भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 572 में से

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यज्ञ का प्रसंग आने पर श्रीकृष्ण जी से उसके लिए आवश्यक मार्ग दर्शन मांगा। ऐसा ही मार्ग दर्शन अपनी-अपनी परिस्थि- तियों के अनुरूप सर्व साधारण को भी प्राप्त करना होता है ऐसे अवसरों पर सुलझे हुए विचारों का तथा अध्यात्म और व्यवहार का समन्वय कर सकने वाला अनुभवी मार्ग दर्शक अभीष्ट होता है। उनके सहयोग और परामर्श से शिष्य अनेक समस्याओं को हल करता हुआ अभीष्ट लक्ष तक जा पहुंचता है । निमज्ज्यां मज्जतां घोरे भवाब्धौ परमायनम् सन्तो ब्रह्मविदः शान्ता नौदृंढेवाप्सु मज्जताम् --श्रीमद्भागवत “जैसे जल में डूबते हुओं को नाव ही एक मात्र सहारा है, वैसे ही इस भवसागर में डूबने से बचने के लिये ब्रह्मवेत्ता सन्तों का ही सबसे बड़ा सहारा है।” दुर्लभो विषयेत्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनं । दुर्लभो सहजावस्था सद्गुरोःकरुणांविना । “बिना गुरु कृपा के विषयों का त्याग दुर्लभ है, तत्व-दर्शन दुर्लभ है तथा सहजावस्था का प्राप्त होना भी दुर्लभ है।” आत्मज्ञान को उपलब्धि, पापपूर्ण मनोभूमि का परि- शोधन, भ्रम संशयों का उच्छेदन, प्रगति के लिये मार्ग दर्शन, यह सब कार्य उनके लिये सरल ही हो जाते हैं जिन्हें अनुभवी सद्-गुरु की प्राप्ति होजाय । इसके बिना अध्यात्म-मार्ग के पथिक को अन्धकार में ही भटकते रहना पड़ता है। गुरुपदेशशास्त्रत्थै बिना चात्मा न बुध्यते । एतत्संयोगसत्तैव स्वात्मज्ञान प्रकाशिनी । --योगवाशिष्ठ ६।४१।१६

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