१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)
108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें“कपड़े जैसे रंग से रङ्ग जावें वैसे ही हो जाते हैं। ऐसे ही जो व्यक्ति संत, असंत तपसी, चोर या जैसों का संग करता है, वह वैसा ही हो जाता है।” राजसूय यज्ञ करने के सम्बन्ध में प्रस्ताव पर विचार विमर्श करते हुये युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण जी से कहा— केचिद्व सौहृदादेव न दोषं परिचक्षते । स्वार्थं हेतोस्तथैवान्ये प्रियमेव वदन्त्युत । प्रियमेव परीप्सन्ते केचिदात्मनियद्धितम् । एवं प्रायाश्चदृश्यन्ते जनवादाः प्रयोजने । त्वं तु हेतूनतीत्यैतान् रागद्वेषौनिरस्य च । परमं यत् क्षम लोके यथावद्वक्तुमर्हसि । —महाभारत “कुछ लोग सौहार्दवश दोषों को नहीं कहते, अन्य लोग स्वार्थवश केवल प्रिय ही बोलते हैं तथा कुछ लोग अपने विषय में हित एवं प्रिय विषय ही श्रवण करना चाहते हैं, अतः तद्- नुरूप ही सुझाव देते हैं। प्रयोजन आने पर प्रायः ऐसे ही जनवाद देखे जाते हैं। तात्पर्य यह है कि किसी न किसी संकोच स्वार्थ या भावना के वशीभूत होकर प्रायः योग यथार्थ की अपेक्षा करके प्रिय ही बोलना जानते हैं त्रुटियों की ओर वे इंगित नहीं कर पाते। किन्तु भगवान् ! तुम तो समस्त हेतुओं से परे रहकर रागद्वेष को दूर भगाकर जो परम समुचित एवं यथार्थ बात है, वही यथावत् बोलते हो। अतः बिना तुम्हारे परामर्श के मैं इतना बड़ा कार्य कैसे करस कता हूँ ?” बुद्धिमान व्यक्ति भी कई अध्यात्म प्रसंगों पर दिग्भ्रान्त हो जाते हैं, तब उन्हें उचित मार्ग दर्शन सद्-गुरु द्वारा ही होता है युधिष्ठिर इस तथ्य को जानते थे इसलिये उन्होंने राजसूय