भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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( ४६ ) उत्तरदायित्व नहीं है, वरन् उससे भी कुछ अधिक ही है। क्योंकि गुरु भी आध्यात्मिक जीवन को प्रदान करने वाला पितर ही है। गुरुर्गरीयान् मातृतः पितृतश्चेति मे भातिः । शा० १०८।१७ “माता-पिता से भी गुरु का स्थान ऊँचा है।” क्योंकि— माता पितरौ शरीरमेव काष्ठ कुं ण्यादि समं जनयतः । आचार्यस्तु सर्वं पुरुषार्थ क्षम रूपं जनयति । “माता-पिता तो लकड़ी के ढोल सरीखे इस देह को ही जन्म देते हैं पर आचार्य सब पुरुषार्थ भरे अध्यात्म रूप को ही जन्म देता है।” अध्यात्म विद्या का प्रवेशद्वार गुरुदीक्षा है। यों भावना से भी किसी को गुरु माना जा सकता है पर दीक्षा का विशेष विज्ञान एवं महत्व है। कोई स्त्री चाहे तो भावना मात्र से भी किसी को पति मान सकती है पर यदि विधिवत् विवाह संस्कार के साथ देवताओं और गुरुजनों को साक्षी में पति वरण किया जाय तो उसका प्रभाव और महत्व दूसरा ही है। गुरुदीक्षा का भी अपना विज्ञान है। इस संस्कार के माध्यम से गुरु अपनी प्राणशक्ति की चिनगारी शिष्य के हृदय में विधिवत् स्थापित करता है। जो उचित शुभ सिंचन होते रहने से एक दिन प्रचण्ड तेजोमयी दिव्य ज्योति के रूप में प्रस्फुटित होती है। साधन- पथ के पथिकों के लिये यह प्रक्रया आवश्यक मानी गई है :— दीक्षां बिना न मोक्ष स्यात् प्राणिनां शिव शासनात्, सा च न स्याद विनाचार्यमित्याचार्यं परम्परा ॥

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