भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 53

( ४५ ) आज कोई गुरु बनने की फिकर में है। क्योंकि इससे गुरु बनने वाले को शिष्य से पूजा, सम्मान, आदर और दक्षिणा मिलते रहने से धन का लाभ भी होता है और अपने अहङ्कार की तृप्ति भी होती है। इसलिये लोगों ने शिष्य मूँडना, कान फूंकना भी एक व्यवसाय बना लिया है। पर वस्तुतः यह कार्य हर किसी का नहीं है। जिसमें इतना चरित्र तथा आत्मबल हो कि अपना ही नहीं शिष्य का भी कल्याण कर सके, उसे ही यह महान उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लेने का साहस करना चाहिये। गुरु की योग्यता इस प्रकार की होनी चाहियेः— मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः। सर्वागमानां सारज्ञः सर्व शास्त्रार्थ तत्ववित्। परोपकार निरतो जप पूजादि तत्परः। अमोघ वचनः शान्तोवेद वेदार्थ पारगः। योगमार्गानुसन्धायी देवताहृदयङ्गमः। इत्यादि गुण सम्पन्नो गुरुरागम सम्मतः। —शारदातिलक "जो असली माता-पिता से पैदा हो सदाचारी हो, शुद्ध भावना वाला हो, इन्द्रियाँ जिसके वश में हों, जो समस्त शास्त्रों के सार को जानता हो, परोपकारी हो, जप पूजा आदि उपासनाओं में संलग्न हो, जिसकी वाणी अमोघ हो, शान्त हो, वेद और वेदार्थ का पारदर्शी हो, योगमार्ग में जिसकी प्रगति हो, जो हृदय में देवता के समान हो, इस प्रकार के गुण जिसके स्वभाव में हों, वही शास्त्र सम्मत गुरु बनाने योग्य है।" ऐसे गुरु ही अपने द्वारा दीक्षित शिष्य का हित-साधन कर सकते हैं। कहा भी है :—

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३) · पृष्ठ 53, कुल 572 में से · BharatKosha