भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ४७ ) गुरुओं में आचार्य ही श्रेष्ठ है। आचार्य किसे कहते हैं ? उसमें यह लक्षण होने चाहिये :— आचिनोति च शास्त्रार्थमाचारे स्थापयत्यपि । स्वयमाचरते यस्मादाचार्यस्तेन चोच्यते । — वायुपुराण “जो शास्त्रों के उद्देश्यों (अर्थों) को जाने, स्वयं सदाचारी हो और जनता को सदाचार में लगावे उसे आचार्य कहते हैं।” स्वयमाचरते यस्मादाचारं स्थापयत्यपि । आचिनोति च शास्त्राणि आचार्यस्तेनचोच्यते —ब्रह्माण्ड पर्व ३२।३२ “स्वयं श्रेष्ठ आचरण करे और दूसरों को वैसी ही प्रेरणा करे। शास्त्र के मर्म को जाने, उसे आचार्य कहते हैं।” इस श्रेणी के सत्पुरुष आजकल नहीं के बराबर हैं। मनसि वचसि काये प्रेम पीयूष पूर्णा— स्त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभिः प्रीणयन्तः। परगुणपरमाणून् पर्वती कृत्य नित्यं निज हृदि विकसन्तः सन्ति सन्तः कियन्तः। —भृतहरि “जिनका मन, वचन और काया प्रेमरूपी अमृत में भरे हैं, अपने उपकारों की बाढ़ से जो तीनों लोकों को निमग्न करते हैं, दूसरों के छोटे गुणों को भी पर्वत के समान महान मानते हैं, अपने हृदय को विकसित करते रहते हैं, ऐसे सन्त इस संसार में कितने हैं ?” फिर भी प्रयत्न करने से किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्तियों