भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ४६ ) यः समः सर्व भूतेषु विरागो वीत मत्सरः । कर्मणा मनसा वाचा भीतेचाभयदः सदा ॥ समबुद्धिपदं प्राप्तस्तत्रापि भगवन्मयः । पञ्चकाल परश्चैव पाञ्चा रात्रार्थ वित्तथा ॥ विष्णु तत्वं परिज्ञाय एकं चानेक भेदगम् । दीक्षयेन्मेदिनीं सर्वां किं पुनश्चोपसन्नतान् ॥ —तत्त्वसार "जो समस्त प्राणियों को समान मानते हैं, राग-द्वेष रहित हैं, मन-कर्म वचन से दूसरों के दुख को दूर करने में रत हैं, जिनकी बुद्धि सम है, जो भगवन्मय हैं, जो नित्य कर्म में सावधान हैं, भगवत् तत्व को जानते हैं, वे शरणागत अधि- कारी शिष्य को ही नहीं सारी पृथ्वी को दीक्षित कर सकते हैं।" शास्त्रों में दस श्रेणी के व्यक्तियों को गुरु कहा गया है— उपाध्यायः पितामाता ज्येष्ठो भ्राता महीपति मातुलः श्वसुरश्चैव मातामह पितामहो । वर्ण ज्येष्ठः पितृव्यश्च सर्वे ते गुरवः स्मृताः ॥ —कौर्य० उत्तरा० १२।२६ "उपाध्याय, पिता-माता, बड़ाभाई, राजा, मामा श्वसुर, नाना, बाबा, ब्राह्मण ये दस गुरु कहे गये हैं।" किन्तु इन सब में आचार्य श्रेणी के गुरु की महत्ता विशेष रूप से प्रतिपादित की गई है :— आचार्य श्रेष्ठो गुरूणाम् —गौ० ध० सू १।३।५६

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