भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 572 में से

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३६४ ] [नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् है। इस चक्र में जो नाभि हैं, उसमें यह अरे जुड़े हुए हैं। सम्पूर्ण चक्र माया रूप नेमि से घिरा हुआ है। माया आत्मा का स्पर्श नहीं कर सकती, इसलिये इस चक्र को माया ने बाहर से ही घेर रखा है। फिर आठ अरों वाला अष्टदल चक्र बनता है और गायत्री के भी आठ पाद होते हैं इसलिए गायत्री के पादों से अरों की समता की जाती है। माया ने इन्हें भी बाहर की ओर ही घेर रखा है। फिर द्वादश अरों वाला चक्र बनता है, द्वादश अक्षरों वाले जगती छन्द से इस द्वादश दल चक्र की समता की जाती है। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही घिरा है। फिर सोलह दल वाला षोडशार बनता है यह सोलह कलाओं से युक्त है, भगवान् नृसिंह भी सोलह कला वाले हैं, इसलिये इसे साक्षात् भगवान् ही समझें। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। फिर बत्तीस अरों से युक्त चक्र बनता है, अनुष्टुप् में भी बत्तीस अक्षर होते हैं। अनुष्टुप् के अक्षरों से चक्र के अरों की समता करे। यह भी माया द्वारा बाहर की ओर ही आवेष्टित है। वेद ही इस चक्र के अरे हैं, छन्द इसके पत्ते हैं। उन पत्तों से ही यह सब ओर घूमता है ॥१॥ एतत्तत्सुदर्शनं महाचक्रं तस्य मध्ये नाभ्यां तारकं यदक्षरं नरसिंहमेकाक्षरं तद्भवति षट्सु पत्रेषु षडक्षरं सुदर्शनं भवत्य- ष्टसु पत्रेष्वष्टाक्षरं नारायणं भवति द्वादशसु पत्रेषु द्वादशाक्षरं वासुदेवं भवति षोडशसु पत्रेषु मातृकाद्याः सबिन्दुकाः षोडश स्वरा भवन्ति द्वात्रिंशत्सु पत्रेषु द्वात्रिंशदक्षर मन्त्रराजं नारसिंह मानुष्टुभं भवति तद्वा एतत्सुदर्शन नाम चक्रं सार्वकामिकं मोक्षद्वारमृङ् मयं यजुर्मयं साममयं ब्रह्ममयममृतमयं भवति तस्य पुरस्ताद्वसव आसते रुद्रा दक्षिणत आदित्याः पश्चाद्विश्वे देवा उत्तरतो ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा नाभ्यां सूर्याचन्द्रमसौ पार्श्वयोस्त- देतदृचाभ्युक्तम्। ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्यस्मिन्देवा अधिविश्वे

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