भारतकोश
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१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

( ३५ ) करना पड़ता है । जिस प्रकार कोई रोगी चिकित्सक की शिक्षा मात्र से अच्छा नहीं हो सकता, उसे चिकित्सक से औषधि भी प्राप्त करनी पड़ती है, उसी प्रकार सच्चे गुरु न केवल आत्म- कल्याण का मार्ग बताते हैं वरन् उस पर चल सकने योग्य साहस, बल और उत्साह भी देते हैं । यह देन तभी सम्भव है जब गुरु के पास अपनी संचित आत्म-सम्पदा पर्याप्त मात्रा में हो । इसलिये गुरु का चयन और वरण करते समय उसकी विद्या ही नहीं आत्मिक-स्तर और तप की संग्रहीत पूँजी को भी देखना पड़ता है । यदि यह सभी गुण न हों तो कोई व्यक्ति आध्यात्म-मार्ग का उपदेष्टा भले ही कहा जा सके पर गुरु नहीं बन सकता । गुरु के पास साधना, तपस्या, विद्या एवं आत्मबल की पूँजी पर्याप्त मात्रा में होनी चाहिये । साधक को ऐसा गुरु तलाश करना पड़ता है और उसी के मार्ग दर्शन में अपना रास्ता बनाना पड़ता है । गुरु की महत्ता एवं योग्यता, शिष्य की पवित्रता एवं कुपात्रता, गुरु के प्रति भक्ति-भावना रखना, उनके आदर्श का अनुसरण करना आदि आवश्यक तथ्यों पर उपनिषदों में अनेक प्रसंग मिलते हैं । वे सभी माननीय एवं विचारणीय हैं । देखिये :- "वेद सम्पन्न आचार्य, ईश्वर भक्त, मत्सरता रहित, योग-ज्ञाता, योग-निष्ठा वाला, योगात्मा, पवित्रतायुक्त, गुरुभक्त, परमात्मा में विशेष रूप से लीन इन लक्षणों से युक्त गुरु कहा जाता है । 'गु' शब्द का अर्थ है अन्धकार । और 'रु' शब्द का अर्थ है-रोकने वाला । अन्धकार को दूर करने से गुरु होता है । गुरु ही परब्रह्म है । गुरु ही परमगति है । गुरु ही

( ३६ ) पर विद्या है। गुरु ही परायण योग्य है। गुरु ही पराकाष्ठा है। गुरु ही परम धन है। वह उपदेष्टा होने के कारण श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है।” —अद्वयतारक उपनिषद् “जो इन्द्रियों को जीतने वाला, ब्रह्मचारी गुरुभक्त हो, उसी के सम्मुख यह रहस्य प्रकट करना उचित है।” —हंसोपनिषद् जो शिक्षा प्राप्त करके भो मन, कर्म, बचन से भी गुरुजनों का आदर नहीं करते, उनके अन्न को कोई कल्याण- इच्छुक स्वीकार नहीं करता। न गुरुजन और न यती ही उस कृतघ्नी के अन्न को खाते हैं। गुरु ही परम धर्म है। गुरु ही परमगति है। जो उनका सम्मान नहीं करता, उसकी विद्या, तपस्या सभी धीरे-धीरे ऐसे क्षीण हो जाती है जैसे कच्चे घड़े में जल। जैसी भक्ति देव में वैसी ही गुरु में होने से ब्रह्मज्ञानी परमपद को प्राप्त करता है ऐसा वेदानुशासन है, ऐसा ही वेद-विधान है।” —शाटचायनोयोपनिषद् “गुरु जो आदेश दे उसका पालन शिष्य को बिना विचारे संतोषयुक्त भाव से करना चाहिए। इस विद्या को गुरु से प्राप्त करें। गुरु की सदा सुश्रूषा करें इसी से मनुष्य का सच्चा-कल्याण होता है।••••••••श्रुति में कहा गया है कि गुरु ही साक्षात हरि है, कोई अन्य नहीं । यह विद्या उसी को देनी चाहिए जो गुरु का सच्चा भक्त ही, नित्य भक्ति परायण रहे। अन्य किसी को नहीं देनी चाहिए। यदि कोई देगा तो देने वाला नरक को जायगा और सिद्धि भी नहीं मिलेगी।” —ब्रह्मविद्या उपनिषद्

