भारतकोश
१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

१०८ उपनिषद् (साधना खण्ड - भाग ३)

108 Upanishads Part 3 - Sadhana Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished572 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 572 में से

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नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषत् ] [ ३६५ निषेदुः । यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासत इति तदेतत्सुदर्शनं महाचक्रं बालो वा युवा वा वेद स महान्भवति स गुरुः सर्वेषां मन्त्राणामुपदेष्टा भवत्यनुष्टुभा होमं कुर्यादनुष्टुभार्चनं कुर्यात्तदेतद्रक्षोघ्न मृत्यतारकं गुरुणा लब्धं कण्ठे बाहौ शिखायां वा बध्नीत सप्तद्वीपवती भूमिर्दक्षिणार्थं नावकल्पते तस्माच्छ्रद्धया यां कांचिद्गां दद्यात्सा दक्षिणा भवति ॥२ यह बत्तीस दल वाला चक्र ही सुदर्शन नामक महाचक्र है । इसके बीच में जो नाभि है, उनमें ही भगवान् नृसिंह से सम्बन्धित तारक मन्त्र का न्यास करना चाहिए । वह तारक मन्त्र केवल एक अक्षर का है । छः पत्रों में षडाक्षरी सुदर्शन मन्त्र का न्यास होता है । आठ दलों में अष्टाक्षरी नारायण मन्त्र का और बारह दलों में द्वादशाक्षरी वासुदेव मन्त्र का न्यास होता है । सोलह दलों में षोडश अक्षर होते हैं । बत्तीस दलों में मन्त्रराज अनुष्टुभ का न्यास किया जाता है । यह सुदर्शन नामक महाचक्र सुविख्यात है । यह सभी अभीष्टों का पूरक, मुक्ति का द्वार और ऋक्, यजु, साम का साक्षात् रूप तथा अमृतयुक्त है । इनके पूर्व में अष्टावसु, पश्चिम में द्वादश आदित्य, उत्तर में विश्वेदेवा और दक्षिण में एकादश रुद्र रहते हैं । नाभि में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तथा इधर- उधर सूर्य और चन्द्रमा रहते हैं । ऋचा में भी कहा है कि 'भगवान् नृसिंह परम व्योम रूप एवं अविनाशी हैं, उन्हीं में सम्पूर्ण वेद विद्यमान हैं । उन्हीं में सब देवता प्रतिष्ठित हैं । जो उन परमेश्वर भगवान् नृसिंह को नहीं जानता, उसे ऋग्वेद पढ़ने से कोई लाभ नहीं । जो पुरुष भगवान् नृसिंह और उनके महाचक्र का ज्ञाता है, वह परब्रह्म में स्थित होता है । इस महाचक्र को यदि कोई बालक अथवा युवा भी जान लेता है, वह महान् हो जाता

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