भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 58, कुल 572 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 58

( ५ ) उपासना शते नापि यां विना नैव सिद्ध्यति । तां दीक्षामाश्रयेद् यत्नात् श्रीगुरोर्मन्त्रसिद्धये ॥ —पिच्छिला तंत्र 'शिवजी के आवेश के कारण दीक्षा के बिना किसी को मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । आचार्य परम्परा के विरुद्ध दीक्षा भी सफल नहीं होती । अनेकों प्रकार की उपासनायें हैं पर बिना दीक्षा के कोई सफल नहीं होतो । गुरु दीक्षा के आधार पर ही मोक्ष प्राप्त होता है।” दिव्य ज्ञानं यतो दद्यात्कुर्यात्पापस्य संक्षयम् । तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता मुनिभिस्तंत्र वेदिभिः ॥ दीक्षा मूलं जपं सर्वं दीक्षा मूलं परं तपः । दीक्षामाश्रित्य निवसेद्यत्र कुत्राश्रमे वासन् । देवि दीक्षा विहीनस्य न सिद्धिर्न च सद्गतिः । तस्मात्सर्वं प्रयत्नेन गुरुणादीक्षितो भवेत् ॥ “जिससे दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है और पापों का क्षय होता है, इसलिये उसे दीक्षा कहते हैं। जप का मूल दीक्षा है, तप का मूल दीक्षा है। किसी भी आश्रम में रहे दीक्षा लेकर रहे। हे पार्वती ! दीक्षाहीन को न सिद्धि मिलती है न सद्गति । इसलिये प्रयत्नपूर्वक दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए।” ते नराः पशवो लोके किं तेषां जीवने फलम् । यैर्नलब्ध्वा हरेर्दीक्षा नार्चितोवा जनार्दनः ॥ —स्कन्द पुराण “संसार में वे मनुष्य पशु तुल्य हैं, उनके जीवन में क्या लाभ ? जिनने दीक्षा लेकर भगवान् की उपासना नहीं की।”

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३) · पृष्ठ 58, कुल 572 में से · BharatKosha