भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ४८ ) को सद्-गुरु क्षमता वाले मार्ग दर्शक भी प्रयत्न करने पर मिल जाते हैं। संसार में किसी वस्तु का पूर्ण अभाव कभी नहीं होता। कमी भले ही हो जाय। शिष्य के भी गुरु के प्रति अनेक कर्तव्य हैं। उन सब में आवश्यक कर्तव्य है सच्ची श्रद्धा और भक्ति भावना का होना। यही वह आकर्षण है जिसके बल पर शिष्य गुरु के हृदय में से आवश्यक सहायता और कृपा प्राप्त कर सकता है। यदि बछड़ा थन को चूसेगा नहीं तो गाय उसके मुख में अपना दूध उड़ेल नहीं सकेगी। जिसके मन में भक्ति भावना का अभाव है, केवल चिन्ह पूजा के लिये अथवा प्रयोजन विशेष के लिये किसी गुरु को वरण किया है तो ऐसे लोग वह प्रसाद प्राप्त नहीं कर सकते जो श्रद्धा भावना वाले शिष्य प्राप्त करते हैं। शिष्य को आरम्भ में गुरु-भक्ति की स्थापना हृदय में करनी पड़ती है और यही आगे चलकर ईश्वर-भक्ति के रूप में परिणित हो जाती है। गुरु-भक्ति ईश्वर-भक्ति का ही प्रारम्भिक एवं स्थूल रूप है। आरम्भिक शिष्यों के लिये इसकी उपयोगिता बताते हुये कहा गया है कि :- यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः। प्रकाशन्ते महात्मनः। ---श्वेताश्वतरोपनिषद् ६।२३ "जिसके मन में परमात्मा की भक्ति के समान ही गुरु की भी भक्ति है, उसी महान आत्मा वाले के हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित होता है। उसी के हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित होता है।" माता-पिता पूज्य हैं। उनके प्रति संतान का महान कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व है, किन्तु शिष्य का गुरु के प्रति भी काम