भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 572 में से

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( ३७ ) “इस पैप्पलाद ऋषि को प्राप्त हुये महाशास्त्र को चाहे जिस किसी को न देना चाहिये । नास्तिक, कृतघ्न, दुर्वृत्त, दुरात्मा, दाम्भिक, नृशंस, शठ, असत्यभाषी को इसे कदापि न दे । जो सुव्रतधारी, सच्चा-भक्त, शुद्धवृति वाला, सुशील, गुरुभक्त, शमदम वाला, धर्मबुद्धि वाला, ब्रह्मचर्य में चित्त लगाने वाला भक्ति-भाबना वाला हो, कृतघ्न न हो उसी को इसे देना चाहिये । यदि ऐसा न मिले तो किसी को न देकर उसकी रक्षा करनी चाहिए।” —शरभोपनिषद् „यह ज्ञान शंकर का महान शास्त्र है । उसे जो कोई नास्तिक, कृतघ्नी, दुराचारी, दुरात्मा हो, उसको नहीं देना । पर जिसका अन्तःकरण गुरु-भक्ति से शुद्ध हो, ऐसे व्यक्ति को एक महीना, छै महीना या वर्ष भर तक परीक्षा करने के उपरान्त ही इस शास्त्र को देना।” —तेजोबिन्दु उपनिषद् “यह ब्रह्म का उपनिषद् उसे नहीं देना चाहिये जो अत्यन्त शान्त न हो, जो पुत्र न हो, शिष्य न हो और एक वर्ष पास न रहा हो । अनजान कुलशील वाले को भी नहीं देना चाहिये और न सुनाना चाहिये । जिसको परमात्मा के ऊपर और परमात्मा के समान ही गुरु के ऊपर परमभक्ति हो उसी के लिये ये वाक्य कहे गये हैं और ऐसी आत्मा को ही ये प्रकाशवान करते हैं।” —सुवाल उपनिषद्

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