( ३७ ) “इस पैप्पलाद ऋषि को प्राप्त हुये महाशास्त्र को चाहे जिस किसी को न देना चाहिये । नास्तिक, कृतघ्न, दुर्वृत्त, दुरात्मा, दाम्भिक, नृशंस, शठ, असत्यभाषी को इसे कदापि न दे । जो सुव्रतधारी, सच्चा-भक्त, शुद्धवृति वाला, सुशील, गुरुभक्त, शमदम वाला, धर्मबुद्धि वाला, ब्रह्मचर्य में चित्त लगाने वाला भक्ति-भाबना वाला हो, कृतघ्न न हो उसी को इसे देना चाहिये । यदि ऐसा न मिले तो किसी को न देकर उसकी रक्षा करनी चाहिए।” —शरभोपनिषद् „यह ज्ञान शंकर का महान शास्त्र है । उसे जो कोई नास्तिक, कृतघ्नी, दुराचारी, दुरात्मा हो, उसको नहीं देना । पर जिसका अन्तःकरण गुरु-भक्ति से शुद्ध हो, ऐसे व्यक्ति को एक महीना, छै महीना या वर्ष भर तक परीक्षा करने के उपरान्त ही इस शास्त्र को देना।” —तेजोबिन्दु उपनिषद् “यह ब्रह्म का उपनिषद् उसे नहीं देना चाहिये जो अत्यन्त शान्त न हो, जो पुत्र न हो, शिष्य न हो और एक वर्ष पास न रहा हो । अनजान कुलशील वाले को भी नहीं देना चाहिये और न सुनाना चाहिये । जिसको परमात्मा के ऊपर और परमात्मा के समान ही गुरु के ऊपर परमभक्ति हो उसी के लिये ये वाक्य कहे गये हैं और ऐसी आत्मा को ही ये प्रकाशवान करते हैं।” —सुवाल उपनिषद्

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अन्य ग्रन्थों में भी इस सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा गया है । वह भी महत्वपूर्ण नहीं है । गुरु की महत्ता को प्रायः सभी धर्म ग्रन्थों ने एक स्वर से स्वीकार किया है । उत्तिष्ठत ! जागृत ! प्राप्यवरान निरोधक । – ऋग्वेद "उठो, जागो, सद्-गुरुओं द्वारा यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करो ।" गुरुपोदेशतो ज्ञेयं नच शास्त्रार्थ कोटिभिः । "केवल शास्त्रों के आधार पर नहीं, इस विद्या को गुरु द्वारा सीखे ।" तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् । समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्म निष्ठम् । "उस ज्ञान की प्राप्ति के लिये वेदज्ञ, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास हाथ में समिधा लेकर जावे ।" गुरु वरण करने का तात्पर्य उस व्यक्ति की आत्मा के साथ अपनी आत्मा को जोड़ देना है। जिस प्रकार किसी बड़े तालाब के साथ छोटे तालाब को एक नाली के द्वारा जोड़ दिया जाय तो बड़े तालाब का पानी छोटे में भी आने लगता है और वह तब तक नहीं सूखता जब तक कि बड़ा तालाब भी न सूख जाय । तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्त चित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्वतो ब्रह्म विद्याम् । – मुण्डक १।२।१३

( ३२ ) वह ज्ञानी-गुरु उस श्रद्धा पूर्ण, शान्त चित्त एवं तितीक्षा और साधना निष्ठ शिष्य को ब्रह्म-विद्या का उपदेश करे जिससे वह अविनासी सत्स्वरूप आत्मा को जान ले । गुरु शिष्य चाहे शरीर से सदा पास-पास न रहें पर यदि वह सम्बन्ध उचित अध्यात्म विज्ञान के अनुरूप हुआ है तो शिष्य को गुरु की समीपता उपलब्ध रहेगी और वह उसकी समीपता एवं संगति का फल प्राप्त करता रहेगा। गुरु की क्षमता यह होनी ही चाहिये कि वह शिष्य के अन्तःकरण तक अपनी प्रेरणा पहुँचा सकने में समर्थ हो । इसी शक्ति के आधार पर सद्-गुरु अपने शिष्य का कल्याण कर पाते हैं:— दर्शनध्यान संस्पर्शात् मत्सी कूर्मी च पक्षिणीं। शिशून् पालयते नित्यं तथा सज्जन संगतिः । "जिस प्रकार मछली, कछवी तथा चिड़िया अपने बच्चों का दर्शन, ध्यान और स्पर्श से पालन करती है, उसी प्रकार सत्यपुरुषों की संगति से भी शिष्य का पालन होता है।" यादृशैः सन्निवसति यादृशांश्चोपसेवते । या दृगिच्छेच्चभवितुं तादृग्भवति पुरुषः ॥ "जो जिसके साथ रहता है, जिसकी सेवा करता है और जो जैसा होना चाहता है वह वैसा ही हो जाता है।" यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वास्तेनमेव । वासो यथा रंग वशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति । —महा०शान्ति २६६।३३

