भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

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CC0. In Public Domain. Digitization by eGangotri ( ५१ ) दीक्षाग्नि दग्ध कर्मा सौ यायाद्विच्छिन्न बन्धनः । गतस्तस्य कर्म बन्धो निर्जीवश्च शिवो भवेत् ॥ —कुलार्णव “दीक्षा की अग्नि में कर्म जल जाने से बन्धन कट जाते हैं और जीव शिवत्व को प्राप्त कर लेता है ।” दीयते परमं ज्ञानं क्षीयते पाप पद्धतिः । तेन दीक्षोच्यते मंत्रे स्वागमार्थ वलावलात् ॥ —लघु कल्प सत्र “जिससे परम ज्ञान दिया जाय और पाप प्रकृया नष्ट हो उसे शास्त्रों में दीक्षा कहा गया है ।” दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात् कुर्यात् पाप क्षयं ततः । तस्माद्दीक्षेति सा प्रोक्ता सर्व तंत्रस्य संमता ॥ —विश्वसार “जिससे दिव्य ज्ञान दिया जाय, और पाप क्षय हों, उसे दीक्षा कहते हैं ।” ददाति दिव्यं भावञ्चैत् क्षिणुयात् पाप संततिम् । तेन दीक्षेति विख्याता मुनिभिस्तंत्र पारगैः ॥ —गौतमीय तंत्र “जिसके द्वारा दिव्य भाव दिया जाय और पाप शृङ्खला टूटे, उसे मुनियों ने दीक्षा कहा है ।” रसेन्द्रेण यथा विद्धमयः सुवर्णतां व्रजेत् । दीक्षा विद्धस्तथैवात्मा शिवत्वंलभते प्रिये ॥ Sri Sri Anandamayee Ashram Collection, Varanasi --कुलर्णव