भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 572 में से

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( ३२ ) वह ज्ञानी-गुरु उस श्रद्धा पूर्ण, शान्त चित्त एवं तितीक्षा और साधना निष्ठ शिष्य को ब्रह्म-विद्या का उपदेश करे जिससे वह अविनासी सत्स्वरूप आत्मा को जान ले । गुरु शिष्य चाहे शरीर से सदा पास-पास न रहें पर यदि वह सम्बन्ध उचित अध्यात्म विज्ञान के अनुरूप हुआ है तो शिष्य को गुरु की समीपता उपलब्ध रहेगी और वह उसकी समीपता एवं संगति का फल प्राप्त करता रहेगा। गुरु की क्षमता यह होनी ही चाहिये कि वह शिष्य के अन्तःकरण तक अपनी प्रेरणा पहुँचा सकने में समर्थ हो । इसी शक्ति के आधार पर सद्-गुरु अपने शिष्य का कल्याण कर पाते हैं:— दर्शनध्यान संस्पर्शात् मत्सी कूर्मी च पक्षिणीं। शिशून् पालयते नित्यं तथा सज्जन संगतिः । "जिस प्रकार मछली, कछवी तथा चिड़िया अपने बच्चों का दर्शन, ध्यान और स्पर्श से पालन करती है, उसी प्रकार सत्यपुरुषों की संगति से भी शिष्य का पालन होता है।" यादृशैः सन्निवसति यादृशांश्चोपसेवते । या दृगिच्छेच्चभवितुं तादृग्भवति पुरुषः ॥ "जो जिसके साथ रहता है, जिसकी सेवा करता है और जो जैसा होना चाहता है वह वैसा ही हो जाता है।" यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वास्तेनमेव । वासो यथा रंग वशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति । —महा०शान्ति २६६।३३

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