“कपड़े जैसे रंग से रङ्ग जावें वैसे ही हो जाते हैं। ऐसे ही जो व्यक्ति संत, असंत तपसी, चोर या जैसों का संग करता है, वह वैसा ही हो जाता है।” राजसूय यज्ञ करने के सम्बन्ध में प्रस्ताव पर विचार विमर्श करते हुये युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण जी से कहा— केचिद्व सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थं हेतोस्तथैवान्ये प्रियमेव वदन्त्युत । प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनियद्धितम् । एवं प्रायाश्चदृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने । त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् रागद्वेषौनिरस्य च । परमं यत् क्षम लोके यथावद्वक्तुमर्हसि । —महाभारत “कुछ लोग सौहार्दवश दोषों को नहीं कहते, अन्य लोग स्वार्थवश केवल प्रिय ही बोलते हैं तथा कुछ लोग अपने विषय में हित एवं प्रिय विषय ही श्रवण करना चाहते हैं, अतः तद्- नुरूप ही सुझाव देते हैं। प्रयोजन आने पर प्रायः ऐसे ही जनवाद देखे जाते हैं। तात्पर्य यह है कि किसी न किसी संकोच स्वार्थ या भावना के वशीभूत होकर प्रायः योग यथार्थ की अपेक्षा करके प्रिय ही बोलना जानते हैं त्रुटियों की ओर वे इंगित नहीं कर पाते। किन्तु भगवान् ! तुम तो समस्त हेतुओं से परे रहकर रागद्वेष को दूर भगाकर जो परम समुचित एवं यथार्थ बात है, वही यथावत् बोलते हो। अतः बिना तुम्हारे परामर्श के मैं इतना बड़ा कार्य कैसे करस कता हूँ ?” बुद्धिमान व्यक्ति भी कई अध्यात्म प्रसंगों पर दिग्भ्रान्त हो जाते हैं, तब उन्हें उचित मार्ग दर्शन सद्-गुरु द्वारा ही होता है युधिष्ठिर इस तथ्य को जानते थे इसलिये उन्होंने राजसूय

यज्ञ का प्रसंग आने पर श्रीकृष्ण जी से उसके लिए आवश्यक मार्ग दर्शन मांगा। ऐसा ही मार्ग दर्शन अपनी-अपनी परिस्थि- तियों के अनुरूप सर्व साधारण को भी प्राप्त करना होता है ऐसे अवसरों पर सुलझे हुए विचारों का तथा अध्यात्म और व्यवहार का समन्वय कर सकने वाला अनुभवी मार्ग दर्शक अभीष्ट होता है। उनके सहयोग और परामर्श से शिष्य अनेक समस्याओं को हल करता हुआ अभीष्ट लक्ष तक जा पहुंचता है । निमज्ज्यां मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम् सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौदृंढेवाप्सु मज्जताम् --श्रीमद्भागवत “जैसे जल में डूबते हुओं को नाव ही एक मात्र सहारा है, वैसे ही इस भवसागर में डूबने से बचने के लिये ब्रह्मवेत्ता सन्तों का ही सबसे बड़ा सहारा है।” दुर्लभो विषयेत्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनं । दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरोःकरुणांविना । “बिना गुरु कृपा के विषयों का त्याग दुर्लभ है, तत्व-दर्शन दुर्लभ है तथा सहजावस्था का प्राप्त होना भी दुर्लभ है।” आत्मज्ञान को उपलब्धि, पापपूर्ण मनोभूमि का परि- शोधन, भ्रम संशयों का उच्छेदन, प्रगति के लिये मार्ग दर्शन, यह सब कार्य उनके लिये सरल ही हो जाते हैं जिन्हें अनुभवी सद्-गुरु की प्राप्ति होजाय । इसके बिना अध्यात्म-मार्ग के पथिक को अन्धकार में ही भटकते रहना पड़ता है। गुरुपदेशशास्त्रत्थै बिना चात्मा न बुध्यते । एतत्संयोगसत्तैव स्वात्मज्ञान प्रकाशिनी । --योगवाशिष्ठ ६।४१।१६

