ही परमगति है। जो उनका सम्मान नहीं करता, उसकी विद्या, तपस्या सभी धीरे-धीरे ऐसे क्षीण हो जाती है जैसे कच्चे घड़े में जल। जैसी भक्ति देव में वैसी ही गुरु में होने से ब्रह्मज्ञानी परमपद को प्राप्त करता है ऐसा वेदानुशासन है, ऐसा ही वेद-विधान है।” —शाटचायनोयोपनिषद् “गुरु जो आदेश दे उसका पालन शिष्य को बिना विचारे संतोषयुक्त भाव से करना चाहिए। इस विद्या को गुरु से प्राप्त करें। गुरु की सदा सुश्रूषा करें इसी से मनुष्य का सच्चा-कल्याण होता है।••••••••श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि है, कोई अन्य नहीं । यह विद्या उसी को देनी चाहिए जो गुरु का सच्चा भक्त ही, नित्य भक्ति परायण रहे। अन्य किसी को नहीं देनी चाहिए। यदि कोई देगा तो देने वाला नरक को जायगा और सिद्धि भी नहीं मिलेगी।” —ब्रह्मविद्या उपनिषद्