( ५२ ) “शास्त्र के अध्ययन और गुरु के उपदेश बिना आत्मज्ञान नहीं होता। अधिकारी जिज्ञासु, शास्त्राध्ययन और सद्गुरु इन तीनों के संयोग से ही आत्मज्ञान प्रकाश में आता है। आचार्या द्धै विद्या विहिता साधिष्ठं प्रापत् “आचार्य के बिना पराशक्ति स्वरूपा ब्रह्म विद्या स्वधि- ष्ठित होती ही नहीं।” मन्त्र, साधना विधान, स्वाध्याय और संयम का जैसा महत्व है वैसा ही गुरु के सहयोग का भी है। उचित मार्ग- दर्शन से आधी कठिनाई तो स्वयमेव हल हो जाती है। इस लिये गुरु को भी एक प्रकार से मंत्र एवं देवता ही माना गया गया है। यथा घटश्च कलशः कुम्भश्चैकार्थ वाचकाः। तथा मंत्रो देवता च गुरुश्चैकार्थ वाचकाः। “जिस प्रकार घट, कलश, कुंभ एक ही वस्तु के कई नाम हैं, उसी प्रकार मन्त्र, देवता और गुरु एक ही तत्व के नाम हैं।” पन्थानो बहवः प्रोक्ता मन्त्र शास्त्र मनीषिभिः। स्वगुरोर्मतयाश्रित्य शुभं कार्यं न चान्यथा॥ “बहुत से मार्ग हैं, अनेक मन्त्र एवं शास्त्र हैं पर अपने गुरु के मतानुसार मार्गालम्बन करने से ही शुभ होता है। इसके विपरीत नहीं।” अनेक कोटि मंत्राणि चित्त व्याकुल कारणम्। मंत्र गुरोः कृपा प्राप्तमेकं स्यात् सर्वसिद्धिदम्॥ “अगणित मन्त्र तो चित्त की व्याकुलता के कारण ही सिद्ध होते हैं। गुरु की कृपा से प्राप्त हुआ एक मन्त्र ही सर्व सिद्धियाँ प्रदान करता है।” गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए शास्त्रकारों ने बताया

है कि सच्चा गुरु वही है। जो शिष्य की समस्याओं का समा- धान कर सके। देखिये:- गृणाति उपदिशति धर्ममिति गुरुः "जो धर्म का उपदेश करे उन्हें गुरु कहते हैं।" गिरत्यज्ञान मिति गुरुः "जो अज्ञान को दूर करें, वे गुरु है।" अविद्या हृदय ग्रन्थि बन्ध मोक्षो यतो भवेत्। तयेव गुरुरित्यार्गु रु शब्देन योगिनः। —शङ्कराचार्य "जो हृदय की अज्ञान ग्रन्थि को खोलें उन्हें गुरु कहते हैं।" निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि। संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरु रुच्यते। —मनु २।१४२ "जो स्वयं कर्तव्य कर्मों में संलग्न हो और दूसरों को भी वैसी ही प्रेरणा दे ऐसे ब्राह्मण को गुरु कहते हैं।" आत्मा को अपने ही विचारों और तर्कों से प्राप्त नहीं किया जा सकता, इसके लिये सुयोग्य मार्गदर्शक गुरु का होना कितना आवश्यक है, इस सम्बन्ध में 'महोपनिषद् में' वर्णित शुकदेव जी का प्रसंग और कठोपनिषद् का प्रमाण मननीय है-- नैषा तर्केण मतिरापनेया, प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय श्रेष्ठ। कठ १।२।६ "यह आत्म-बुद्धि तर्क से नहीं मिलती। हे श्रेष्ठ, दूसरे के द्वारा कही जाने पर ही यह अच्छी तरह जानी जाती है।"

अध्याय २ में इस प्रकार वर्णन मिलता है—

शुकदेव जी के अन्त-करण में स्वतः ही ज्ञान उत्पन्न हुआ था। पर उससे काम न चला। इस सम्बन्ध में 'महोपनिषद्' अध्याय २ में इस प्रकार वर्णन मिलता है— जात मात्रेण मुनिराड् यत्सत्यं तदवाप्तवान् । तेनासौ स्व विवेकेन स्वमेव महामनाः । प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्तवान् । "उन शुकदेव जी को बिना गुरु के उपदेश के ही स्वतः आत्मज्ञान हुआ था। उनकी वासनाएँ स्वतः निवृत्त हो गई थीं। परन्तु वह ज्ञान दृढ़ न होने के कारण उनके मन को शान्ति नहीं हुई। उन्हें अपने ज्ञान में विश्वास नहीं हुआ। इसलिए अपने पिता व्यास जी के आदेश से उन्हें जनक के पास ज्ञान ग्रहण करने जाना पड़ा।" यह भी ध्यान रखने की बात है कि सत्पात्र श्रद्धालु और विश्वासी शिष्य ही गुरु कृपा का लाभ उठा सकता है। जिसमें यह गुण नहीं उस ऊसर भूमि में किसी भी गुरु का बोया हुआ ज्ञान-बीज नहीं जम सकता है। गुरु के एक पक्षीय प्रयत्न से भी शिष्य का कल्याण नहीं हो सकता। दोनों ही पक्षों की श्रेष्ठता से गुरु-शिष्य संयोग का सच्चा लाभ मिलता है। कहा भी है: - गुरुश्चेदुद्धरत्यज्ञमात्मीयात्पौरुषादृते । उष्ट्रं दान्तं बलीवर्दं तत्कस्मान्नोद्धरत्यसौ । —योगवाशिष्ठ ५।४३।१६ "यदि गुरु किसी अविचारी और पुरुषार्थहीन का उद्धार कर सकते होते तो ऊँट हाथी बैल आदि का उद्धार क्यों न करते ?"

( ४५ ) आज कोई गुरु बनने की फिकर में है। क्योंकि इससे गुरु बनने वाले को शिष्य से पूजा, सम्मान, आदर और दक्षिणा मिलते रहने से धन का लाभ भी होता है और अपने अहङ्कार की तृप्ति भी होती है। इसलिये लोगों ने शिष्य मूँडना, कान फूंकना भी एक व्यवसाय बना लिया है। पर वस्तुतः यह कार्य हर किसी का नहीं है। जिसमें इतना चरित्र तथा आत्मबल हो कि अपना ही नहीं शिष्य का भी कल्याण कर सके, उसे ही यह महान उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लेने का साहस करना चाहिये। गुरु की योग्यता इस प्रकार की होनी चाहियेः— मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः। सर्वागमानां सारज्ञः सर्व शास्त्रार्थ तत्ववित्। परोपकार निरतो जप पूजादि तत्परः। अमोघ वचनः शान्तोवेद वेदार्थ पारगः। योगमार्गानुसन्धायी देवताहृदयङ्गमः। इत्यादि गुण सम्पन्नो गुरुरागम सम्मतः। —शारदातिलक "जो असली माता-पिता से पैदा हो सदाचारी हो, शुद्ध भावना वाला हो, इन्द्रियाँ जिसके वश में हों, जो समस्त शास्त्रों के सार को जानता हो, परोपकारी हो, जप पूजा आदि उपासनाओं में संलग्न हो, जिसकी वाणी अमोघ हो, शान्त हो, वेद और वेदार्थ का पारदर्शी हो, योगमार्ग में जिसकी प्रगति हो, जो हृदय में देवता के समान हो, इस प्रकार के गुण जिसके स्वभाव में हों, वही शास्त्र सम्मत गुरु बनाने योग्य है।" ऐसे गुरु ही अपने द्वारा दीक्षित शिष्य का हित-साधन कर सकते हैं। कहा भी है :—

( ४६ ) यः समः सर्व भूतेषु विरागो वीत मत्सरः । कर्मणा मनसा वाचा भीतेचाभयदः सदा ॥ समबुद्धिपदं प्राप्तस्तत्रापि भगवन्मयः । पञ्चकाल परश्चैव पाञ्चा रात्रार्थ वित्तथा ॥ विष्णु तत्वं परिज्ञाय एकं चानेक भेदगम् । दीक्षयेन्मेदिनीं सर्वां किं पुनश्चोपसन्नतान् ॥ —तत्त्वसार "जो समस्त प्राणियों को समान मानते हैं, राग-द्वेष रहित हैं, मन-कर्म वचन से दूसरों के दुख को दूर करने में रत हैं, जिनकी बुद्धि सम है, जो भगवन्मय हैं, जो नित्य कर्म में सावधान हैं, भगवत् तत्व को जानते हैं, वे शरणागत अधि- कारी शिष्य को ही नहीं सारी पृथ्वी को दीक्षित कर सकते हैं।" शास्त्रों में दस श्रेणी के व्यक्तियों को गुरु कहा गया है— उपाध्यायः पितामाता ज्येष्ठो भ्राता महीपति मातुलः श्वसुरश्चैव मातामह पितामहो । वर्ण ज्येष्ठः पितृव्यश्च सर्वे ते गुरवः स्मृताः ॥ —कौर्य० उत्तरा० १२।२६ "उपाध्याय, पिता-माता, बड़ाभाई, राजा, मामा श्वसुर, नाना, बाबा, ब्राह्मण ये दस गुरु कहे गये हैं।" किन्तु इन सब में आचार्य श्रेणी के गुरु की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित की गई है :— आचार्य श्रेष्ठो गुरूणाम् —गौ० ध० सू १।३।५६

( ४७ ) गुरुओं में आचार्य ही श्रेष्ठ है। आचार्य किसे कहते हैं ? उसमें यह लक्षण होने चाहिये :— आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि । स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन चोच्यते । — वायुपुराण “जो शास्त्रों के उद्देश्यों (अर्थों) को जाने, स्वयं सदाचारी हो और जनता को सदाचार में लगावे उसे आचार्य कहते हैं।” स्वयमाचरते यस्मादाचारं स्थापयत्यपि । आचिनोति च शास्त्राणि आचार्यस्तेनचोच्यते —ब्रह्माण्ड पर्व ३२।३२ “स्वयं श्रेष्ठ आचरण करे और दूसरों को वैसी ही प्रेरणा करे। शास्त्र के मर्म को जाने, उसे आचार्य कहते हैं।” इस श्रेणी के सत्पुरुष आजकल नहीं के बराबर हैं। मनसि वचसि काये प्रेम पीयूष पूर्णा— स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः। परगुणपरमाणून् पर्वती कृत्य नित्यं निज हृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः। —भृतहरि “जिनका मन, वचन और काया प्रेमरूपी अमृत में भरे हैं, अपने उपकारों की बाढ़ से जो तीनों लोकों को निमग्न करते हैं, दूसरों के छोटे गुणों को भी पर्वत के समान महान मानते हैं, अपने हृदय को विकसित करते रहते हैं, ऐसे सन्त इस संसार में कितने हैं ?” फिर भी प्रयत्न करने से किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्तियों

( ४८ ) को सद्-गुरु क्षमता वाले मार्ग दर्शक भी प्रयत्न करने पर मिल जाते हैं। संसार में किसी वस्तु का पूर्ण अभाव कभी नहीं होता। कमी भले ही हो जाय। शिष्य के भी गुरु के प्रति अनेक कर्तव्य हैं। उन सब में आवश्यक कर्तव्य है सच्ची श्रद्धा और भक्ति भावना का होना। यही वह आकर्षण है जिसके बल पर शिष्य गुरु के हृदय में से आवश्यक सहायता और कृपा प्राप्त कर सकता है। यदि बछड़ा थन को चूसेगा नहीं तो गाय उसके मुख में अपना दूध उड़ेल नहीं सकेगी। जिसके मन में भक्ति भावना का अभाव है, केवल चिन्ह पूजा के लिये अथवा प्रयोजन विशेष के लिये किसी गुरु को वरण किया है तो ऐसे लोग वह प्रसाद प्राप्त नहीं कर सकते जो श्रद्धा भावना वाले शिष्य प्राप्त करते हैं। शिष्य को आरम्भ में गुरु-भक्ति की स्थापना हृदय में करनी पड़ती है और यही आगे चलकर ईश्वर-भक्ति के रूप में परिणित हो जाती है। गुरु-भक्ति ईश्वर-भक्ति का ही प्रारम्भिक एवं स्थूल रूप है। आरम्भिक शिष्यों के लिये इसकी उपयोगिता बताते हुये कहा गया है कि :- यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। प्रकाशन्ते महात्मनः। ---श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।२३ "जिसके मन में परमात्मा की भक्ति के समान ही गुरु की भी भक्ति है, उसी महान आत्मा वाले के हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित होता है। उसी के हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित होता है।" माता-पिता पूज्य हैं। उनके प्रति संतान का महान कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व है, किन्तु शिष्य का गुरु के प्रति भी काम

( ४६ ) उत्तरदायित्व नहीं है, वरन् उससे भी कुछ अधिक ही है। क्योंकि गुरु भी आध्यात्मिक जीवन को प्रदान करने वाला पितर ही है। गुरुर्गरीयान् मातृतः पितृतश्चेति मे भातिः । शा० १०८।१७ “माता-पिता से भी गुरु का स्थान ऊँचा है।” क्योंकि— माता पितरौ शरीरमेव काष्ठ कुं ण्यादि समं जनयतः । आचार्यस्तु सर्वं पुरुषार्थ क्षम रूपं जनयति । “माता-पिता तो लकड़ी के ढोल सरीखे इस देह को ही जन्म देते हैं पर आचार्य सब पुरुषार्थ भरे अध्यात्म रूप को ही जन्म देता है।” अध्यात्म विद्या का प्रवेशद्वार गुरुदीक्षा है। यों भावना से भी किसी को गुरु माना जा सकता है पर दीक्षा का विशेष विज्ञान एवं महत्व है। कोई स्त्री चाहे तो भावना मात्र से भी किसी को पति मान सकती है पर यदि विधिवत् विवाह संस्कार के साथ देवताओं और गुरुजनों को साक्षी में पति वरण किया जाय तो उसका प्रभाव और महत्व दूसरा ही है। गुरुदीक्षा का भी अपना विज्ञान है। इस संस्कार के माध्यम से गुरु अपनी प्राणशक्ति की चिनगारी शिष्य के हृदय में विधिवत् स्थापित करता है। जो उचित शुभ सिंचन होते रहने से एक दिन प्रचण्ड तेजोमयी दिव्य ज्योति के रूप में प्रस्फुटित होती है। साधन- पथ के पथिकों के लिये यह प्रक्रया आवश्यक मानी गई है :— दीक्षां बिना न मोक्ष स्यात् प्राणिनां शिव शासनात्, सा च न स्याद विनाचार्यमित्याचार्यं परम्परा ॥

( ५ ) उपासना शते नापि यां विना नैव सिद्ध्यति । तां दीक्षामाश्रयेद् यत्नात् श्रीगुरोर्मन्त्रसिद्धये ॥ —पिच्छिला तंत्र 'शिवजी के आवेश के कारण दीक्षा के बिना किसी को मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । आचार्य परम्परा के विरुद्ध दीक्षा भी सफल नहीं होती । अनेकों प्रकार की उपासनायें हैं पर बिना दीक्षा के कोई सफल नहीं होतो । गुरु दीक्षा के आधार पर ही मोक्ष प्राप्त होता है।” दिव्य ज्ञानं यतो दद्यात्कुर्यात्पापस्य संक्षयम् । तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तंत्र वेदिभिः ॥ दीक्षा मूलं जपं सर्वं दीक्षा मूलं परं तपः । दीक्षामाश्रित्य निवसेद्यत्र कुत्राश्रमे वासन् । देवि दीक्षा विहीनस्य न सिद्धिर्न च सद्गतिः । तस्मात्सर्वं प्रयत्नेन गुरुणादीक्षितो भवेत् ॥ “जिससे दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है और पापों का क्षय होता है, इसलिये उसे दीक्षा कहते हैं। जप का मूल दीक्षा है, तप का मूल दीक्षा है। किसी भी आश्रम में रहे दीक्षा लेकर रहे। हे पार्वती ! दीक्षाहीन को न सिद्धि मिलती है न सद्गति । इसलिये प्रयत्नपूर्वक दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।” ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् । यैर्नलब्ध्वा हरेर्दीक्षा नार्चितोवा जनार्दनः ॥ —स्कन्द पुराण “संसार में वे मनुष्य पशु तुल्य हैं, उनके जीवन में क्या लाभ ? जिनने दीक्षा लेकर भगवान् की उपासना नहीं की।”

CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( ५१ ) दीक्षाग्नि दग्ध कर्मा सौ यायाद्विच्छिन्न बन्धनः । गतस्तस्य कर्म बन्धो निर्जीवश्च शिवो भवेत् ॥ —कुलार्णव “दीक्षा की अग्नि में कर्म जल जाने से बन्धन कट जाते हैं और जीव शिवत्व को प्राप्त कर लेता है ।” दीयते परमं ज्ञानं क्षीयते पाप पद्धतिः । तेन दीक्षोच्यते मंत्रे स्वागमार्थ वलावलात् ॥ —लघु कल्प सत्र “जिससे परम ज्ञान दिया जाय और पाप प्रकृया नष्ट हो उसे शास्त्रों में दीक्षा कहा गया है ।” दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पाप क्षयं ततः । तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्व तंत्रस्य संमता ॥ —विश्वसार “जिससे दिव्य ज्ञान दिया जाय, और पाप क्षय हों, उसे दीक्षा कहते हैं ।” ददाति दिव्यं भावञ्चैत् क्षिणुयात् पाप संततिम् । तेन दीक्षेति विख्याता मुनिभिस्तंत्र पारगैः ॥ —गौतमीय तंत्र “जिसके द्वारा दिव्य भाव दिया जाय और पाप शृङ्खला टूटे, उसे मुनियों ने दीक्षा कहा है ।” रसेन्द्रेण यथा विद्धमयः सुवर्णतां व्रजेत् । दीक्षा विद्धस्तथैवात्मा शिवत्वंलभते प्रिये ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi --कुलर्णव

( ५२ ) "जिस प्रकार रसायन विधि से साधारण धातु स्वर्ण बन जाती है, उसी प्रकार दीक्षा विधान से साधारण आत्मा भी शिवत्व को प्राप्त करती है।" अनीश्वरस्य मर्त्यस्य नास्तित्राता यथा भुवि । तथा दीक्षा विहीनस्य नेहस्वामी परत्र च ॥ —दत्तात्रेय यामल "दीक्षा विहीन मनुष्य का इस लोक और परलोक में कहीं कल्याण नहीं। यथा कूर्मः स्वतन्यान्ध्यान मात्रेण पोषयेत् । वेध दीक्षोपदेशस्तु मानसः स्यात्तथाविधः ॥ —कुलार्णव "जिस प्रकार कछुआ अपने बच्चों का ध्यान मात्र से पोषण करता है, उसी प्रकार गुरु भी अपनी मनः स्थिति से शिष्य की मनःस्थिति का पोषण करता है, इसे वेध-दीक्षा कहते हैं।" अध्यात्म मार्ग के पथिकों के लिये मार्ग-दर्शक का चुनाव एवं वरण करना आवश्यक है। यह कार्य विधि- विधान के साथ सम्पन्न किया जाय तो ही उसका समुचित लाभ भी मिलता है। गुरुदीक्षा का यही तत्वज्ञान है। उपनिषदों में देव-उपासना उपनिषदों में वर्णित साधना विधान में देव-उपासना का भी महत्वपूर्ण स्थान है। जहाँ आत्म चिन्तन, ब्रह्मध्यान, मनोनिग्रह, विवेक वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ है

( ५३ ) CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है । कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं, उसमें :प्रतिपादित देवता के गुण धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये हैं । उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ठ काम्य-प्रयो- जनों की भी पूर्ति करते रहें, ऐसा अभिमत उपनिषद्कारों का रहा है । सूर्य, शिव, गणेश, नृसिंह, गरुड़, हनुमान, कृष्ण, राम, राधा, सीता, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, त्रिपुरा आदि देवी देवताओं की उपासना का उद्देश्य क्या है और उनका क्या प्रतिफल प्राप्त होता है,उसका वर्णन उन देवताओं के प्रयोजन से बने हुए उपनिषदों में हुआ है । यह देवपूजा विशेषतया लौकिक प्रयोजनों के लिये की जाती है । पीछे अध्यात्म-मार्ग पर चलते हुए साधक ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जाता है। देव-उपासना भी परमात्मा के एक रूप विशेष की ही पूजा है और उससे सीमित उद्देश्य की पूर्ति भी होती है । देव-उपासना के परिणामों की कुछ चर्चा नीचे देखिये:— “एक बार कौषीतकि ऋषि ने अपने पुत्र से कहा—मैंने सूर्य की उपासना की, इससे तू मेरा एक पुत्र हुआ । तू सूर्य की किरणों का सब ओर से आवर्तनकर, उन सबके रूप में ॐकार का चिन्तन कर, इससे निश्चय ही तेरे बहुत पुत्र होंगे ।” —छान्दोग्य, पंचम खंड “सूर्य नारायण का आष्टाक्षर मंत्र नित्य जपने वाला ब्रह्मज्ञानी होता है। सूर्य की ओर मुख करके जाप करने से घोर Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi

( ५४ ) रोगों से छुटकारा मिलता है, दरिद्रता दूर होती है, पाप दूर होते हैं। प्रातःकाल पाठ करने से भाग्यवृद्धि होती है। उसे पशु, धन आदि के साथ ही वेदार्थ ज्ञान की उपलब्धि भी होती है। सूर्य के हस्त नक्षत्र पर रहते हुये इसका जप करने वाला महामृत्यु से पार होता है।" —सूर्योपनिषद् “चाक्षुषी विद्या नेत्र रोगों का नाश करने वाली तथा नेत्रों को तेजयुक्त करने में समर्थ है। इसका विनियोग नेत्र रोगों के शमनार्थ होता है। —चाक्षुषोपनिद् ‘गणपति का अभिषेक करने वाला वक्ता बन जाता है। चतुर्थी तिथि को उपवास करके जो इसे जपता है वह विद्यावान होता है, ऐसा महर्षि अथर्वण का कथन है। इस मन्त्र द्वारा तप करने वाले को कभी भय नहीं लगता। दूर्वा के अंकुरों द्वारा गणपति का यजन करने वाला कुवेर के समान धनवान होता है। लाजाओं द्वारा यज्ञ करने वाला यशस्वी होता है। सहस्र मोदकों द्वारा यजन करने वाला इच्छित फल पाता है। जो घृत और समिधा से यज्ञ करता है, उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता है। सूर्य ग्रहण के समय किसी महानदी या प्रतिमा के निकट बैठ कर जप करे तो मन्त्र सिद्धि प्राप्त होती है। ऐसा साधक विघ्नों से भी छुटकारा पा लेता है। —गणपत्युपनिषद् “एक समय मृत्यु, पाप और संसार से सब देवता अत्यन्त भयभीत हुए और भागकर प्रजापति की शरण में पहुँचे। ब्रह्मा जी ने उन्हें भगवान नृसिंह का मन्त्र बताया देवताओं ने